भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः यूरोपीय संघ ने आखिरकार भारत के स्टील निर्यातकों के लिए बड़ी राहत का ऐलान कर दिया है। लंबे समय से चली आ रही अटकलों और बातचीत के बाद अब यह साफ हो गया है कि भारत को यूरोपीय संघ को स्टील निर्यात करने के लिए हर साल कुल 1.64 मिलियन टन का देश-विशिष्ट टैरिफ-रेट कोटा मिलेगा। इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस विशाल कोटे का एक बड़ा हिस्सा — यानी करीब 6,94,853 टन — भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के तहत मिलेगा, जबकि बाकी हिस्सा मोस्ट फेवर्ड नेशन श्रेणी के अंतर्गत आएगा। यह जानकारी यूरोपीय संघ द्वारा जारी किए गए समझौते के मसौदा दस्तावेज़ में सामने आई है।
अगर आंकड़ों में जाएं तो यह पूरा कोटा दो हिस्सों में बंटा है। कुल 16,41,470 टन के कोटे में से 9,46,616 टन मोस्ट फेवर्ड नेशन के तहत और 6,94,853 टन मुक्त व्यापार समझौते के तहत तय किया गया है। यानी एक तरफ जहां भारत को सामान्य वैश्विक नियमों के तहत निर्यात की छूट मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ मुक्त व्यापार समझौते की वजह से एक अतिरिक्त और मजबूत रास्ता भी खुल जाएगा। यही वजह है कि इसे भारतीय स्टील उद्योग के लिए दोहरी जीत के तौर पर देखा जा रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह कोटा किन-किन उत्पादों पर लागू होगा? जवाब है — लगभग हर बड़े स्टील उत्पाद पर। इसमें नॉन-अलॉय और अलॉय हॉट-रोल्ड शीट व स्ट्रिप्स, कोल्ड-रोल्ड शीट्स, मेटैलिक-कोटेड शीट्स, ऑर्गेनिक-कोटेड शीट्स, टिन मिल उत्पाद, स्टेनलेस स्टील उत्पाद, मर्चेंट बार, लाइट सेक्शन, रीबार, वायर रॉड और पाइप-ट्यूब जैसी कई श्रेणियां शामिल हैं। यानी यह किसी एक सेगमेंट तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे स्टील निर्यात ढांचे को कवर करता है।
सबसे बड़ी हिस्सेदारी की बात करें तो नॉन-अलॉय और अन्य अलॉय हॉट-रोल्ड शीट व स्ट्रिप्स की श्रेणी में सबसे बड़ा देश-विशिष्ट कोटा तय हुआ है, जो 5,09,605 टन का है। इसमें 2,99,197 टन मोस्ट फेवर्ड नेशन के तहत और 2,10,408 टन मुक्त व्यापार समझौते के तहत है। इसके बाद कोल्ड-रोल्ड शीट्स का कुल कोटा 2,18,658 टन और मेटैलिक-कोटेड शीट्स का 1,97,860 टन तय किया गया है। इसके अलावा ऑर्गेनिक-कोटेड शीट्स के लिए 1,86,038 टन और नॉन-अलॉय व अन्य अलॉय क्वार्टो प्लेट्स के लिए 1,81,835 टन का कोटा रखा गया है।
अब सवाल उठता है कि आखिर यूरोपीय संघ ने यह कदम क्यों उठाया? दरअसल भारत फिलहाल हर साल यूरोपीय संघ को करीब चार मिलियन टन स्टील निर्यात करता है, और यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा था। इसी बीच यूरोपीय संघ ने वैश्विक स्तर पर स्टील की अतिरिक्त उत्पादन क्षमता से अपने घरेलू उद्योग को बचाने के लिए एक नया कानून लागू किया, जिसे "स्टील ओवरकैपेसिटी रेगुलेशन" कहा जाता है और जो इस साल 1 जुलाई से प्रभाव में आया। इस नियम का मकसद साफ है — वैश्विक अतिरिक्त उत्पादन क्षमता के असर से यूरोपीय संघ के स्टील उद्योग को सुरक्षा देना। इसके तहत 18.3 मिलियन टन का शुल्क-मुक्त कोटा तय किया गया है, जबकि कोटे से बाहर होने वाले आयात पर 50 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जाएगा, साथ ही पारदर्शिता बढ़ाने के लिए "मेल्ट-एंड-पोर" व्यवस्था भी लागू की गई है।
दिलचस्प बात यह है कि यूरोपीय आयोग ने कुल कोटे का आधा हिस्सा सीधे मुक्त व्यापार समझौते वाले देशों के लिए आरक्षित रखा है, जबकि बाकी आधा हिस्सा सभी देशों — यहां तक कि मुक्त व्यापार समझौते साझेदारों के लिए भी — खुला रखा गया है। इसका सीधा मतलब है कि जिन देशों के पास पहले से यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता है, उन्हें औसतन कहीं ज्यादा बाजार पहुंच मिलेगी, जबकि बाकी देशों को कोटे में भारी कटौती झेलनी पड़ेगी।
लेकिन क्या यह खबर पूरी तरह सुनहरी है? यहां थोड़ा सतर्क होना जरूरी है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, नए नियमों के चलते भारत के समग्र उत्पाद-विशिष्ट कोटे में करीब 30 प्रतिशत की कटौती हुई है — यह पहले के 2.8 मिलियन टन से घटकर अब लगभग 1.9 मिलियन टन रह गया है। हालांकि राहत की बात यह है कि भारतीय निर्यातक नए मुक्त व्यापार समझौते देश-विशिष्ट कोटा पूल के तहत करीब 1.2 मिलियन टन और मुक्त व्यापार समझौते -अन्य श्रेणी के तहत 0.4 मिलियन टन के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, जिससे कुल निर्यात संभावना लगभग 3.5 मिलियन टन तक पहुंच सकती है — हालांकि ये अतिरिक्त कोटा पूल प्रतिस्पर्धी हैं और भारत के लिए पक्की गारंटी नहीं माने जा सकते।
यानी कुल मिलाकर तस्वीर यह बनती है कि भारत को एक तरफ तो एक स्पष्ट, सुनिश्चित कोटा मिल गया है जो मुक्त व्यापार समझौते की बदौलत संभव हुआ, लेकिन दूसरी तरफ कड़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा और घटते समग्र कोटे के चलते असली चुनौती अभी बाकी है। भारतीय स्टील उद्योग के लिए यह एक ऐसा मौका है जिसे सही रणनीति और गुणवत्ता के दम पर भुनाना जरूरी होगा, वरना कोटा मिलने भर से निर्यात बढ़ने की गारंटी नहीं मिलती।
अब देखना यह होगा कि भारतीय स्टील कंपनियां इस नए अवसर का कितना फायदा उठा पाती हैं और यूरोपीय बाजार में अपनी पकड़ को कैसे और मजबूत बनाती हैं। एक बात तय है — आने वाले महीनों में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार संबंधों पर सबकी नजरें टिकी रहेंगी।