भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः न्यूयॉर्क से आई यह खबर सिर्फ एक और कूटनीतिक बयान नहीं, बल्कि आज की अस्थिर दुनिया के लिए एक चेतावनी और एक रास्ता दोनों है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने जिस तरह वैश्विक दक्षिण यानी ग्लोबल साउथ के देशों को एकजुट होने का आह्वान किया, उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि विकासशील दुनिया की आवाज़ बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
मंगलवार को न्यूयॉर्क में ग्लोबल साउथ देशों की बैठक को संबोधित करते हुए जयशंकर ने मौजूदा वैश्विक हालात का जो खाका खींचा, वह किसी को भी बेचैन कर देने वाला है। उन्होंने बढ़ते संघर्षों और भू-राजनीतिक तनावों, आपूर्ति शृंखलाओं और व्यापार पर बढ़ते दबाव, बिखरते निवेश प्रवाह, अपर्याप्त विकास वित्त के बीच बढ़ती कर्ज़ संबंधी कमज़ोरियों, गहराते जलवायु संकट और बहुपक्षीय व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय मानदंडों पर बढ़ते दबाव का ज़िक्र किया। यह कोई सामान्य कूटनीतिक भाषा नहीं थी, बल्कि उस वास्तविकता का आईना था जिसका सामना आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के दर्जनों देश कर रहे हैं।
सवाल यह है कि आखिर यह चिंता इतनी गहरी क्यों है? दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने एक के बाद एक झटके झेले हैं—कोविड महामारी की मार, यूक्रेन युद्ध से उपजा ऊर्जा और खाद्य संकट, पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता, और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के तेज़ी से बदलते समीकरण। इन सबका सबसे ज़्यादा बोझ विकसित देशों ने नहीं, बल्कि उन ग़रीब और विकासशील देशों ने उठाया है, जिनके पास न तो पर्याप्त वित्तीय संसाधन हैं और न ही मज़बूत संस्थागत ढांचा। जयशंकर का यह बयान इसी असंतुलन की ओर इशारा करता है।
अपने संबोधन में विदेश मंत्री ने केवल समस्याएं ही नहीं गिनाईं, बल्कि समाधान की दिशा भी सुझाई। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों को आपूर्ति शृंखला, वित्त और संपर्क से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के लिए मिलकर काम करना होगा। ऊर्जा की उपलब्धता और कीमतों में हेरफेर रोकने, अनाज व उर्वरक आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों का समाधान कर खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और निष्पक्ष आर्थिक व व्यापारिक व्यवहार को बढ़ावा देने पर भी उन्होंने ज़ोर दिया। इसके साथ ही औद्योगीकरण और उत्पादन क्षमताओं को मज़बूत करने, समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा तथा नाविकों व वाणिज्यिक जहाज़रानी की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी बात कही गई।
यहां एक बात ग़ौर करने लायक है—जयशंकर ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता से आने वाले बदलावों को संभालने और इससे दुनिया में नई खाइयां न बनें, इस पर भी विशेष रूप से ज़ोर दिया। यह दर्शाता है कि भारत की कूटनीतिक सोच अब पारंपरिक मुद्दों तक सीमित नहीं रही, बल्कि भविष्य की तकनीकी चुनौतियों को भी उतनी ही गंभीरता से देख रही है जितना व्यापार या जलवायु परिवर्तन को। साथ ही, उन्होंने वैश्विक दक्षिण के देशों को प्रभावित करने वाले फैसलों में उनकी अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने की भी मांग उठाई, यानी बड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों और संस्थाओं में इन देशों को बराबरी का हक मिलना चाहिए, न कि केवल फैसलों को मानने की भूमिका।
इसी क्रम में जयशंकर ने भारत-सेलैक यानी लैटिन अमेरिका और कैरिबियाई देशों के समुदाय के विदेश मंत्रियों की बैठक को भी संबोधित किया। उन्होंने भारत और सेलैक देशों के बीच मज़बूत आर्थिक व विकास साझेदारी की वकालत करते हुए बताया कि दोनों पक्षों के बीच व्यापार अब सालाना 50 अरब डॉलर के आंकड़े को पार कर चुका है। यह आंकड़ा अपने आप में भारत की बढ़ती वैश्विक आर्थिक पहुंच का प्रमाण है।
विदेश मंत्री ने यह भी रेखांकित किया कि पिछले एक दशक में भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हो गया है, जिसकी जीडीपी दोगुनी से भी अधिक हो चुकी है और विकास दर लगातार मज़बूत बनी हुई है। उन्होंने बताया कि आज भारत के पास एक बड़ा और लगातार कुशल होता मानव संसाधन आधार है, साथ ही बढ़ती क्षमताएं, विस्तृत होता बाज़ार, मज़बूत डिजिटल ढांचा और तेज़ी से फैलती तकनीकी क्षमताएं भी हैं। जयशंकर के मुताबिक, ग्लोबल साउथ के साथ भारत का जुड़ाव केवल अपने राष्ट्रीय हितों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह साझा समृद्धि के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि ज़रूरतमंद देशों की मदद के लिए भारत ने अपनी क्षमताओं को उनके साथ साझा किया है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो जयशंकर का यह संबोधन केवल कूटनीतिक शिष्टाचार भर नहीं, बल्कि एक स्पष्ट रणनीतिक संदेश है—कि आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यवस्था का पुनर्निर्माण होगा, और उसमें ग्लोबल साउथ को अब हाशिये पर नहीं, बल्कि निर्णय लेने की मेज़ पर होना चाहिए। भारत इस बदलाव में खुद को एक सेतु और नेतृत्वकर्ता, दोनों भूमिकाओं में पेश कर रहा है। सवाल यह है कि क्या बाकी दुनिया, विशेषकर विकसित देश, इस बदलती हुई वैश्विक वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, या यह टकराव आने वाले समय में और गहरा होगा? यह वह सवाल है जिसका जवाब आने वाले महीनों में संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक मंचों पर होने वाली चर्चाओं से मिलेगा।