भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारत की धरती पर एक बार फिर दुनिया के सबसे तेज़ स्थलीय जानवर की दहाड़ गूंज रही है, और इस बार आंकड़े खुद इस कहानी की सफलता बयां कर रहे हैं। चार साल पहले शुरू हुआ प्रोजेक्ट चीता कई तरह की चुनौतियों से जूझते हुए 17 सितंबर को अपने चार साल पूरे कर रहा है, और इस दौरान बड़ी बिल्लियों की आबादी बढ़कर 52 तक पहुंच गई है, जिनमें से 32 का जन्म खुद भारत की मिट्टी पर हुआ है। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि सत्तर साल पहले भारत से विलुप्त हो चुकी एक प्रजाति की वापसी की जीवंत गवाही है।
इस मौके पर मध्य प्रदेश के भोपाल में एक खास आयोजन हुआ। भोपाल के वन विहार में आयोजित 'चीता चौपाल' में वन अधिकारियों ने चीतों के नए माहौल में ढलने और उनकी अगली पीढ़ियों के आगे बढ़ने की उपलब्धि को रेखांकित किया। दिलचस्प बात यह रही कि यह पहली बार था जब प्रोजेक्ट चीता का मुख्य कार्यक्रम कूनो नेशनल पार्क की बजाय भोपाल में आयोजित किया गया, जबकि हर साल यह आयोजन कूनो में ही होता रहा था। इस अवसर पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) समिता राजोरा ने चीता परियोजना की चार साल की यात्रा को सफल बताते हुए इसकी उपलब्धियां गिनाईं, जबकि वन बल प्रमुख शुभ्रंजन सेन ने भी जंगल में चीतों के जीवित बचे रहने को परियोजना की एक बड़ी सफलता बताया।
आंकड़ों में झांकें तो कहानी और दिलचस्प हो जाती है। इस समय कूनो नेशनल पार्क में 49 चीते और गांधी सागर अभयारण्य में तीन चीते मौजूद हैं, यानी कुल मिलाकर देश में 52 चीते सांस ले रहे हैं, जिनमें से 32 भारतीय धरती पर जन्मे हैं। यह आंकड़ा उस "कंसोलिडेशन फेज़" यानी मजबूती के दौर की तरफ इशारा करता है, जिससे यह परियोजना अब गुज़र रही है।
कहानी की शुरुआत करें तो 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन के मौके पर नामीबिया से लाए गए आठ जंगली चीतों को मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क के विशेष बाड़ों में छोड़ा था। उन आठ में से आज केवल तीन ही जीवित बचे हैं, लेकिन उनकी 22 भारतीय संतानों को मिलाकर नामीबियाई मूल के चीतों और उनकी पीढ़ी की कुल संख्या 25 तक पहुंच चुकी है। इसके कुछ महीने बाद 18 फरवरी 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते भारत लाए गए, जिनमें से आठ आज भी जीवित हैं और इनकी दस भारतीय संतानों को जोड़कर दक्षिण अफ्रीकी मूल की कुल संख्या 18 हो गई है, जिनमें से 15 कूनो में और तीन गांधी सागर में रह रहे हैं। इस साल फरवरी में इस कुनबे में एक और नया अध्याय जुड़ा, जब बोत्सवाना से नौ और चीते भारत लाए गए, जिससे परियोजना का अंतरराष्ट्रीय आधार और मज़बूत हुआ। लेकिन यह सफर आसान नहीं रहा। प्रोजेक्ट चीता के निदेशक उत्तम कुमार शर्मा ने अपनी "फोर ईयर्स ऑफ चीताज़ इन इंडिया" नामक समीक्षा रिपोर्ट में इसे लगातार सीखने, ढलने, झटके सहने और फिर उबरने की एक प्रक्रिया बताया है। परियोजना का पहला साल सबसे कठिन साबित हुआ। मार्च से अगस्त 2023 के बीच, छह वयस्क चीतों और शुरुआती चार शावकों में से तीन की मौत हो गई थी। उस मुश्किल दौर में एक अकेला शावक बचा, जिसे उसकी मां ने त्याग दिया था और जिसके जीवित रहने की उम्मीद लगभग खत्म मानी जा रही थी। आज वही शावक "मुखी" के नाम से जानी जाती है और अब खुद पांच स्वस्थ शावकों की मां बन चुकी है। इसी संकट के दौर में कूनो की टीम ने महज़ दस दिनों में 12 चीतों को पकड़कर वापस बाड़ों में सुरक्षित किया, और दक्षिण अफ्रीकी मादा चीता निर्वा का कॉलर मानसून के दौरान खराब हो जाने पर 21 दिनों तक चली नाटकीय खोज आखिरकार उसे जीवित पाकर खत्म हुई। इन्हीं अनुभवों ने टीम को मज़बूत बनाया और आगे बढ़ने का भरोसा दिया।
इसके बाद के सालों में हालात लगातार बेहतर होते गए। दूसरे साल में सफल प्रजनन देखने को मिला, जिसमें 13 शावक एक साल से ज़्यादा उम्र तक जीवित रहे। तीसरे साल में चीतों को जंगल में छोड़ा गया और बारह ज़िलों तक फैले इंटर-स्टेट लैंडस्केप में चौबीसों घंटे उनकी निगरानी की गई, जिसमें वे सफलतापूर्वक टिके रहे। अब चौथा साल स्थापना यानी "एस्टेब्लिशमेंट" का दौर है, जिसमें चीते धीरे-धीरे अपने स्वाभाविक व्यवहार को अपनाते जा रहे हैं और कार्यक्रम नए इलाकों तक फैलाया जा रहा है।
आगे की राह क्या होगी? इस सवाल पर भोपाल के आयोजन में स्पष्ट संकेत मिले। परियोजना के अगले चरण में चीतों के लिए उपयुक्त इलाकों का विस्तार करना और भारत में एक व्यापक, दीर्घकालिक "मेटा-पॉपुलेशन" यानी अंतर-संबंधित आबादी स्थापित करना शामिल है। यानी अब सिर्फ कूनो और गांधी सागर तक सीमित न रहकर, चीतों को कई अलग-अलग अभयारण्यों में फैलाने और उनके बीच जैविक संपर्क बनाए रखने की योजना है, ताकि आबादी लंबे समय तक स्वस्थ और स्वावलंबी बनी रहे।
कुल मिलाकर, जो परियोजना कभी आलोचकों की नज़र में एक जोखिम भरा और अवैज्ञानिक प्रयोग मानी जाती थी, वह आज चार साल बाद 52 चीतों, 32 भारतीय शावकों और एक मज़बूत होती टीम के साथ खुद को साबित कर चुकी है। बेशक अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है, लेकिन कूनो के जंगलों में गूंजती चीतों की दहाड़ यह बता रही है कि सत्तर साल पुराना सूनापन अब धीरे-धीरे मिटने लगा है।