भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः वाशिंगटन से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरी दुनिया की व्यापारिक बिरादरी को चौंका दिया है। अमेरिकी संसद के निचले सदन, यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने बुधवार शाम एक ऐसा विधेयक पारित कर दिया, जो रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर सीधा आर्थिक प्रहार करने की ताकत रखता है। इस बिल का नाम है "लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026", और इसे 262 के मुकाबले 159 मतों से मंजूरी मिली। अब यह बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास हस्ताक्षर के लिए भेजा जा चुका है, और उनके दस्तखत होते ही यह औपचारिक रूप से कानून बन जाएगा।
सबसे दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि इस विधेयक की सबसे तीखी धार भारत और चीन जैसे देशों की तरफ मुड़ी हुई है। यह कानून राष्ट्रपति ट्रंप को यह अधिकार देता है कि वे रूस से तेल और गैस खरीदने वाले शीर्ष पांच देशों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क, यानी टैरिफ, लगा सकें। साथ ही यह रूसी अधिकारियों, बैंकों और उन तेल टैंकरों पर भी प्रतिबंध लगाने का रास्ता खोलता है, जो रूस के ऊर्जा उत्पादों को दुनिया भर में पहुंचाने का काम करते हैं। हालांकि इसमें एक राहत की बात भी है—जो देश रूस के कुल ऊर्जा निर्यात का 15 प्रतिशत से कम हिस्सा खरीदते हैं, या जिन्होंने अपनी खरीद घटाने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं, उन्हें इस टैरिफ की मार से छूट मिल सकती है।
इस बिल के पास होने के पीछे की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। यह विधेयक मूल रूप से रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम और डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल की साझा कोशिश थी, जिसे शुरू से ही दोनों दलों का व्यापक समर्थन मिला था। दुख की बात यह रही कि जुलाई महीने में सीनेटर ग्राहम, जो इस बिल के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते थे, का निधन हो गया। उनकी अंत्येष्टि में खुद यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की अमेरिका पहुंचे थे, और उन्होंने सीनेट के सदस्यों से इस बिल को पारित करने की अंतिम अपील की थी। यही भावनात्मक और राजनीतिक दबाव आगे चलकर इस बिल के पारित होने की एक बड़ी वजह बना। यह बिल पहले ही सीनेट से पास हो चुका था, और अब हाउस से भी मंजूरी मिलने के बाद इसके कानून बनने में कोई बड़ी बाधा नहीं बची है।
वोटिंग के आंकड़े भी खासे दिलचस्प रहे। इस बिल के पक्ष में 203 रिपब्लिकन, 58 डेमोक्रेट्स और एक निर्दलीय सांसद ने मतदान किया, जबकि सात रिपब्लिकन और 152 डेमोक्रेट्स ने इसका विरोध किया। यानी यह मुद्दा पूरी तरह से पार्टी लाइन के हिसाब से नहीं बंटा—कुछ सांसदों को यह चिंता सता रही थी कि इस कानून से राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का इतना व्यापक अधिकार मिल जाएगा, जो पहले से ही आर्थिक हथियार की तरह टैरिफ का इस्तेमाल कर रहे एक राष्ट्रपति के हाथ में और ज्यादा ताकत सौंपने जैसा है।
अब सवाल यह उठता है कि आखिर भारत को इस पूरे मामले से क्यों जोड़ा जा रहा है? दरअसल, यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद लगातार बढ़ाता रहा है। अमेरिकी सांसदों और प्रशासन का आरोप है कि यह सस्ता तेल दरअसल रूस की युद्ध मशीनरी को आर्थिक ईंधन दे रहा है। डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंथल ने बिल पास होने के बाद पत्रकारों से सीधे शब्दों में कहा कि चीन और भारत को अब अपने तेल और गैस के लिए कोई और ठिकाना ढूंढना होगा। वहीं सीनेटर जीन शाहीन ने कहा कि रूस अपने "शैडो फ्लीट" यानी छुपे हुए टैंकर बेड़े के जरिए यह तेल बेच रहा है, जिसे बाजार दर से कम कीमत पर खरीदा जा रहा है, और इसका सबसे बड़ा हिस्सा चीन और भारत जैसे देशों को जा रहा है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि यह बिल ऐसे समय पास हुआ है, जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की आधिकारिक अमेरिका यात्रा बस कुछ ही दिन दूर है। ऐसे में यह टाइमिंग रणनीतिक रूप से भी काफी अहम मानी जा रही है। भारत के लिए यह खबर इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यह अमेरिका की तरफ से लगाए जा रहे मौजूदा टैरिफ के ऊपर एक नई परत जोड़ सकती है। पहले ही रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगाए जा चुके हैं, और अब यह नया कानून उस दबाव को और बढ़ा सकता है।
अब सबकी निगाहें राष्ट्रपति ट्रंप के अगले कदम पर टिकी हैं। बिल पर हस्ताक्षर होते ही उनके हाथ में एक ऐसा शक्तिशाली आर्थिक हथियार आ जाएगा, जिसका इस्तेमाल वे अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं के हिसाब से कर सकते हैं। लेकिन असली सवाल यह है—क्या यह कानून सच में रूस को झुकाने में कामयाब होगा, या फिर इसका सीधा असर भारत जैसे उन देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जो सिर्फ अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं? आने वाले हफ्तों में इस सवाल का जवाब साफ होना शुरू हो जाएगा, और भारत की कूटनीतिक टीम के लिए यह वक्त बेहद अहम साबित होने वाला है।