भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः नौकरीपेशा तबके के लिए मोदी सरकार ने वह फैसला आखिरकार ले ही लिया, जिसका इंतजार बरसों से किया जा रहा था। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के तहत अनिवार्य कवरेज की वेतन सीमा को ₹15,000 प्रति माह से बढ़ाकर सीधे ₹25,000 प्रति माह कर दिया है। यह कोई मामूली बदलाव नहीं है, बल्कि पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय में सामाजिक सुरक्षा ढांचे में हुआ सबसे बड़ा सुधार है। श्रम मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार इस फैसले से करीब 51 लाख अतिरिक्त कर्मचारी अब अनिवार्य रूप से प्रोविडेंट फंड और पेंशन योजना के दायरे में आ जाएंगे।
जरा सोचिए, आखिरी बार यह सीमा कब बदली गई थी? सितंबर 2014 में, जब इसे ₹6,500 से बढ़ाकर ₹15,000 किया गया था। उसके बाद से 11 साल गुजर चुके हैं। इन 11 सालों में महंगाई कई गुना बढ़ी, न्यूनतम मजदूरी दरें ऊपर गईं, शहरों में रहने-खाने का खर्च आसमान छूने लगा, लेकिन कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की वेतन सीमा वहीं अटकी रही। नतीजा यह हुआ कि जो कर्मचारी ₹15,000 से ज्यादा कमाते थे, वे भले ही संगठित क्षेत्र में काम करते हों, पर उन्हें अनिवार्य सामाजिक सुरक्षा का कवच नहीं मिल पाता था। सरकार ने अब माना है कि पिछले दशक में वेतन वृद्धि, बढ़ती आमदनी और औपचारिक रोजगार के विस्तार को देखते हुए यह सीमा बढ़ाना जरूरी हो गया था।
सबसे बड़ा फायदा उन कर्मचारियों को होगा जिनकी मासिक आय ₹15,000 से ₹25,000 के बीच है। अब तक ये लोग या तो कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के दायरे से बाहर रहते थे या फिर स्वैच्छिक आधार पर ही जुड़ पाते थे। नए नियम के लागू होने के बाद ऐसे तमाम कर्मचारी स्वतः ही प्रोविडेंट फंड बचत, पेंशन योजना और बीमा सुरक्षा के दायरे में शामिल हो जाएंगे। छोटे शहरों और कस्बों में काम करने वाले युवा, फैक्ट्री कर्मचारी, दुकानों-प्रतिष्ठानों में काम करने वाले कर्मचारी—इन सबके लिए यह फैसला रिटायरमेंट की योजना बनाने का एक नया और मजबूत जरिया बनकर सामने आया है।
इस बदलाव का एक पहलू यह भी है कि अब नियोक्ताओं यानी कंपनियों पर वित्तीय जिम्मेदारी थोड़ी बढ़ जाएगी। जब वेतन सीमा बढ़ती है, तो कंपनियों को अधिक कर्मचारियों के लिए अपने हिस्से का अंशदान जमा करना होता है, जो कि मूल वेतन और महंगाई भत्ते का एक निश्चित प्रतिशत होता है। जानकारों का मानना है कि इससे कंपनियों की पेरोल लागत में कुछ बढ़ोतरी जरूर होगी, लेकिन दीर्घकाल में यह कर्मचारियों की वफादारी और संतुष्टि बढ़ाने वाला कदम साबित होगा, जिसका असर कंपनियों के कामकाज पर भी सकारात्मक ही पड़ेगा।
बहुत से कर्मचारी अभी से यह सवाल पूछ रहे हैं कि इस बदलाव के बाद उनकी हाथ में आने वाली सैलरी घटेगी या बढ़ेगी। दरअसल जिन कर्मचारियों का मूल वेतन ₹15,000 से ₹25,000 के बीच है, उनके वेतन से अब पहले से ज्यादा राशि PF खाते में कटेगी, जिससे टेक-होम सैलरी में मामूली कमी आ सकती है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि यह पैसा कहीं गायब नहीं हो रहा, बल्कि सीधे कर्मचारी के अपने भविष्य निधि खाते में जमा हो रहा है, जिस पर हर साल ब्याज भी मिलता रहेगा। यानी अल्पकाल में हाथ में आने वाला पैसा भले थोड़ा कम लगे, दीर्घकाल में रिटायरमेंट के समय यही रकम एक बड़ी बचत के रूप में सामने आएगी।
सरकार की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि यह फैसला "समावेशी, मजबूत और भविष्य के लिए तैयार सामाजिक सुरक्षा ढांचे" के निर्माण की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है, और यह देश को विकसित भारत@2047 के लक्ष्य के करीब ले जाने वाला बताया गया है। अब गेंद श्रम मंत्रालय और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के पाले में है, जिन्हें इस फैसले को अमल में लाने के लिए जरूरी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करनी होंगी। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले हफ्तों में इस संबंध में औपचारिक अधिसूचना जारी होगी, जिसके बाद ही यह बदलाव व्यावहारिक रूप से लागू होगा।
कुल मिलाकर देखा जाए तो यह फैसला भारत के करोड़ों कामकाजी लोगों, खासकर मध्यम और निम्न-मध्यम आय वर्ग के कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर है। जिन कर्मचारियों को अब तक अनौपचारिक सुरक्षा के भरोसे नौकरी करनी पड़ती थी, उन्हें अब कानूनी रूप से सुनिश्चित सामाजिक सुरक्षा कवच मिलेगा। हालांकि इसका पूरा असर तभी समझ में आएगा जब आधिकारिक अधिसूचना जारी होगी और इसकी बारीकियां स्पष्ट होंगी। तब तक के लिए इतना जरूर कहा जा सकता है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की वेतन सीमा बढ़ाने का यह फैसला भारत के सामाजिक सुरक्षा तंत्र में एक नए युग की शुरुआत का संकेत जरूर दे रहा है।