भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग जैसे-जैसे लंबी खिंचती जा रही है, ईरान ने अमेरिका के सामने एक स्पष्ट और सख्त संदेश रख दिया है — अगर बातचीत चाहिए तो पहले तेहरान की शर्तें माननी होंगी। यह चेतावनी किसी आम बयान से कहीं ज्यादा तीखी है, और इसके पीछे का इशारा साफ है: वाशिंगटन खुद अपने बनाए दलदल में फंसा है।
ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रज़ाई ने खुलासा किया है कि तेहरान ने अमेरिका के साथ बातचीत शुरू करने के लिए सात शर्तें तय की हैं, और यह प्रस्ताव कतर की मध्यस्थता के जरिए वाशिंगटन तक पहुंचाया जा चुका है। रज़ाई के अनुसार, यह संदेश "स्पष्ट और असंदिग्ध" है — यानी इसमें कोई गुंजाइश या अस्पष्टता नहीं छोड़ी गई है।
सोशल मीडिया पर एक्स पर पोस्ट करते हुए रज़ाई ने कहा कि अगर वाशिंगटन खुद के बनाए संकट से बाहर निकलना चाहता है और इसमें और उलझने से बचना चाहता है, तो उसके पास ईरान के अधिकारों और शर्तों को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यह बयान सीधे तौर पर अमेरिकी रणनीति पर सवाल खड़ा करता है और यह संकेत देता है कि ईरान अब दबाव में झुकने के मूड में नहीं है।
तीन शर्तें सार्वजनिक, बाकी अब भी रहस्य
हालांकि रज़ाई ने सातों शर्तों की पूरी और आधिकारिक सूची सार्वजनिक नहीं की है, लेकिन उन्होंने तीन प्रमुख मांगों का खुलासा जरूर किया। पहली शर्त है — सभी मोर्चों पर युद्ध का पूर्ण अंत। दूसरी है — ईरान की जमी हुई वित्तीय संपत्तियों को रिहा करना। और तीसरी शर्त है — अमेरिका द्वारा लगाई गई नौसैनिक नाकाबंदी को हटाना।
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक बाकी बची शर्तों में प्रतिबंधों में राहत, समुद्री सुरक्षा से जुड़े आश्वासन, और क्षेत्रीय स्तर पर सैन्य तनाव में कमी जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं। हालांकि इन बिंदुओं की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, और यह अनिश्चितता खुद इस बात का संकेत है कि दोनों पक्षों के बीच भरोसे की भारी कमी बनी हुई है।
रज़ाई के बयान में सिर्फ शर्तें ही नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी छिपी है। उन्होंने कहा कि वाशिंगटन के हित में यही है कि वह इन शर्तों को मान ले, क्योंकि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों से कुछ हासिल नहीं होने वाला। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह एक "निर्णायक युद्ध" के लिए पूरी तरह तैयार है।
यह बयान बताता है कि तेहरान बातचीत का दरवाजा भले खुला रखे हुए है, लेकिन वह किसी भी सूरत में दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं। रज़ाई ने यह भी संकेत दिया कि ईरानी सैन्य आकलन के आधार पर अमेरिका की ओर से एक और हमले की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता, और तेहरान ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है।
यह पहला मौका नहीं है जब ईरान ने युद्ध खत्म करने के लिए शर्तें रखी हों। इससे पहले मार्च में, जब अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में जंग तीसरे हफ्ते में पहुंची थी, तब ईरानी राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने तीन शर्तें रखी थीं — अपने अधिकारों की मान्यता, हर्जाने का भुगतान, और भविष्य में आक्रमण न होने की गारंटी।
इसके कुछ ही दिनों बाद ईरान के सरकारी टेलीविजन ने अमेरिका के 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव के जवाब में पांच शर्तों की एक सूची पेश की, जिसमें युद्ध से हुए नुकसान का हर्जाना और होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरान के नियंत्रण की औपचारिक मान्यता जैसी मांगें शामिल थीं। एक अलग बयान में भी तेहरान ने पांच शर्तें दोहराईं — आक्रामकता का अंत, युद्ध दोबारा न होने की ठोस गारंटी, युद्ध क्षति और हर्जाने का भुगतान, सभी मोर्चों पर और सभी प्रतिरोध समूहों के खिलाफ जंग का पूर्ण अंत, और होर्मुज जलडमरूमध्य पर ईरानी संप्रभुता।
इन बदलती हुई शर्तों की सूची से यह भी झलकता है कि युद्ध की परिस्थितियां जैसे-जैसे बदलती गई हैं, तेहरान अपनी मांगों को भी उसी हिसाब से समायोजित करता रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या वाशिंगटन इन शर्तों को स्वीकार करेगा, या फिर तनाव और बढ़ेगा। अमेरिका पहले भी अपने 15-सूत्रीय प्रस्ताव में ईरान से परमाणु हथियार कार्यक्रम को पूरी तरह छोड़ने और मौजूदा परमाणु क्षमताओं को नष्ट करने की मांग कर चुका है — यानी दोनों पक्षों के बीच खाई अब भी काफी गहरी है।
कतर और पाकिस्तान जैसे देश तेहरान और वाशिंगटन के बीच बातचीत फिर शुरू कराने की कोशिशों में जुटे हैं, और क्षेत्र के कई देश भी इस संघर्ष को जल्द खत्म कराने के पक्ष में दबाव बना रहे हैं। लेकिन जब तक अमेरिका और ईरान दोनों अपनी-अपनी बुनियादी शर्तों पर अड़े रहेंगे, तब तक स्थायी शांति की उम्मीद दूर की कौड़ी ही नजर आती है।
फिलहाल गेंद वाशिंगटन के पाले में है। अगर ट्रंप प्रशासन ईरान की शर्तों को नजरअंदाज करता है, तो रज़ाई की चेतावनी के मुताबिक क्षेत्र एक और बड़े और खतरनाक टकराव की ओर बढ़ सकता है — ऐसा टकराव जिसकी आंच सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगी।