भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारत और न्यूज़ीलैंड के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बड़ा मोड़ आ गया है। दोनों देशों के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट अब पूरी तरह फाइनल हो चुका है और यह 20 अक्टूबर 2026 से यानी दशहरे के शुभ अवसर से लागू हो जाएगा। इस समझौते के तहत भारत से न्यूज़ीलैंड जाने वाले शत-प्रतिशत यानी सौ फीसदी निर्यात को शुल्क-मुक्त यानी ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी। यह ऐलान सोमवार को केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने नई दिल्ली में किया, जहां उन्होंने वर्चुअली न्यूज़ीलैंड के व्यापार एवं निवेश मंत्री टॉड मैक्ले के साथ बातचीत की।
गोयल ने इस मौके पर कहा कि यह दोनों देशों के आर्थिक साझेदारी के सफर में अगला अहम पड़ाव है, और यह संयोग ही है कि यह समझौता दशहरे जैसे शुभ मौके पर लागू हो रहा है। दूसरी ओर न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस पर खुशी जताते हुए लिखा कि लगभग तीन साल पहले उन्होंने वादा किया था कि उनकी सरकार पहले ही कार्यकाल में भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर दिखाएगी, और आज यह वादा पूरा हो गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इस समझौते से कारोबार बढ़ेगा, नई नौकरियां पैदा होंगी और न्यूज़ीलैंड के लोगों की आमदनी में इजाफा होगा।
अब सवाल उठता है कि इस समझौते से भारत को असल में क्या मिलेगा। जवाब सीधा है — निर्यात के मामले में यह भारत के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है। पहले न्यूज़ीलैंड कई भारतीय उत्पादों पर 10 प्रतिशत तक टैरिफ यानी आयात शुल्क वसूलता था। इनमें सिरेमिक, कारपेट, ऑटोमोबाइल और ऑटो कलपुर्जे जैसे प्रोडक्ट्स शामिल थे। अब समझौता लागू होते ही ये सारे शुल्क खत्म हो जाएंगे, जिससे भारतीय सामान न्यूज़ीलैंड के बाजार में पहले से ज्यादा सस्ता और प्रतिस्पर्धी बन जाएगा।
इस डील का सबसे ज्यादा फायदा उन सेक्टर्स को मिलने की उम्मीद है जो बड़ी संख्या में रोजगार देते हैं। इनमें टेक्सटाइल और परिधान, लेदर और फुटवियर, जेम्स एंड ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, प्रोसेस्ड फूड्स और रासायनिक उत्पाद प्रमुख हैं। पिछले एक दशक में न्यूज़ीलैंड को भारत के टेक्सटाइल और परिधान निर्यात में लगातार सकारात्मक रुझान देखा गया है, और अब शुल्क-मुक्त पहुंच मिलने के बाद इस रफ्तार में और तेजी आने की संभावना जताई जा रही है। इसके अलावा लकड़ी के लट्ठे, कोकिंग कोल और मेटल स्क्रैप जैसे कच्चे माल तक भी भारत को ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी, जिससे घरेलू मैन्युफैक्चरिंग की लागत घटाने में मदद मिल सकती है।
बदले में भारत ने भी न्यूज़ीलैंड को रियायतें दी हैं। भारत ने अपने लगभग 70 प्रतिशत टैरिफ लाइनों और द्विपक्षीय व्यापार के करीब 95 प्रतिशत हिस्से पर शुल्क में छूट देने की पेशकश की है। यानी यह डील एकतरफा नहीं, बल्कि दोनों देशों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित तरीके से तैयार की गई है।
व्यापार के अलावा इस समझौते की एक और खासियत निवेश को लेकर की गई प्रतिबद्धता है। न्यूज़ीलैंड ने अगले 15 वर्षों में भारत में करीब 20 अरब डॉलर यानी लगभग 20 बिलियन डॉलर के निवेश की सुविधा देने का भरोसा दिलाया है। दिलचस्प बात यह है कि यह दूसरा ऐसा व्यापार समझौता है जिसमें भारत को किसी विदेशी साझेदार से स्पष्ट रूप से तय निवेश प्रतिबद्धता मिली है। इससे पहले यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन देशों ने भारत में 15 वर्षों में 100 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था।
इसके साथ ही यह समझौता भारतीय छात्रों और कुशल पेशेवरों के लिए न्यूज़ीलैंड में आवाजाही और अवसरों को भी आसान बनाएगा, जिससे शिक्षा और रोजगार दोनों क्षेत्रों में नई संभावनाएं खुलने की उम्मीद है।
अगर दोनों देशों के मौजूदा व्यापारिक रिश्तों की बात करें, तो सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत-न्यूज़ीलैंड के बीच माल व्यापार 2023-24 के 873 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 1.3 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था, यानी करीब 49 प्रतिशत की बढ़त दर्ज हुई। हालांकि 2025-26 में यह आंकड़ा कुछ नरम पड़ा और द्विपक्षीय माल व्यापार करीब 11 प्रतिशत घटकर 1.15 बिलियन डॉलर पर आ गया। इस दौरान भारत का निर्यात 566.51 मिलियन डॉलर और आयात 589.1 मिलियन डॉलर रहा। वहीं वस्तुओं और सेवाओं को मिलाकर कुल द्विपक्षीय व्यापार 2024 में 2.4 बिलियन डॉलर आंका गया था।
इसी पृष्ठभूमि में अब यह नया समझौता उम्मीद जगाता है कि व्यापार में आई सुस्ती पीछे छूट जाएगी। दरअसल इस पूरी डील का लक्ष्य ही यह है कि 2030 तक दोनों देशों के बीच वस्तु और सेवा व्यापार को दोगुना कर दिया जाए। गौरतलब है कि दोनों देशों ने इस समझौते पर 27 अप्रैल 2026 को नई दिल्ली में हस्ताक्षर किए थे, जबकि बातचीत दिसंबर 2025 में ही पूरी हो चुकी थी। हाल ही में न्यूज़ीलैंड की संसद में भी इस डील को मंजूरी मिल गई, जिसके बाद अब इसके औपचारिक क्रियान्वयन की तारीख तय कर दी गई है।
अब जब गिनती के दिन बचे हैं और 20 अक्टूबर की तारीख करीब आ रही है, निर्यातकों से लेकर उद्योग जगत तक सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि यह समझौता जमीनी स्तर पर कितनी तेजी से असर दिखाता है। अगर विशेषज्ञों की मानें, तो टेक्सटाइल, चमड़ा, आभूषण और इंजीनियरिंग जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए यह एक सुनहरा मौका साबित हो सकता है, जो न सिर्फ निर्यात बढ़ाएगा बल्कि रोजगार के नए दरवाजे भी खोल सकता है। कुल मिलाकर, दशहरे के मौके पर लागू हो रहा यह समझौता भारत के लिए वाकई एक शुभ संकेत माना जा रहा है।