भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः भारत का निर्वाचन आयोग एक बार फिर उस जगह खड़ा है जहाँ सवाल सिर्फ़ किसी एक चुनाव या एक सूची के नहीं, बल्कि पूरी संस्था की साख के हैं। मामला अदालत की चौखट से लेकर सड़क तक पहुँच चुका है। एक तरफ़ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध अवमानना कार्रवाई की माँग करती याचिका है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के कथित उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। दूसरी तरफ़ एक नई कॉकरोच जनता पार्टी ने उन्हें इस्तीफ़े के लिए 48 घंटे की मोहलत दे दी है। ये दोनों दावे आरोप हैं, अंतिम निष्कर्ष नहीं, और यह बात शुरू में ही साफ़ रहनी चाहिए। गुरुवार को नई दिल्ली में हुई प्रेस वार्ता में कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने चेतावनी दी कि अगर कुमार 48 घंटे में पद नहीं छोड़ते, तो पार्टी देशव्यापी आंदोलन शुरू करेगी। पार्टी की माँगों की फ़ेहरिस्त लंबी है। उसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही, आगामी चुनावों पर रोक, एस आई आर को रोकना, जनवरी 2025 की मतदाता सूची की बहाली और पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र जाँच शामिल है। इतना ही नहीं, पार्टी ने 2023 के उस क़ानून को रद्द करने की भी माँग की है जिसके तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति होती है।
सवाल उठता है कि एक अपेक्षाकृत नई पार्टी इतना बड़ा दाँव क्यों खेल रही है। जवाब शायद उसकी टाइमिंग में छिपा है। टाइमिंग यह है कि एक दिन पहले एक समाचार पत्र की एक रिपोर्ट ने माहौल गरमा दिया था। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फ़ैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। ये आपत्तियाँ मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने से लेकर पंजीकरण प्रक्रिया में बदलाव तक से जुड़ी बताई गईं। यानी जिस तीन सदस्यीय संस्था की ताक़त सामूहिक निर्णय में मानी जाती है, उसके भीतर असहमति की ख़बर बाहर आ गई। विपक्ष के हाथ में मुद्दा आ गया। आयोग का पक्ष अलग है। उसका कहना है कि एस आई आर समेत सभी फ़ैसले सर्वसम्मति से और तीनों आयुक्तों की मंज़ूरी से लिए गए। आयोग के सूत्रों के हवाले से यह भी कहा गया कि बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय में मतभेद, लिखित टिप्पणियाँ और आंतरिक जाँच-पड़ताल कामकाज का सामान्य हिस्सा हैं।
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने भी कहा है कि आयोग के भीतर निर्णय अंततः सहमति या बहुमत से ही होते हैं। यह तर्क अपनी जगह वज़नदार है, क्योंकि असहमति दर्ज होना अपने आप में गड़बड़ी का प्रमाण नहीं होता। पर सवाल यह भी है कि अगर सब कुछ सर्वसम्मत था, तो आपत्तियाँ दर्ज कराने की नौबत ही क्यों आई। इसका संतोषजनक जवाब सार्वजनिक होना चाहिए। एस आई आर की बहस का दूसरा सिरा पश्चिम बंगाल से जुड़ा है, जहाँ आँकड़े ख़ुद कहानी कहते हैं। आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि राज्य में 27.16 लाख मतदाता हटाए गए और बहाली के लिए 22 लाख से ज़्यादा अपीलें दायर हुई हैं। इन अपीलों की संख्या बताती है कि बड़ी तादाद में लोग मानते हैं कि उनका नाम ग़लत कटा। आयोग के अनुसार हटाए गए नाम मुख्यतः दोहरी प्रविष्टि, मृत्यु, स्थानांतरण या अपात्रता के हैं। विपक्ष का आरोप है कि असली मतदाता भी सूची से बाहर हुए। कॉकरोच जनता पार्टी ने तो यह तक दावा किया है कि केंद्रीकृत व्यवस्था में कोई मतदाता स्थानीय निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी की नज़र में पात्र पाया जाकर भी अंतिम सूची से बाहर रह सकता है। इस दावे की जाँच होनी चाहिए, क्योंकि यह सीधे प्रक्रिया की बनावट पर सवाल है।
अब बात उस अवमानना याचिका की। अदालत की अवमानना का आरोप गंभीर होता है, क्योंकि उसका अर्थ है कि किसी संवैधानिक पदाधिकारी ने न्यायालय के निर्देशों की अनदेखी की। यह आरोप अभी याचिकाकर्ता का है, और इस पर फ़ैसला न्यायालय को ही करना है। याचिका की बारीकियों पर अभी सार्वजनिक जानकारी सीमित है, इसलिए निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी। पर इतना तय है कि जब सवाल अदालत के आदेशों के पालन का हो, तो जवाबदेही की माँग और तेज़ हो जाती है।
विपक्ष भी इस लड़ाई में खुलकर उतरा है। ख़बरों के मुताबिक़ उसने एस आई आर रद्द करने और मुख्य चुनाव आयुक्त पर महाभियोग चलाने तक की माँग उठाई है। कॉकरोच जनता पार्टी ने राजनीतिक दलों से यह अपील भी की कि अगर उन्हें लगता है कि चुनाव में धाँधली हो रही है, तो वे चुनाव लड़ते हुए शिकायत न करें, बल्कि स्पष्ट रुख़ अपनाएँ। यह बात सुनने में दमदार लगती है, पर व्यावहारिक राजनीति में चुनाव का बहिष्कार एक बड़ा और जोखिम भरा फ़ैसला है।
तो असली बात क्या है? असली बात यह है कि आज चुनाव आयोग पर सबसे बड़ा संकट फ़ैसलों की वैधता से ज़्यादा भरोसे का है। आयोग की ताक़त उसके आदेशों में नहीं, जनता की इस धारणा में है कि वह सबके लिए बराबर है। इसलिए उसे चाहिए कि हटाए गए नामों के कारण सार्वजनिक करे, अपीलों का समयबद्ध निपटारा करे और आयुक्तों के बीच मतभेद पर स्थिति साफ़ करे। दूसरी तरफ़, आंदोलन का रास्ता चुनने वालों को भी ठोस प्रमाण सामने रखने होंगे, क्योंकि केवल अल्टीमेटम से संस्थाएँ नहीं सुधरतीं।
लोकतंत्र में रेफ़री पर सवाल उठना कोई अजूबा नहीं, पर रेफ़री का ख़ुद संदेह के घेरे में आ जाना गंभीर चेतावनी है। अब निगाहें सर्वोच्च न्यायालय पर हैं, और 48 घंटे की घड़ी टिक-टिक कर रही है।