भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः देश की राजनीति में कुछ बैठकें सिर्फ चाय-बिस्कुट और तस्वीरों तक सीमित रह जाती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो आने वाले चुनावों की पूरी पटकथा बदल सकती हैं। इंडिया गठबंधन की ताज़ा बैठक दूसरी श्रेणी में गिनी जा रही है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मंच से जो बात रखी, उसने सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। उनकी मांग साफ थी: भविष्य के चुनाव उस मतदाता सूची पर हों जो विशेष गहन पुनरीक्षण, यानी एसआईआर, से पहले मौजूद थी। साथ ही मतदान ईवीएम की जगह मतपत्रों से कराने की वकालत भी की गई।
पहले समझ लें कि विवाद की जड़ क्या है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूचियों की शुद्धता के नाम पर गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू की। आयोग का तर्क है कि सूची में मृत, दोहरे और फर्जी नाम हटाना ज़रूरी है ताकि चुनाव निष्पक्ष रहें। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इस कवायद में असली मतदाताओं के नाम भी कट रहे हैं, और उनमें भी अधिकतर गरीब, प्रवासी, अल्पसंख्यक और हाशिये के लोग हैं, जिनके पास मांगे गए कागज़ात जुटाने का समय या साधन नहीं होता। खड़गे की मांग इसी आशंका से निकली है।
सवाल यह है कि पुरानी सूची पर लौटने की बात क्यों उठी? विपक्ष का कहना है कि जिस प्रक्रिया पर ही भरोसा डगमगा गया हो, उसके नतीजों पर होने वाला चुनाव कैसे पूरी तरह विश्वसनीय माना जाए। लोकतंत्र में मतदाता का नाम सूची में होना उसका सबसे बुनियादी अधिकार है। अगर किसी का नाम गलती से भी कट जाए, तो उसके लिए सरकार चुनने का दरवाज़ा ही बंद हो जाता है। एक भी योग्य मतदाता का बाहर होना पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करता है।
दूसरी मांग और भी बड़ी है: ईवीएम की जगह मतपत्र। यह बहस नई नहीं है। पिछले एक दशक में हर बड़ी चुनावी हार या विवादित नतीजे के बाद यह मुद्दा किसी न किसी रूप में लौटता रहा है। विपक्षी दल अलग-अलग मौकों पर मशीनों की पारदर्शिता, वीवीपैट पर्चियों के मिलान और तकनीकी छेड़छाड़ की आशंका पर सवाल उठाते रहे हैं। चुनाव आयोग हर बार यही कहता आया है कि ईवीएम पूरी तरह सुरक्षित हैं, इंटरनेट से कटी हैं और उनमें गड़बड़ी संभव नहीं। सर्वोच्च न्यायालय भी पहले इन मशीनों पर भरोसा जता चुका है।
अब सवाल उठता है कि क्या मतपत्र की वापसी व्यावहारिक है? यहां इतिहास और अनुभव दोनों को देखना होगा। बैलेट के दौर में बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान और मतपेटियों की लूट जैसी घटनाएं आम थीं। मतगणना में कई दिन लग जाते थे और अवैध घोषित मतों की संख्या भी बड़ी होती थी। ईवीएम के समर्थक इन्हीं कमियों का हवाला देते हैं। उनका कहना है कि मशीनों ने चुनाव को तेज़, सरल और अपेक्षाकृत निष्पक्ष बनाया है। यानी पीछे लौटना केवल भावनात्मक नारा नहीं, एक जटिल प्रशासनिक चुनौती भी है।
फिर भी विपक्ष की दलील को हल्के में लेना ठीक नहीं होगा। लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना काफी नहीं है, निष्पक्ष दिखना भी उतना ही ज़रूरी है। यदि करोड़ों मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में यह भावना घर करने लगे कि प्रक्रिया पर उनका भरोसा नहीं रहा, तो यह किसी एक दल की नहीं, पूरी व्यवस्था की समस्या बन जाती है। इसलिए चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी है कि वह संदेह को केवल खारिज न करे, बल्कि तथ्यों और खुली जांच से उसका जवाब दे।
राजनीतिक नज़र से देखें तो इस बयान का समय भी दिलचस्प है। विपक्ष एकजुटता की तलाश में है और उसे एक साझा मुद्दा चाहिए जो अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को एक मंच पर बांध सके। चुनावी पारदर्शिता ऐसा ही मुद्दा है। मतदाता सूची और मतदान प्रणाली, दोनों पर एक स्वर में सवाल उठाकर गठबंधन खुद को लोकतंत्र के रक्षक के रूप में पेश करना चाहता है। सत्ता पक्ष इसे हार की आशंका से उपजी बहानेबाज़ी बताएगा, यह भी तय है।
यहां एक ईमानदार सवाल विपक्ष से भी बनता है। जिन राज्यों में विपक्षी दल जीतते हैं, वहां भी ईवीएम से ही चुनाव होते हैं। क्या तब मशीनें भरोसेमंद हो जाती हैं? यह विरोधाभास विपक्ष की दलील को कमज़ोर करता है। अगर मांग सिद्धांत पर आधारित है, तो उसे जीत और हार, दोनों हालात में एक जैसी दृढ़ता से उठाना होगा। तभी जनता इसे राजनीतिक सुविधा नहीं, वास्तविक चिंता मानेगी।
रास्ता क्या हो सकता है? एक संतुलित समाधान यह है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पूरी पारदर्शिता बरती जाए। हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक हो, कारण दर्ज हों और आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया आसान बनाई जाए। ईवीएम के मामले में वीवीपैट पर्चियों के अधिक मिलान और स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट जैसे उपाय भरोसा बढ़ा सकते हैं। इससे न मतपत्र के पुराने दोष लौटेंगे और न मशीनों पर संदेह बना रहेगा।
अंततः यह विवाद हमें एक बड़ी बात याद दिलाता है। चुनाव आयोग, सरकार और विपक्ष, तीनों से पहले इस देश का मतदाता है। मताधिकार किसी दल की जागीर नहीं, नागरिक की सबसे बड़ी ताकत है। खड़गे की मांग स्वीकार हो या न हो, इसने एक ज़रूरी बहस को फिर जीवित कर दिया है। अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में है। उसे तय करना है कि वह संदेह के बादल छांटेगा या उन्हें और घना होने देगा। लोकतंत्र की साख इसी जवाब पर टिकी है।