भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः पंजाब की राजनीति में इन दिनों वही हो रहा है, जो चुनाव से ठीक पहले अक्सर होता है। घोषणाओं की झड़ी लगी है और यात्राएँ निकल रही हैं। कल तक जो कर्मचारी सड़कों पर थे, आज उनके लिए तोहफ़ों की बात हो रही है। जो मुद्दा पहले हाशिये पर रहता था, वह अचानक मंच के बीचोंबीच आ गया है। 2027 की विधानसभा दौड़ की घंटी बज चुकी है और सूबे की सियासत दो मोर्चों पर एक साथ गरमा गई है। एक मोर्चा सरकारी मुलाज़िमों के महँगाई भत्ते का है, दूसरा नशे के ख़िलाफ़ भाजपा की यात्रा का।
आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए बीते कुछ हफ़्ते आसान नहीं रहे। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 3 अगस्त को आदेश दिया कि लगभग 14,191 करोड़ रुपये की बकाया मंहगाई भत्ता और महँगाई राहत की देनदारी 15 दिन के भीतर चुकाई जाए। सरकार ने इसे आर्थिक रूप से असंभव बताकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। मामला वहाँ लंबित है। इस बीच कर्मचारी संगठनों का सब्र जवाब दे गया। धरने हुए, सामूहिक आकस्मिक अवकाश हुआ और कई जगह सरकारी कामकाज पर असर पड़ा।
चार लाख कर्मचारी और साढ़े तीन लाख पेंशनभोगी किसी भी सरकार के लिए मामूली आँकड़ा नहीं होते। इनके साथ इनके परिवार भी जुड़े हैं, यानी लाखों वोट। शायद इसी गणित ने सरकार को बातचीत की मेज़ पर खींचा। मुख्यमंत्री भगवंत मान की अगुवाई में 12 कर्मचारी संगठनों के साथ क़रीब 90 मिनट की बैठक हुई। उसके बाद 8 प्रतिशत महँगाई भत्ता देने का ऐलान हुआ, जो चार-चार प्रतिशत की दो किस्तों में मिलेगा। इससे महँगाई भत्ता 42 से बढ़कर 50 प्रतिशत हो जाएगा। सरकार के मुताबिक़ बढ़ा हुआ भत्ता सितंबर के वेतन के साथ, यानी अक्टूबर की शुरुआत में मिलेगा। उससे पहले 2020 के बाद भर्ती हुए क़रीब 85 हज़ार कर्मचारियों के लिए भी अलग राहत की बात उठी थी।
सरकार इसे कर्मचारियों की जीत बता रही है और अपनी संवेदनशीलता का सबूत भी। मगर तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। कर्मचारी संगठनों की माँग पूरे 18 प्रतिशत लंबित महँगाई भत्ते और उसके बकाये की थी। मिला उसका बड़ा हिस्सा नहीं, सिर्फ़ 8 प्रतिशत। यानी आग बुझी नहीं, फ़िलहाल दबी है। बकाये को लेकर अदालती लड़ाई पहले की तरह जारी है और कर्मचारियों की नज़र अब इस पर टिकी है कि वादा ज़मीन पर कितनी ईमानदारी से उतरता है।
राजनीति में कुछ भी अकारण नहीं होता। महँगाई भत्ता समझौते के ठीक अगले दिन आम आदमी पार्टी ने लुधियाना से अपने चुनावी अभियान का औपचारिक आग़ाज़ कर दिया। विपक्ष इसे संयोग नहीं मानेगा। उसका सीधा आरोप होगा कि यह चुनावी मजबूरी में लिया गया फ़ैसला है। वैसे यह कोई नई बात भी नहीं है। पंजाब में चुनाव से पहले भत्ते और वेतन के तोहफ़े बाँटने की परंपरा पुरानी है। पिछली सरकारों के दौर में भी ऐसे ऐलानों को कर्मचारी संगठनों ने चुनावी स्टंट कहकर ठुकराया था।
आप की दलील यह होगी कि उसने संकट को संवाद से सुलझाया, तनाव को टाला और राजकोष की सीमाओं के बीच जितना संभव था, उतना दिया। मगर सवाल यह है कि क्या राज्य की खस्ताहाल माली हालत इस बोझ को सह पाएगी? हर महीने करोड़ों की अतिरिक्त देनदारी आख़िर कहाँ से आएगी? इन सवालों के जवाब चुनावी भाषणों में नहीं, बजट के आँकड़ों में छिपे हैं।
जब सत्ताधारी दल कर्मचारियों को साधने में जुटा था, तब भाजपा ने पंजाब में अपना बड़ा दाँव चल दिया। पार्टी ने 18 सितंबर से चार अलग-अलग रास्तों पर निकली ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ शुरू की। दावा है कि ये यात्राएँ राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों से गुज़र रही हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने पठानकोट से इसे हरी झंडी दिखाई थी। अब 30 सितंबर को जालंधर में इनका समापन है, जहाँ चारों यात्राएँ एक मंच पर मिलेंगी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह विशाल रैली को संबोधित करेंगे।
रैली की तैयारियाँ हवन और पाठ के साथ शुरू हुईं। पार्टी नशे से प्रभावित परिवारों को भी मंच पर लाने की योजना बना रही है, ताकि मुद्दे में भावनात्मक गहराई आए। संदेश साफ़ है कि नशा अब सिर्फ़ सामाजिक समस्या नहीं, चुनावी हथियार भी है।
पंजाब में नशा एक ऐसा ज़ख़्म है, जिस पर हर पार्टी ने कभी न कभी मरहम लगाने का वादा किया है। भाजपा इसे क़ानून-व्यवस्था और शासन की नाकामी से जोड़कर पेश करना चाहती है। शाह के भाषण में इसी की झलक मिलने की उम्मीद है। साथ ही वे पार्टी के संगठनात्मक विस्तार और पंजाब को लेकर उसकी बड़ी योजनाओं का ख़ाका भी रख सकते हैं।
अब तस्वीर दिलचस्प है। एक तरफ़ आप है, जिसके पास सत्ता का सहारा है और जो कर्मचारियों को राहत देकर अपनी ज़मीन बचाने में लगी है। दूसरी तरफ़ भाजपा है, जो नशे जैसे संवेदनशील मुद्दे के सहारे गाँव-गाँव पहुँचकर नई जगह बनाना चाहती है। कांग्रेस और अकाली दल भी मैदान से बाहर नहीं हैं और मौक़े की तलाश में हैं।
पंजाब का मतदाता इतना भोला नहीं है कि हर घोषणा को तोहफ़ा और हर यात्रा को क्रांति मान ले। वह भत्ते की क़िस्त और नशे से तबाह होते घरों, दोनों का हिसाब रखता है। जिस कर्मचारी को अक्टूबर में बढ़ा हुआ वेतन मिलेगा, वह देखेगा कि वादा निभा या नहीं। जिस माँ ने नशे में बेटा खोया है, वह देखेगी कि मंच से बोले गए शब्द कल कार्रवाई में बदलते हैं या नहीं।
चुनावी मौसम में वादे सस्ते और भरोसा महँगा होता है। कौन इस महँगे भरोसे को जीत पाएगा, यह 30 सितंबर की रैली से नहीं, 2027 के जनादेश से तय होगा। तब तक पंजाब की सियासत में यह दंगल और तीखा होने वाला है।