भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः कूटनीति की दुनिया में सबसे ज़्यादा वज़न अक्सर उन बातों का होता है जो धीमी आवाज़ में कही जाती हैं। न्यूयॉर्क के एशिया सोसाइटी मंच से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जो कहा, वह उसी श्रेणी में आता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के उच्च-स्तरीय सप्ताह के बाद हुई इस बातचीत में उन्होंने बिना नाम लिए, पर बिना किसी लाग-लपेट के, वॉशिंगटन को आईना दिखा दिया। उनका संदेश साफ़ था। जिस आतंकवाद ने भारत को दशकों तक लहूलुहान किया है, उसकी गंभीरता को अगर हमारा साझेदार पूरी तरह नहीं समझेगा, तो रिश्तों पर उसका असर पड़ना तय है।
पूर्व अमेरिकी राजनयिक और एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट से जुड़े डैनियल रसेल ने बातचीत का संचालन किया। उन्होंने पूछा कि बीते एक साल में व्यापार और शुल्कों को लेकर जो खटास आई है, उसके बाद दोनों देशों के संबंध पटरी पर लौटाने के लिए क्या होना चाहिए। जयशंकर ने इसका उत्तर केवल आर्थिक गणित तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने कहा कि हर देश की अपनी संवेदनशीलताएँ होती हैं। भारत के लिए पड़ोस से आने वाला आतंकवाद ऐसी ही संवेदनशीलता है। उनके मुताबिक बहुत कम देशों ने इतने लंबे समय तक ऐसा आतंक झेला है। जो मुद्दा हमें भीतर तक प्रभावित करता है, उस पर सामने वाले से समझ, सराहना और सहानुभूति की अपेक्षा रखना स्वाभाविक है। जब वह नहीं मिलती, तो रिश्ते में एक दरार पैदा होती है।
बयान में पाकिस्तान का नाम नहीं लिया गया, लेकिन संदर्भ किसी से छिपा नहीं है। पिछले एक साल में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच गर्मजोशी बढ़ी है। ऐसे में भारत की नाराज़गी की जड़ें समझना मुश्किल नहीं है। एक तरफ़ हम अमेरिका को रणनीतिक साझेदार कहते हैं और दूसरी तरफ़ वही साझेदार उस देश से नज़दीकियाँ बढ़ाता दिखता है जिसकी धरती से भारत पर हमले होते रहे हैं। यह विरोधाभास सिर्फ़ भावनात्मक नहीं है। यह भारत की सुरक्षा-नीति और उसकी जनता के भरोसे से सीधे जुड़ा प्रश्न है।
इस बयान को उस पृष्ठभूमि में पढ़ना ज़रूरी है जिसमें भारत खड़ा है। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 नागरिक मारे गए थे, जिनमें ज़्यादातर पर्यटक थे। हमले की ज़िम्मेदारी 'द रेज़िस्टेंस फ्रंट' से जुड़ी बताई गई, जिसे पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा माना जाता है। इसके जवाब में भारत ने मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' चलाया और पाकिस्तान तथा पाक-अधिकृत कश्मीर में आतंकी ढाँचे को निशाना बनाया। वह कार्रवाई भारत के लिए केवल सैन्य फ़ैसला नहीं थी। वह इस संदेश की घोषणा थी कि आतंक को अब "सहने की नीति" से नहीं देखा जाएगा।
जयशंकर ने यह भी माना कि व्यापार से जुड़ी जटिलताएँ रिश्तों को आगे बढ़ाने में बाधा हैं। लेकिन उन्होंने आतंकवाद को उसी पंक्ति में रखकर एक बड़ी बात कह दी। भारत अब यह चाहता है कि सुरक्षा का सवाल व्यापार-वार्ता की मेज़ पर छोटा मुद्दा न रहे। शुल्क घट-बढ़ सकते हैं और समझौते बन-बिगड़ सकते हैं, पर सीमा पार से आने वाली गोली और विस्फोट का कोई आर्थिक मुआवज़ा नहीं होता। इसलिए भारत की माँग सीधी है। रणनीतिक साझेदारी में सिर्फ़ साझा हित नहीं, साझा पीड़ा की पहचान भी शामिल होनी चाहिए।
इसी मंच पर भारत-चीन संबंधों पर भी चर्चा हुई। जयशंकर के अनुसार, दोनों देशों के रिश्ते 2025 की तुलना में बेहतर हैं, और इसका बड़ा कारण सीमा पर तनाव का थमना है। उन्होंने इसे किसी "संरचनात्मक बदलाव" के बजाय सामान्य स्थिति की वापसी बताया। 2020 के बाद के लंबे गतिरोध ने रिश्तों को इतना नीचे पहुँचा दिया था कि हालात स्थिर होते ही सुधार दिखना स्वाभाविक था। यह टिप्पणी भारत की सधी हुई विदेश नीति की झलक देती है, जहाँ हर रिश्ते को उसकी अपनी ज़मीन पर परखा जाता है।
सवाल यह है कि इस बयान का व्यावहारिक अर्थ क्या है। पहला, भारत अब अपनी आपत्तियाँ पर्दे के पीछे नहीं, खुले मंच पर रखने से हिचक नहीं रहा। दूसरा, वह अमेरिका जैसे बड़े साझेदार से भी बराबरी के स्तर पर संवाद चाहता है। तीसरा और सबसे अहम, भारत यह जताना चाहता है कि आतंकवाद पर दोहरे मापदंड की गुंजाइश नहीं है।
अमेरिका के लिए भी यह आत्ममंथन का क्षण है। एशिया में संतुलन साधने की उसकी अपनी मजबूरियाँ हो सकती हैं, पर भारत जैसे विशाल लोकतंत्र और बाज़ार को नज़रअंदाज़ करके कोई भी हिंद-प्रशांत रणनीति टिकाऊ नहीं हो सकती। दोस्ती में पारदर्शिता और संवेदना उतनी ही ज़रूरी हैं जितने समझौते और सौदे।
जयशंकर का यह बयान शिकायत कम, चेतावनी अधिक है, और चेतावनी से भी ज़्यादा एक आमंत्रण है। यह आमंत्रण है कि दोनों देश रिश्तों को व्यापार की तराज़ू से आगे ले जाकर भरोसे की बुनियाद पर खड़ा करें। अब गेंद वॉशिंगटन के पाले में है। देखना यह है कि वह इस स्पष्ट संकेत को कूटनीतिक शोर समझकर टाल देता है, या उसे उस ईमानदार पुकार की तरह सुनता है जो वह वास्तव में है।