भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः राजनीति में कुछ खबरें सिर्फ़ सूचना नहीं होतीं, वे आने वाले तूफ़ान की आहट होती हैं। सोमवार, 5 अक्टूबर को भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए आठ उम्मीदवारों की सूची जारी की, तो दिल्ली से लखनऊ तक सियासी गलियारों में हलचल मच गई। वजह साफ़ थी: सूची में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम नहीं था। बात यहीं नहीं रुकी। केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, संगठन के भरोसेमंद चेहरे अरुण सिंह, नीरज शेखर, बृजलाल, सीमा द्विवेदी और गीता शाक्य जैसे निवर्तमान सांसदों में से भी किसी को दूसरा मौका नहीं मिला। संदेश साफ़ है कि इस बार दांव पुराने समीकरणों पर नहीं, नई बिसात पर लगाया गया है।
पार्टी ने जिन नामों पर मुहर लगाई है, वे हैं धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपीकृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार। रिपोर्टों के मुताबिक प्रियंका सिंह रावत पूर्व लोकसभा सदस्य रह चुकी हैं, जबकि श्रुति गंगवार झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी हैं और प्रदेश भाजपा में सक्रिय हैं। कुल मिलाकर सूची में क्षेत्रीय संतुलन, महिलाओं की भागीदारी और अलग-अलग सामाजिक वर्गों को साधने की कोशिश दिखती है। साथ ही राष्ट्रीय कद से ज़्यादा संगठन के अनुभव को तरजीह दी गई है।
सबसे बड़ा सवाल हरदीप पुरी को लेकर है। पूर्व राजनयिक पुरी 2018 में मनोहर पर्रिकर के इस्तीफ़े से खाली हुई सीट पर उपचुनाव जीतकर उत्तर प्रदेश से उच्च सदन पहुंचे थे और 2020 में दोबारा चुने गए। उनका मौजूदा कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है। पुरी और बीएल वर्मा, दोनों केंद्र सरकार में मंत्री हैं और नियमों के अनुसार मंत्री को संसद के किसी सदन का सदस्य होना ज़रूरी है। इसलिए स्वाभाविक रूप से चर्चा शुरू हो गई है कि क्या उन्हें किसी दूसरे राज्य से उच्च सदन में लाया जाएगा, या मंत्रिमंडल के स्वरूप में कोई बदलाव होने वाला है। फिलहाल यह सब अटकलों के दायरे में है, और अटकलों को तथ्य मान लेना जल्दबाज़ी होगी।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देश का राजनीतिक कैलेंडर तेज़ी से चुनावी मोड में जा रहा है। 2027 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश की बारी आएगी। इन सबमें उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा मैदान है, जहां 403 सीटों की जंग दिल्ली की सियासत की दिशा भी तय करती है। ऐसे में राज्यसभा की ये आठ सीटें भाजपा के लिए केवल संसदीय पद नहीं हैं, बल्कि ज़मीन पर संदेश भेजने का मंच भी हैं। विधानसभा में संख्याबल को देखते हुए भाजपा-नीत गठबंधन के आठ सीटें जीतने की स्थिति में होने का आकलन है, जबकि समाजवादी पार्टी को कांग्रेस के समर्थन से दो सीटें मिल सकती हैं। मतदान 16 अक्टूबर को होना है।
भाजपा की रणनीति को समझने के लिए उसकी पुरानी कार्यशैली पर नज़र डालनी होगी। चुनाव से पहले चेहरे बदलकर सत्ता-विरोधी रुझान की धार कुंद करना पार्टी की जानी-पहचानी चाल रही है। नए नाम उन कार्यकर्ताओं को भी भरोसा देते हैं जो बरसों से संगठन में पसीना बहा रहे हैं, पर कतार में पीछे रह जाते हैं। इसके साथ ही किसी भी नेता को स्थायी सुरक्षा का एहसास न कराना भीतर अनुशासन का संकेत भी माना जाता है। लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है। अनुभवी चेहरों की विदाई से संसद में पार्टी की बहस-क्षमता और केंद्र सरकार में निरंतरता पर सवाल उठ सकते हैं। जानकार यह भी पूछ रहे हैं कि जिन नेताओं को अचानक किनारे किया गया, उनके समर्थकों में क्या संदेश जाएगा।
विपक्ष भी इस मौके को भुनाने से नहीं चूकेगा। समाजवादी पार्टी लंबे समय से पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण की राजनीति पर ज़ोर देती रही है। ऐसे में भाजपा ने सूची के जरिए सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है, और यह कोशिश कितनी कारगर रही, इसका अंतिम फैसला मतदाता ही करेगा। विपक्ष इसे बड़े नेताओं की उपेक्षा बताकर सवाल उठा सकता है, जबकि भाजपा इसे नए नेतृत्व को अवसर देने की नीति के रूप में पेश करेगी। दोनों तरफ़ से बयानों की जंग तय मानी जा रही है।
इस फैसले का असर केवल उत्तर प्रदेश की सीमा तक नहीं रुकेगा। पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर जैसे राज्यों में भी पार्टी कार्यकर्ता और नेता इस पर नज़र रख रहे होंगे कि शीर्ष नेतृत्व किस कसौटी पर नेताओं को परख रहा है: वरिष्ठता, स्थानीय पकड़ या जीतने की क्षमता। टिकट बंटवारे से लेकर संगठनात्मक नियुक्तियों तक, इस सूची को एक कसौटी की तरह पढ़ा जाएगा। जो नेता सोच रहे थे कि लंबा अनुभव अपने आप में गारंटी है, उनके लिए यह एक चेतावनी भी हो सकती है।
अंततः सवाल वही है जो हर चुनावी मौसम में उठता है: क्या यह कदम सोची-समझी रणनीति का मास्टरस्ट्रोक साबित होगा, या आंतरिक असंतोष की नई चिंगारी? इसका जवाब तुरंत नहीं मिलेगा। जवाब मिलेगा 16 अक्टूबर के मतदान से, उसके बाद संभावित मंत्रिमंडलीय हलचल से, और अंत में 2027 के जनादेश से। तब तक इतना तय है कि भाजपा ने अपनी चाल चल दी है, और अब सबकी निगाहें उसकी अगली चाल पर टिकी हैं।