भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः चार साल से ज़्यादा समय से यूरोप को बेचैन रखने वाले युद्ध पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने गुरुवार को ऐसी बात कही, जिसने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। मॉस्को में वल्दाई डिस्कशन क्लब के मंच से पुतिन ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास यूक्रेन संघर्ष का आपसी सहमति वाला हल निकालने के "बहुत अच्छे विचार" हैं। सवाल यह है कि इस तारीफ़ के पीछे असली संदेश क्या है और इसका मतलब भारत के लिए क्या है।
पुतिन के शब्द ग़ौर करने लायक़ हैं। उन्होंने मोदी के साथ अपने रिश्तों को "बहुत अच्छा, यहाँ तक कि दोस्ताना" बताया। फिर यह भी जोड़ा कि मोदी उन गिने-चुने विश्व नेताओं में हैं जो इतनी गहरी निजी निकटता के बावजूद हर मुलाक़ात में युद्ध ख़त्म करने का सवाल उठाते हैं। यानी रूसी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से मान लिया कि भारतीय प्रधानमंत्री दोस्ती निभाते हुए भी शांति की बात दोहराना नहीं भूलते। आज की कूटनीति में यह स्वीकारोक्ति मामूली नहीं है।
यह भी साफ़ कर दें कि पुतिन ने इन "विचारों" का ब्योरा नहीं दिया, और अब तक सार्वजनिक भी नहीं हुआ है कि वे क्या हैं। इसलिए कोई भी दावा कि भारत के पास कोई तैयार शांति योजना है, फ़िलहाल अटकल ही है। तथ्य सिर्फ़ इतना है कि मॉस्को ने भारत की भूमिका को खुलकर सराहा है।
मोदी का रुख़ बरसों से एक ही धुरी पर टिका है। सितंबर 2022 में समरकंद में उन्होंने पुतिन से कहा था कि यह दौर युद्ध का नहीं है। जुलाई 2024 में मॉस्को यात्रा के दौरान उन्होंने साफ़ कहा कि मासूम बच्चों की मौत दिल दहला देती है और समाधान रणभूमि में नहीं निकल सकता। उसी साल अगस्त में वे यूक्रेन पहुँचे। वे वहाँ जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने और राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की से भी शांति पर चर्चा की। सितंबर 2025 में तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के दौरान पुतिन से मुलाक़ात में उन्होंने संघर्ष विराम और टिकाऊ शांति की ज़रूरत फिर दोहराई। दिसंबर 2025 में पुतिन चार साल बाद भारत आए, तब भी बातचीत में यूक्रेन का मुद्दा छाया रहा।
इस पूरे सिलसिले की ख़ासियत यह है कि भारत ने न किसी का पाला पकड़ा, न चुप्पी साधी। उसने दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखा और हर मंच पर बातचीत की वकालत की। आलोचक इसे संतुलन की कसरत कहते हैं, तो समर्थक रणनीतिक स्वायत्तता।
पुतिन ने उसी भाषण में कहा कि रूस इस संघर्ष का समाधान बातचीत से चाहता है। साथ ही उन्होंने मोदी को 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए रूस आने का न्योता भी दोहराया। यानी तारीफ़ के साथ ही अगली मुलाक़ात की ज़मीन भी तैयार की जा रही है। ऊर्जा, रक्षा और व्यापार जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों की साझेदारी को देखते हुए यह न्योता सिर्फ़ औपचारिकता नहीं माना जा सकता।
पुतिन की सराहना भारत के लिए गर्व की बात ज़रूर है, पर यह दोधारी तलवार भी है। एक तरफ़ यह भारत की कूटनीतिक साख बढ़ाती है, क्योंकि जिस नेता की बात मॉस्को ध्यान से सुने, उसकी आवाज़ का वज़न बढ़ता है। दूसरी तरफ़ कीव और पश्चिमी राजधानियों में यह सवाल उठ सकता है कि क्या भारत रूस के क़रीब झुका हुआ है। ज़ेलेंस्की पहले कह चुके हैं कि यूक्रेन को ऐसा भारत चाहिए जो अमेरिका और रूस के बीच संतुलन साधने में न उलझा हो। इसलिए नई दिल्ली को अपने शब्दों और क़दमों में पारदर्शिता रखनी होगी, ताकि मध्यस्थ की उसकी छवि किसी एक पाले की पैरवी जैसी न दिखे।
एक और बात याद रखनी होगी। पुतिन की तारीफ़ से शांति अपने आप नहीं आ जाती। जंग के मैदान की हक़ीक़त, ज़मीन को लेकर टकराते दावे और आपसी अविश्वास अब भी वही हैं। जब तक दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार नहीं होते, किसी तीसरे देश के विचार काग़ज़ों तक ही सीमित रह सकते हैं। मध्यस्थता का पहला नियम है कि सब सुनें, मगर कोई एक पक्ष इसे अपने हित में न भुनाए।
भारत के पास एक दुर्लभ मौक़ा है। वह उन चुनिंदा देशों में है जिनसे मॉस्को, कीव और वॉशिंगटन तीनों बात करते हैं। इस भरोसे को ठोस पहल में बदलना आसान नहीं, पर असंभव भी नहीं। पहला क़दम यह हो सकता है कि भारत मानवीय मुद्दों, जैसे बच्चों की सुरक्षा, खाद्य और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और बंदियों की अदला-बदली, पर विश्वास बहाली की कोशिशों में सक्रिय रहे। इन्हीं छोटे क़दमों से बड़े समझौते की राह बनती है।
पुतिन ने जो कहा, वह एक राजनयिक संकेत है, कोई शांति समझौता नहीं। उसे सही संदर्भ में पढ़ना ज़रूरी है। भारत के लिए संदेश यह है कि दुनिया उसकी बात सुन रही है। अब कसौटी यह है कि वह इस सुनवाई को सचमुच शांति की दिशा में बदल पाता है या नहीं। इतिहास उसी को याद रखता है जो शब्दों के आगे जाकर नतीजे देता है।