भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः दुनिया की सबसे अमीर अर्थव्यवस्थाओं ने वह फ़ैसला सुना दिया, जिसका इंतज़ार पेट्रोल पंपों की कतारों से लेकर ट्रक चालकों की जेब तक हर कोई कर रहा था। जी-7 देशों ने अपने आपातकालीन भंडारों से 10 करोड़ बैरल डीज़ल और कच्चा तेल बाज़ार में उतारने पर सहमति जता दी है। सवाल सिर्फ़ एक है: यह असली इलाज है या महज़ एक मीठी गोली?
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल माक्रों के कार्यालय से जारी साझा बयान के मुताबिक़ यह रिहाई तुरंत शुरू होगी और चार महीनों तक चलेगी। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें डीज़ल को सबसे आगे रखा गया है। पहले बीस दिनों में ही डीज़ल की बड़ी खेप बाज़ार तक पहुँचाने का लक्ष्य है। यानी नेताओं को पता है कि दर्द असल में कहाँ है। पूरी प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के समन्वय से चलेगी, ताकि हर देश अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि एक साझा योजना के तहत कदम उठाए।
अब यह समझना ज़रूरी है कि नौबत यहाँ तक पहुँची कैसे। इस साल मार्च में ईरान से जुड़े युद्ध ने तेल बाज़ार को झकझोर दिया था। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से टैंकरों की आवाजाही थमने लगी और कच्चा तेल एक ही दिन में 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया। तब से बाज़ार को चैन नहीं मिला है। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार रिफ़ाइनरियों से तैयार ईंधन की कमी महीनों से बनी हुई है, और इसी वजह से डीज़ल के दाम रिकॉर्ड ऊँचाई तक पहुँच गए हैं। डीज़ल सिर्फ़ गाड़ियों का ईंधन नहीं है। यह माल ढुलाई, खेती और कारखानों की रीढ़ है। इसलिए जब डीज़ल चढ़ता है तो सब्ज़ी, अनाज और रोज़मर्रा का हर सामान महँगा होता चला जाता है।
इस फ़ैसले के पीछे वाशिंगटन का दबाव साफ़ दिखता है। रिपोर्टों के मुताबिक़ ट्रंप प्रशासन काफ़ी समय से यूरोप पर अपने डीज़ल भंडार खोलने का दबाव बना रहा था। घोषणा से ठीक पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यूरोप ने भारी मात्रा में डीज़ल छोड़ने पर हामी भर दी है। इसकी एक वजह यह भी है कि आईईए के आँकड़ों के अनुसार अगस्त में यूरोपीय संघ के डीज़ल आयात का लगभग आधा हिस्सा अमेरिका से आया था। यानी अमेरिका के पास यूरोप को मनाने की ताक़त भी थी और उसे झुकाने का हथियार भी।
इस सहमति में एक और अहम पहलू है, जिस पर कम चर्चा हो रही है। जी-7 नेताओं ने अपना वादा दोहराया है कि वे आपस में ऊर्जा और ऊर्जा उत्पादों के निर्यात पर कोई रोक नहीं लगाएँगे। उन्होंने तेल उत्पादक देशों से भी अपील की है कि वे ऐसी पाबंदियों से बचें। पर्दे के पीछे यही असली सौदेबाज़ी थी। यूरोप अपना भंडार खोले, और बदले में निर्यात पर रोक की आशंका टले।
अब आँकड़ों की बात करें, क्योंकि यहीं तस्वीर का दूसरा पहलू दिखता है। चर्चा में फ्रांस का जो प्रस्ताव था, उसके मुताबिक़ यूरोप 5 करोड़ बैरल डीज़ल छोड़ेगा और आईईए के सदस्य देश 5 करोड़ बैरल कच्चा तेल। यूरोपीय सांख्यिकी कार्यालय के आँकड़ों के हिसाब से 5 करोड़ बैरल डीज़ल यूरोपीय संघ के कुल आपातकालीन डीज़ल भंडार का लगभग 17 प्रतिशत है, जबकि सालाना खपत के लिहाज़ से यह मात्र तीन प्रतिशत के आसपास बैठता है। यानी राहत असली है, लेकिन समंदर में एक बूँद जितनी बड़ी नहीं, तो उससे बहुत बड़ी भी नहीं।
एक और बात ध्यान देने लायक है। मार्च में आईईए के 32 सदस्य देशों ने रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल के भंडार जारी करने का ऐलान किया था, जिसमें से लगभग दो-तिहाई अब तक बाज़ार में आ चुका है। तेल उद्योग की ख़बरों में विश्लेषकों का आकलन है कि ताज़ा घोषणा काफ़ी हद तक उसी पुरानी प्रतिबद्धता को पूरा करने में मदद करेगी, न कि पूरी तरह नया अतिरिक्त हिस्सा जोड़ेगी। मतलब सुर्ख़ी बड़ी है, पर हिसाब-किताब बारीक है। आम पाठक को इसी फ़र्क़ को समझना चाहिए।
भारत के नज़रिये से देखें तो यह ख़बर राहत की किरण ज़रूर है, पर उम्मीदों की चादर ज़्यादा लंबी नहीं तानी जानी चाहिए। हमारा देश अपनी ज़रूरत का बहुत बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाज़ार में दाम घटते हैं तो उसका फ़ायदा देर-सबेर हमारी अर्थव्यवस्था तक पहुँचता है। लेकिन घरेलू दाम कई चीज़ों पर निर्भर करते हैं, जैसे कर, डॉलर की चाल और तेल कंपनियों की नीति। इसलिए यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि अगले हफ़्ते पंप पर दाम घट जाएँगे।
बाज़ार ने फ़िलहाल इस पहल का स्वागत किया है। रिपोर्टों के अनुसार इस घोषणा की आहट पर ही डीज़ल के दामों में तेज़ गिरावट देखी गई। मगर इतिहास गवाह है कि ऐसी राहत अक्सर क्षणिक होती है। जब तक असली वजहें बनी रहती हैं, यानी सप्लाई में रुकावट और रिफ़ाइनिंग की कमी, तब तक भंडार खोलना केवल समय खरीदने जैसा है। असली इलाज तब होगा जब होर्मुज़ के रास्ते सामान्य होंगे और रिफ़ाइनरियाँ पूरी क्षमता से चलेंगी।
एक तीखा सवाल यह भी है कि आपातकालीन भंडार किसलिए होते हैं। वे तब के लिए हैं जब सचमुच कोई बड़ा संकट आए। अगर महीनों तक उन्हें बार-बार खाली किया जाता रहा, तो अगली बार किसी और झटके में हमारे पास क्या बचेगा? सरकारें आज की राजनीतिक राहत के लिए कल की सुरक्षा गिरवी रख रही हैं या नहीं, यह बहस अभी शुरू ही हुई है और इसे दबाया नहीं जाना चाहिए।
फिर भी इस फ़ैसले का एक सकारात्मक संदेश है। जब दुनिया के सात बड़े देश, जो अक्सर आपस में खींचतान करते हैं, एक मेज़ पर बैठकर साझा कदम उठाते हैं, तो बाज़ार को भरोसा मिलता है कि हालात पूरी तरह हाथ से नहीं निकले हैं। यह भरोसा भी कीमतों को थामने में कभी-कभी उतना ही काम करता है जितना भंडार से निकला तेल।
कुल मिलाकर, 10 करोड़ बैरल की यह रिहाई एक ज़रूरी मरहम है, कोई जादू की छड़ी नहीं। अगले चार महीने बताएँगे कि यह मरहम घाव भर पाता है या सिर्फ़ दर्द को कुछ दिन टालता है। तब तक पाठकों को सलाह यही है कि सुर्ख़ियों की चमक में न बहें, आँकड़ों की बारीकी पर नज़र रखें, और अपने बजट में ईंधन के उतार-चढ़ाव के लिए थोड़ी गुंजाइश ज़रूर रखें।