Wednesday, October 07, 2026
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संपादकीय

25 साल, एक ही मंत्र: "हम करेंगे!" क्या यही है विकसित भारत की असली चाबी?

October 07, 2026 06:40 PM

 भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः सात अक्टूबर 2001 की वह तारीख़ शायद ही किसी ने सोचा होगा कि गांधीनगर में शपथ लेने वाला एक मुख्यमंत्री ढाई दशक बाद देश की राजनीति की धुरी बन जाएगा। आज जब नरेंद्र मोदी सत्ता के शीर्ष पदों पर अपने 25 साल पूरे कर रहे हैं, तो सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि उन्होंने क्या पाया। असली सवाल यह है कि उनका वह एक वाक्य, जिसे वे बार-बार दोहराते हैं, क्या सचमुच देश की तक़दीर बदल सकता है? वह वाक्य है: "हम करेंगे।"

इस मौक़े पर प्रधानमंत्री का संदेश साफ़ है। उनके मुताबिक़ विकास के लक्ष्य तभी हासिल होंगे, जब शासन में "हम करेंगे" वाला रवैया हो। यानी बहाने नहीं, समयसीमा चाहिए। फ़ाइलों की जगह नतीजे चाहिए। यह सुनने में सरल लगता है, लेकिन भारतीय प्रशासन की संस्कृति में यही सबसे कठिन बदलाव रहा है। दशकों तक योजनाएँ घोषित होती रहीं और ज़मीन तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ती रहीं। ऐसे में "करेंगे" का आग्रह अपने आप में एक राजनीतिक और प्रशासनिक घोषणा है।

मोदी का सार्वजनिक जीवन दो हिस्सों में बँटा दिखता है। पहला हिस्सा गुजरात का है, जहाँ वे 2001 से 2014 तक मुख्यमंत्री रहे। वहाँ उन्होंने निवेश, बुनियादी ढाँचे और बिजली-पानी जैसे मुद्दों को अपनी पहचान बनाया। दूसरा हिस्सा मई 2014 से शुरू होता है, जब वे देश के प्रधानमंत्री बने और 2024 में तीसरी बार इस पद पर लौटे। लगातार इतने लंबे समय तक सरकार के मुखिया बने रहना भारतीय लोकतंत्र में बहुत कम नेताओं के हिस्से आया है। इसे समर्थक जनविश्वास की मुहर कहते हैं, तो आलोचक सत्ता के केंद्रीकरण का संकेत।

निष्पक्षता से देखें तो पिछले एक दशक में कई ऐसे बदलाव हुए हैं जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाई देते हैं। जनधन खातों ने करोड़ों लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ा। यूपीआई ने छोटे दुकानदार से लेकर रेहड़ी वाले तक को डिजिटल भुगतान का हिस्सा बना दिया, और आज दुनिया इस मॉडल को हैरानी से देखती है। उज्ज्वला जैसी योजनाओं ने रसोई का धुआँ कम करने की कोशिश की। जीएसटी ने "एक देश, एक कर" की दिशा में बड़ा क़दम उठाया। सड़कों, रेलवे, हवाई अड्डों और ऊर्जा परियोजनाओं पर सरकारी निवेश भी तेज़ हुआ है। ये सब उसी "करेंगे" की सोच के उदाहरण बताए जाते हैं।

कोई भी ईमानदार संपादकीय सिर्फ़ तारीफ़ पर नहीं टिक सकता। विकसित भारत 2047 का सपना बड़ा है, और उसके रास्ते में चुनौतियाँ भी उतनी ही बड़ी हैं। रोज़गार, ख़ासकर पढ़े-लिखे युवाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण रोज़गार, आज भी सबसे बड़ी चिंता है। महँगाई का दबाव मध्यम और निम्न आय वर्ग को परेशान करता है। किसानों की आमदनी, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, शहरों का बढ़ता प्रदूषण और क्षेत्रीय असमानता ऐसे मुद्दे हैं जहाँ घोषणाओं और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच अब भी फ़ासला दिखता है। विपक्ष इन्हीं बिंदुओं पर सरकार को घेरता है, और लोकतंत्र में यह सवाल पूछना उसका अधिकार भी है।

यहीं से इस नारे की असली कसौटी शुरू होती है। "हम करेंगे" तब तक प्रेरक है, जब तक वह "हमने किया" में बदलता रहे। जनता अब वादों की गिनती से ज़्यादा उनके नतीजों का हिसाब माँगती है। डिजिटल दौर का मतदाता सवाल करता है कि सड़क कब बनी, अस्पताल में डॉक्टर कब आया, और नौकरी कब मिली। ऐसे में सरकार के लिए ज़रूरी है कि आँकड़ों के साथ पारदर्शिता भी बढ़े, ताकि उपलब्धियों पर भरोसा टिक सके।

एक बात अक्सर छूट जाती है। विकास अकेले प्रधानमंत्री या सरकार के भरोसे नहीं होता। "हम" शब्द में सरकार के साथ अफ़सर, राज्य, उद्योग, किसान, शिक्षक और आम नागरिक भी शामिल हैं। अगर कोई दफ़्तर काम टालता है, कोई कारोबारी नियम तोड़ता है, या कोई नागरिक कचरा सड़क पर फेंकता है, तो "करेंगे" की भावना कमज़ोर पड़ती है। स्वच्छता अभियान की सफलता इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, क्योंकि वहाँ बदलाव तभी दिखा जहाँ लोगों ने इसे अपना काम समझा।

पच्चीस साल का पड़ाव किसी नेता के लिए उपलब्धियों का जश्न भी है और आत्ममंथन का मौक़ा भी। आने वाले वर्षों में भारत को तेज़ आर्थिक वृद्धि के साथ समावेशी विकास का संतुलन साधना होगा। तकनीक, ऊर्जा संक्रमण, कौशल विकास और सामाजिक सौहार्द, इन चारों मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। अगर "हम करेंगे" का जज़्बा इन सब पर बराबरी से लागू हुआ, तो 2047 का लक्ष्य दूर का सपना नहीं रहेगा।

राजनीति में नारे आसानी से गढ़े जाते हैं, पर उन्हें निभाना मुश्किल होता है। मोदी के 25 साल इस बात का प्रमाण हैं कि दृढ़ संकल्प और निरंतरता राजनीति में असर दिखाती है। साथ ही यह भी याद दिलाते हैं कि जनता की अपेक्षाएँ हर बार पहले से ऊँची होती जाती हैं। इसलिए असली सवाल अब भी वही है: क्या "हम करेंगे" की यह भावना हर गाँव, हर शहर और हर परिवार तक पहुँचकर "हमने कर दिखाया" में बदलेगी? इसका जवाब न भाषण देंगे, न नारे। इसका जवाब समय देगा, और उससे भी पहले, देश की जनता।

 

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