भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः क्या आपने भी कभी गुस्से में बच्चे के हाथ से फोन खींचकर अलमारी में ताला लगा दिया है? क्या आपको भी लगता है कि इंटरनेट बच्चों के लिए केवल एक खतरनाक जंगल है, जिसके दरवाज़े उनके लिए हमेशा बंद रहने चाहिए? अगर हां, तो देश की सर्वोच्च अदालत का ताज़ा रुख़ आपको चौंका सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका उपयोग हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, और इस दायरे में बच्चे भी आते हैं, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह बात उस सुनवाई के दौरान कही, जिसमें बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र के आधार पर सख़्त पाबंदियां लगाने की मांग उठाई गई थी। याचिकाकर्ता चाहते थे कि सरकार को निर्देश मिले कि एक तय उम्र से कम बच्चे सोशल मीडिया से दूर रहें और उससे बड़े बच्चों की पहुंच भी नियंत्रित हो। अदालत ने इस मांग के उस रूप को स्वीकार नहीं किया, जिसमें पूरी रोक की बात थी। उसने इंटरनेट के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21, यानी जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और अनुच्छेद 19(1)(a), यानी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, से जोड़ा।
इस फैसले की सबसे दमदार बात यह है कि अदालत ने सुरक्षा और स्वतंत्रता को एक-दूसरे का दुश्मन मानने से इनकार कर दिया। पीठ का आशय था कि बच्चों की हिफ़ाज़त और उनकी आज़ादी आपस में टकराने वाली चीज़ें नहीं हैं, और बच्चों को दोनों पर हक़ है। हमारे समाज में अक्सर यही माना जाता है कि सुरक्षा चाहिए तो आज़ादी कम करनी पड़ेगी। अदालत ने इस पुरानी धारणा को चुनौती दी है।
अब सवाल उठता है कि पूरी पाबंदी में हर्ज़ क्या है? अदालत की समझ व्यावहारिक है। कानून बना देने से बच्चे इंटरनेट चलाना बंद नहीं कर देंगे। वे चोरी-छिपे, दोस्तों के फोन से या अनजान और असुरक्षित ठिकानों पर जाकर वही करेंगे, जो रोका गया था। रोक का असली नतीजा यह होगा कि बच्चे निगरानी और भरोसे के दायरे से बाहर चले जाएंगे। इससे भी बड़ा ख़तरा यह है कि सज़ा का डर किसी बच्चे को ऑनलाइन शोषण की शिकायत करने से रोक सकता है। जो बच्चा सोचेगा कि "मैंने तो नियम तोड़ा है, बताऊंगा तो मुझे ही डांट पड़ेगी या सज़ा मिलेगी", वह अपने साथ हुई ज़्यादती पर चुप रह जाएगा। इससे बच्चों को यौन अपराधों से बचाने वाले पॉक्सो कानून का मक़सद ही कमज़ोर पड़ सकता है।
लेकिन इस ख़बर को यह समझ लेना कि अब बच्चों को खुली छूट मिल गई है, बड़ी भूल होगी। अदालत ने ख़ुद माना है कि आज का ऑनलाइन माहौल बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। साइबर बुलिंग, आपत्तिजनक सामग्री, ऑनलाइन यौन शोषण और बच्चों को जाल में फंसाने वाले अपराधी, ये ख़तरे असली हैं। इसीलिए पीठ ने रोक के बजाय सुरक्षा के ठोस उपाय अपनाने पर ज़ोर दिया और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों की जवाबदेही की ओर भी इशारा किया। संदेश साफ़ है कि दरवाज़ा बंद करने से बेहतर है कि घर के भीतर रोशनी, ताले और निगरानी का इंतज़ाम दुरुस्त किया जाए।
यह रुख़ अचानक नहीं उपजा। वर्ष 2020 में अनुराधा भसीन मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही इंटरनेट के ज़रिए अभिव्यक्ति और व्यापार की आज़ादी को संवैधानिक संरक्षण दे चुका है। कोविड काल की ऑनलाइन कक्षाओं ने भी दिखाया कि पढ़ाई का एक बड़ा हिस्सा अब स्क्रीन से होकर गुज़रता है। जिस बच्चे के पास कनेक्टिविटी नहीं, वह सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, शिक्षा, जानकारी और अवसरों की दौड़ में भी पीछे छूट जाता है। गांव का वह विद्यार्थी, जिसके पास डेटा नहीं है, शहर के बच्चे से पहले ही एक कदम पीछे खड़ा है। इस नज़रिये से देखें तो इंटरनेट का अधिकार केवल रील और गेम का अधिकार नहीं, बराबरी का अधिकार भी है।
इस फैसले से माता-पिता को क्या सीखना चाहिए? सबसे पहले यह कि सख़्ती से ज़्यादा संवाद काम आता है। बच्चे से खुलकर बात कीजिए कि वह ऑनलाइन क्या देखता है, किससे बात करता है और कोई अजीब या डरावनी बात होने पर उसे किससे कहना है। उसे यह भरोसा दीजिए कि मुसीबत में बताने पर डांट नहीं, मदद मिलेगी। पैरेंटल कंट्रोल जैसे साधन उपयोगी हैं, पर वे बातचीत की जगह नहीं ले सकते। डिजिटल साक्षरता, यानी फ़र्ज़ी ख़बर पहचानना, निजी जानकारी बचाना और अनजान लोगों से सतर्क रहना, आज उतनी ही ज़रूरी है जितना सड़क पार करना सिखाना।
सरकार और कंपनियों की ज़िम्मेदारी इससे भी बड़ी है। उम्र के हिसाब से सुरक्षित सेटिंग, शिकायत की आसान व्यवस्था, हानिकारक सामग्री पर तेज़ कार्रवाई और बच्चों के डेटा की हिफ़ाज़त, ये सब केवल सुझाव नहीं, जवाबदेही के हिस्से हैं। अदालत पहले भी कह चुकी है कि नीति बनाना मूलतः सरकार और संसद का काम है, इसलिए अब नज़र इस पर रहेगी कि ज़रूरी कानून और नियम कितनी गंभीरता और संतुलन से बनते हैं।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने डर पर आधारित सोच की जगह अधिकार और ज़िम्मेदारी पर आधारित सोच रखी है। उसने कहा है कि बच्चों को तकनीक से काटकर नहीं, बल्कि तकनीक के साथ सुरक्षित चलना सिखाकर बचाया जा सकता है। असली परीक्षा अब हमारी है। क्या हम बच्चों के लिए ऐसा डिजिटल संसार बना पाएंगे, जहां वे सीख भी सकें, बोल भी सकें और ज़रूरत पड़ने पर बेझिझक मदद भी मांग सकें? इसका जवाब किसी अदालत के फैसले से नहीं, हमारे रोज़ के व्यवहार से तय होगा।