भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः यह सिर्फ़ एक कूटनीतिक दौरा नहीं लगता। जब दुनिया की सबसे ताकतवर विदेश नीति संभालने वाला चेहरा किसी भारतीय उद्योगपति की रिफ़ाइनरी के गेट पर पहुँचे, तो सवाल उठना लाज़मी है। आख़िर अमेरिका को गुजरात के एक तटीय शहर में ऐसा क्या दिख रहा है, जो वॉशिंगटन में नहीं मिल रहा?
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो 17 से 22 अक्टूबर के बीच उज़्बेकिस्तान और भारत की यात्रा पर हैं। पहले वे समरकंद में मध्य एशियाई देशों के साथ होने वाली C5+1 मंत्रिस्तरीय बैठक में शामिल होंगे। उसके बाद उनका काफ़िला मुंबई और जामनगर पहुँचेगा। इसी साल मई में क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए वे दिल्ली आए थे, यानी यह उनकी भारत की दूसरी यात्रा है। जामनगर में मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का वह परिसर है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट रिफ़ाइनरी माना जाता है। वहाँ रोज़ करीब 14 लाख बैरल कच्चा तेल साफ़ होता है।
अब असली मुद्दे पर आइए। अमेरिका में डीज़ल की कीमतें इस समय आम आदमी की जेब और अर्थव्यवस्था, दोनों को झुलसा रही हैं। AAA के आँकड़ों के मुताबिक़ सितंबर में पहली बार देश का राष्ट्रीय औसत भाव 6 डॉलर प्रति गैलन के पार चला गया। एक साल पहले यही डीज़ल करीब 3.70 डॉलर पर मिल रहा था। कैलिफ़ोर्निया में कीमतें 8 डॉलर के आसपास पहुँचने की ख़बरें आईं। अक्टूबर में भी औसत भाव लगभग 6.30 डॉलर के आसपास बताया जा रहा है।
डीज़ल सिर्फ़ ट्रक का ईंधन नहीं है। यह किसान के ट्रैक्टर, बंदरगाह की क्रेन, मालगाड़ी और सुपरमार्केट की शेल्फ़ तक की कड़ी है। डीज़ल महँगा होता है तो सब्ज़ी से लेकर सोफ़े तक सब महँगा हो जाता है। इसलिए यह संकट वॉशिंगटन की नींद उड़ा रहा है।
इस उछाल के पीछे कई वजहें गिनाई जा रही हैं। अमेरिका-ईरान टकराव के चलते होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आवाजाही महीनों से बाधित है। रूस ने डीज़ल निर्यात पर रोक लगा रखी है। अमेरिकी रिफ़ाइनरियाँ लगभग अपनी पूरी क्षमता पर चल रही हैं और उनके पास और उत्पादन की गुंजाइश बेहद कम है। विश्लेषकों में कुछ आने वाले महीनों में कीमतों के और चढ़ने की आशंका जता रहे हैं। निर्यात पर पाबंदी जैसे विकल्पों पर भी विचार होने की ख़बरें आई हैं, हालाँकि पहले ऐसे कदमों से कीमतें घटने की जगह बढ़ चुकी हैं।
ऐसे में जामनगर की अहमियत समझ में आती है। यहाँ की रिफ़ाइनरी बड़े पैमाने पर डीज़ल और अन्य परिष्कृत उत्पाद बनाने के लिए जानी जाती है। लेकिन यहाँ एक ईमानदार बात कहना ज़रूरी है। अमेरिकी विदेश विभाग ने आधिकारिक तौर पर यह नहीं बताया कि जामनगर को यात्रा-कार्यक्रम में क्यों रखा गया है। वह कारण अनुमान का विषय है, घोषित तथ्य नहीं।
फिर भी कड़ियाँ जोड़ने पर तस्वीर दिलचस्प बनती है। इसी साल मार्च में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया था कि अमेरिका पाँच दशकों में पहली बार नई रिफ़ाइनरी बनाएगा। रिपोर्टों के अनुसार यह टेक्सस के ब्राउन्सविले में लगेगी, इसकी लागत लगभग 300 अरब डॉलर बताई गई है और इसमें रिलायंस इंडस्ट्रीज़ का निवेश होगा। जिस देश की अपनी रिफ़ाइनिंग क्षमता तंग पड़ रही हो, वह दुनिया के सबसे बड़े रिफ़ाइनिंग हब के संचालकों से रिश्ता गहरा करना चाहे, तो इसमें हैरानी कैसी?
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है, और वह इतना गुलाबी नहीं है। रुबियो की यात्रा ऐसे समय हो रही है जब 18 अक्टूबर की वह समय-सीमा नज़दीक है, जो रूसी ऊर्जा ख़रीदने वाले देशों पर दंड से जुड़े अमेरिकी क़ानून से जुड़ी है। भारत लंबे समय से रूसी तेल का बड़ा ख़रीदार रहा है और नई दिल्ली ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताएँ अमेरिका के सामने रखी हैं। यानी एक तरफ़ गले मिलने की गर्मजोशी है, तो दूसरी तरफ़ आँखें तरेरने वाली शर्तें भी मेज़ पर हैं।
इसी वजह से यह दौरा कूटनीति की शतरंज जैसा दिखता है। अमेरिका को चाहिए ऐसा साझेदार, जो संकट में ईंधन की आपूर्ति सँभालने में मदद करे। भारत को चाहिए सस्ता तेल, अमेरिकी निवेश और प्रतिबंधों से राहत। रिलायंस को चाहिए वैश्विक विस्तार और बड़े अनुबंध। तीनों के हित एक जगह आकर मिलते हैं, और वह जगह है जामनगर।
साथ ही यह भी सच है कि भारत के भीतर इस समय राजनीतिक माहौल गरम है। मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, और कुछ रिपोर्टों ने भारत-अमेरिका रिश्तों में खिंचाव की ओर भी इशारा किया है। रुबियो के दौरे को इसी जटिल पृष्ठभूमि में देखना होगा।
तो क्या जामनगर की रिफ़ाइनरी अमेरिकी डीज़ल संकट का रामबाण इलाज बनेगी? इसका जवाब फ़िलहाल कोई नहीं दे सकता। एक रिफ़ाइनरी का दौरा रातोंरात पंपों की कीमतें नहीं गिरा देता, और असली समाधान होर्मुज़ के रास्ते खुलने, रूसी निर्यात और वैश्विक आपूर्ति के हालात पर निर्भर करेगा। पर इतना तय है कि 22 अक्टूबर तक चलने वाली इस यात्रा पर सिर्फ़ दिल्ली और वॉशिंगटन ही नहीं, तेल बाज़ार की भी नज़र रहेगी।
कुल मिलाकर, इस दौरे का संदेश साफ़ है। ऊर्जा अब सिर्फ़ कारोबार नहीं, कूटनीति का सबसे धारदार हथियार बन चुकी है। और इस हथियार की एक अहम धार इन दिनों गुजरात के समुद्र तट पर चमक रही है।