भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः राजधानी की सड़कों पर इन दिनों जितनी हलचल प्रदर्शनकारियों की है, उससे ज़्यादा बेचैनी उन गलियारों में है जहां सुरक्षा की रणनीति बनती है। खबर यह है कि दिल्ली पुलिस ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के करीब 27,000 जवानों की तैनाती की अवधि बढ़ाने की मांग रखी है। वजह साफ़ है। पुलिस को आशंका है कि विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला जल्द थमने वाला नहीं है। हैरानी की बात यह है कि इस भारी-भरकम संख्या में से लगभग 2,800 जवान अब तक ड्यूटी पर रिपोर्ट ही नहीं कर पाए हैं। यह आंकड़ा सुनने में छोटा लगता है, पर इसके पीछे छिपे सवाल बड़े हैं।
पहले यह समझ लीजिए कि मामला कितना बड़ा है। हाल के दिनों में राजधानी में हुई तैयारियों की मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गृह मंत्रालय ने 8 से 12 अक्टूबर के लिए केंद्रीय बलों की 221 कंपनियां, यानी लगभग 23,000 जवान, दिल्ली पुलिस को उपलब्ध कराई थीं। इनके साथ पहले से मौजूद कंपनियों को जोड़ दें तो दिल्ली में केंद्रीय बलों की संख्या 25,000 के पार पहुंच गई थी। रिपोर्टों में इस तैनाती की तुलना जी-20 शिखर सम्मेलन जैसे आयोजनों से की गई। अब जब तैनाती बढ़ाने की मांग उठी है, तो साफ़ है कि पुलिस मौजूदा हालात को सिर्फ़ एक दिन की चुनौती नहीं मान रही।
सवाल यह है कि पुलिस को इतनी चिंता क्यों है? इसका जवाब पिछले अनुभवों में छिपा है। जुलाई में संसद की ओर हुए मार्च के दौरान दिल्ली पुलिस के अनुसार 118 सुरक्षाकर्मी घायल हुए थे, जबकि प्रदर्शनकारियों के भी घायल होने की बात सामने आई थी। उस घटना की याद अब भी ताज़ा है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति न मिलने, मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश-निकास द्वार बंद करने के प्रस्ताव और सीमाओं पर कड़ी जांच जैसे कदम बताते हैं कि प्रशासन किसी भी तरह की चूक का जोखिम नहीं उठाना चाहता। यानी तैयारी सिर्फ़ भीड़ संभालने की नहीं, बल्कि पिछली गलतियां दोहराने से बचने की भी है।
अब आते हैं उस आंकड़े पर, जो इस पूरी खबर को सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला बनाता है। 2,800 जवान अब तक नहीं पहुंचे। क्या यह परिवहन की दिक्कत है? क्या अलग-अलग राज्यों और अभियानों से जवानों को हटाने में समय लग रहा है? या फिर कहीं और की जिम्मेदारियां इन्हें रोके हुए हैं? आधिकारिक तौर पर जब तक स्पष्ट कारण सामने न आए, हम कोई निष्कर्ष नहीं थोप सकते। पर इतना ज़रूर है कि जब किसी बड़े सुरक्षा घेरे में हजारों जवानों की जगह खाली रह जाए, तो योजना और ज़मीनी हकीकत के बीच का फासला साफ़ दिखने लगता है।
यहां एक और पहलू को अनदेखा नहीं किया जा सकता। केंद्रीय बलों के जवान आमतौर पर कठिन और संवेदनशील इलाकों में तैनात रहते हैं। उन्हें दिल्ली लाने का मतलब है कहीं और की निगरानी को ढीला करना। पहले की रिपोर्टों में यह ज़िक्र आया था कि जवानों को अलग-अलग क्षेत्रों से बुलाया गया है। ऐसे में तैनाती बढ़ाने का हर दिन किसी दूसरी जगह की सुरक्षा पर अतिरिक्त बोझ डालता है। सवाल यह भी है कि राजधानी की सुरक्षा के नाम पर देश के बाकी हिस्सों की चौकसी कितनी कमज़ोर की जा सकती है।
दूसरी तरफ़, जवानों की थकान और मनोबल का मुद्दा भी है। लगातार कई दिनों की ड्यूटी, सीमित आराम और हर पल सतर्क रहने का दबाव किसी भी बल की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। भीड़ नियंत्रण जैसे काम में संयम सबसे बड़ा हथियार होता है, और संयम तभी बना रहता है जब जवान तरोताज़ा हों। दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी पहले ही कर्मियों से न्यूनतम बल और अनुशासन के साथ काम करने की अपील कर चुके हैं। लंबी तैनाती में इस अपील पर टिके रहना और भी कठिन परीक्षा बन जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम का लोकतांत्रिक पहलू भी उतना ही अहम है। शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार है, और कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार का दायित्व। दोनों के बीच संतुलन साधना आसान नहीं होता। जब सड़कों पर बैरिकेड बढ़ते हैं, मेट्रो की रफ़्तार थमती है और बाज़ारों पर ताले लगने की आशंका बनती है, तो आम दिल्लीवासी भी इस संतुलन की कीमत चुकाता है। दफ़्तर जाने वाले, दुकानदार, विद्यार्थी और मरीज, सब किसी न किसी रूप में प्रभावित होते हैं। सुरक्षा ज़रूरी है, पर उसकी कीमत पारदर्शिता के साथ बताई जानी चाहिए।
यह भी सच है कि तैनाती बढ़ाने की मांग अपने आप में प्रदर्शनकारियों पर कोई फैसला नहीं है। यह प्रशासन की सावधानी का संकेत है, जो हालात को भांपकर पहले से तैयारी रखना चाहता है। लेकिन सावधानी और अतिरेक के बीच की रेखा पतली होती है। अगर सुरक्षा का घेरा इतना कसा जाए कि संवाद की गुंजाइश ही खत्म हो जाए, तो तनाव घटने के बजाय बढ़ सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि बातचीत के रास्ते खुले रहें और अनुमति से जुड़े फैसले स्पष्ट कारणों के साथ सामने रखे जाएं।
अंततः असली परीक्षा तैयारी की नहीं, उसके क्रियान्वयन की है। 27,000 जवानों की मांग तभी सार्थक होगी जब वे समय पर, पूरी संख्या में और सही जगह मौजूद हों। 2,800 जवानों का अब तक रिपोर्ट न करना बताता है कि कागज़ी योजना और ज़मीनी अमल में अभी तालमेल की कमी है। गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस को चाहिए कि वे इसकी वजह साफ़ करें और बताएं कि बाकी जवान कब तक पहुंचेंगे।
राजधानी की निगाहें अब इस पर टिकी हैं कि सुरक्षा का यह इम्तिहान शांति से गुज़रता है या तनाव की नई कहानी लिखता है। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह सतर्कता समझदारी साबित होगी या ज़रूरत से ज़्यादा सख्ती। तब तक सवाल बना रहेगा कि जब हजारों जवान तैनात हैं, तो बाकी 2,800 कहां अटके हैं?