भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़: भारत निर्वाचन आयोग में प्रकाश राजपुरोहित को नया डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर (उप चुनाव आयुक्त) नियुक्त किया गया है। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब आयोग के भीतर प्रशासनिक पदानुक्रम और काम के बंटवारे को लेकर गंभीर आंतरिक मतभेद उभर कर सामने आए हैं। केंद्र सरकार द्वारा 10 अक्टूबर 2026 को जारी आदेश के अनुसार, राजस्थान कैडर के 2010 बैच के आईएएस अधिकारी प्रकाश राजपुरोहित को इस महत्वपूर्ण पद पर जिम्मेदारी सौंपी गई है। वह इससे पहले रक्षा उत्पादन विभाग में संयुक्त सचिव के रूप में कार्यरत थे।
क्या लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था में सब कुछ ठीक है?
भारतीय लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाने वाला भारत निर्वाचन आयोग इस समय एक अभूतपूर्व आंतरिक संकट से गुजर रहा है। जब देश की जनता निष्पक्ष चुनावों की उम्मीद लगाए बैठी है, तब चुनाव आयोग के भीतर शीर्ष स्तर पर फाइलों की रूटिंग और अधिकारों की जंग छिड़ चुकी है। आईएएस प्रकाश राजपुरोहित की नए उप चुनाव आयुक्त के रूप में एंट्री महज एक सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह आयोग के भीतर मचे उस घमासान की बानगी है जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त से लेकर अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच के तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह पूरा विवाद तब खुलकर सामने आया जब चुनाव आयुक्तों—एस.एस. संधू और विवेक जोशी—ने देश के कैबिनेट सचिव को एक अत्यंत संवेदनशील पत्र लिखा। इस पत्र ने आयोग के भीतर चल रहे 'सिस्टम' की पोल खोलकर रख दी। दरअसल, यह पूरा मामला आईटी विभाग की फाइलों को सीधे बाईपास करने और तय पदानुक्रम का उल्लंघन करने से जुड़ा हुआ है।
इस बड़े विवाद के केंद्र में पूर्व डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर संजय कुमार (AGMUT कैडर) हैं, जिन्हें अगस्त 2026 में उनकी समय सीमा से पहले ही मूल कैडर में वापस भेज दिया गया था। संजय कुमार अगस्त 2024 से अगस्त 2026 तक आयोग के सबसे महत्वपूर्ण विभागों—इलेक्ट्रोरल रोल (मतदाता सूची) और आईटी डिवीजन के प्रमुख थे। उन्होंने ही 24 जून 2025 को देश में 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (Special Intensive Revision - SIR) शुरू करने के ऐतिहासिक आदेश पर हस्ताक्षर किए थे।
कैबिनेट सचिव को लिखे गए पत्र के अनुसार, नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर से प्रतिनियुक्ति पर आईं डॉ. सीमा खन्ना, जो वर्तमान में चुनाव आयोग के आईटी विभाग की प्रमुख हैं, की फाइलों को संजय कुमार के माध्यम से रूट नहीं किया जा रहा था। वे सीधे तौर पर स्थापित प्रशासनिक पदानुक्रम का उल्लंघन कर रही थीं। दो चुनाव आयुक्तों (संधू और जोशी) ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि आईटी विभाग के प्रमुख की फाइलें एक अनुभवी और वरिष्ठ अधिकारी (संजय कुमार) के पास से होकर क्यों नहीं गुजर रही थीं। इसके तुरंत बाद संजय कुमार को अचानक पद से हटाकर दिल्ली सरकार में भेज दिया गया, जिसने इस विवाद को और हवा दे दी।
यह लड़ाई केवल कुर्सी या ईगो की नहीं है, बल्कि देश के सबसे संवेदनशील डेटा की है। डॉ. सीमा खन्ना के पास चुनाव आयोग के पूरे डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और मतदाता सूची के प्रबंधन की जिम्मेदारी है। ऐसे में जब आयोग के शीर्ष अधिकारी ही यह शिकायत कर रहे हों कि आईटी विभाग की फाइलें नियम कानून ताक पर रखकर आगे बढ़ाई जा रही थीं, तो यह देश की चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है। विपक्ष पहले ही मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है, और इस आंतरिक विवाद ने जलती आग में घी का काम किया है।
इस बेहद तनावपूर्ण माहौल के बीच प्रकाश राजपुरोहित को साल 2030 तक के लिए उप चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया है। राजपुरोहित को प्रशासनिक हलकों में एक बेहद ईमानदार, कुशल और बेदाग छवि वाला अधिकारी माना जाता है। उनकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा प्रशासनिक संतुलन बनाने का एक प्रयास माना जा रहा है।
हालांकि, राजपुरोहित के सामने चुनौतियां पहाड़ जैसी हैं। सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि क्या उन्हें संजय कुमार के दोनों महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो—आईटी विभाग और मतदाता सूची प्रभाग—सौंपे जाएंगे या आयोग के भीतर मचे घमासान को देखते हुए काम का बंटवारा नए सिरे से किया जाएगा। यदि उन्हें ये विभाग मिलते हैं, तो क्या डॉ. सीमा खन्ना और आईटी विभाग की फाइलें उनके जरिए रूट होंगी? या फिर आंतरिक मतभेदों की यह खाई और गहरी होती जाएगी?
यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या राजपुरोहित आयोग के भीतर बिखर चुके पदानुक्रम को दोबारा स्थापित कर पाते हैं या वे भी इस आंतरिक राजनीति का शिकार हो जाएंगे। भारत के लोकतंत्र की साख इस बात पर निर्भर करेगी कि चुनाव आयोग इस अंदरूनी संकट से कितनी जल्दी और कितनी पारदर्शिता के साथ बाहर निकलता है।