भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः आज दिल्ली की नज़रें जंतर-मंतर पर टिकी हैं। एक तरफ़ विपक्षी दलों और जेन-ज़ी के नेतृत्व वाली "कॉकरोच जनता पार्टी" (सीजेपी) का आंदोलन है, जो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग पर अड़ा है। दूसरी तरफ़ चुनाव आयोग के बचाव में 42 पूर्व न्यायाधीश और 124 पूर्व नौकरशाह खुलकर आ गए हैं। सवाल बड़ा है: यह लोकतंत्र की संस्थाओं को बचाने की जंग है, या सत्ता और विपक्ष की पुरानी खींचतान का नया अध्याय?
पहले सड़क का हाल। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम कटने के आरोपों ने विपक्ष को आक्रामक बना दिया है। गांधी जयंती पर दिल्ली और मुंबई में प्रदर्शन हुए। रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर अनुमति नहीं दी, धारा 163 लागू की, कुछ इलाकों में इंटरनेट बंद किया और 700 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। मुंबई के शिवाजी पार्क में सीजेपी की रैली में हज़ारों लोग जुटे। संस्थापक अभिजीत दिपके ने साफ़ चेतावनी दी कि इस्तीफ़ा न होने पर देश भर के युवा दिल्ली कूच करेंगे। उधर इंडिया गठबंधन के सांसद संसद से मार्च निकाल चुके हैं और राहुल गांधी आठ घंटे के धरने पर बैठे। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूचियों में हेराफेरी भाजपा के फ़ायदे के लिए हुई है। भाजपा और चुनाव आयोग इन आरोपों को सिरे से नकारते हैं।
इसी माहौल में 7 अक्टूबर की तारीख़ वाला 42 पूर्व जजों का खुला पत्र आया। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश हेमंत गुप्ता और पंकज मित्तल के साथ कई पूर्व मुख्य न्यायाधीश बताए गए हैं। पत्र का मूल तर्क यह है कि संवैधानिक संस्थाओं को "चोर" या "कठपुतली" कहना राजनीतिक आलोचना की सीमा लाँघता है। पूर्व जजों के अनुसार "वोट चोरी" जैसे आरोप मंचों से लगाए जा रहे हैं, जबकि इन्हें प्रमाण के साथ अदालत या आयोग के सामने रखना चाहिए। उनका कहना है कि अब तक किसी अदालत में ये आरोप सिद्ध नहीं हुए। एसआईआर के बारे में पत्र कहता है कि अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) आयोग को सूची संशोधित करने का अधिकार देती हैं।
10 अक्टूबर को 124 पूर्व सिविल सेवकों का भी एक खुला पत्र सामने आया है। यूएनआई की रिपोर्ट के अनुसार इसमें सेवानिवृत्त आईएएस और आईएफ़एस अधिकारी शामिल हैं, जिनमें पूर्व राजदूत भास्वती मुखर्जी और कर्नाटक के पूर्व अपर मुख्य सचिव एम. मदन गोपाल का नाम है। पत्र में कहा गया कि धाँधली के दावों के साथ सबूत होने चाहिए, और बिना प्रमाण के आरोप जनता का भरोसा कमज़ोर करते हैं। इसमें बूथ कब्ज़े, मतपेटी लूट और मतदाताओं को डराने-धमकाने के पुराने दौर से आज की व्यवस्था की तुलना भी की गई है, और बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया गया है। यानी न्यायपालिका और नौकरशाही के सेवानिवृत्त चेहरे एक साथ आयोग की ढाल बनते दिख रहे हैं।
लेकिन तस्वीर यहीं ख़त्म नहीं होती। इसका दूसरा पहलू भी उतना ही वज़नदार है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने बीते दस महीनों में एसआईआर और जुड़ी प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 बार आपत्तियाँ दर्ज कीं। इसी रिपोर्ट के बाद सीजेपी ने नए सिरे से आंदोलन का एलान किया। इसके अलावा 98 पूर्व सिविल सेवकों के एक अन्य पत्र में मुख्य चुनाव आयुक्त पर आयोग को "राज्य की शक्ति का औज़ार" बनाने का आरोप लगा। 5 अक्टूबर को पूर्व गृह सचिव जी.के. पिल्लई, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग और अन्य पूर्व अधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने ज्ञानेश कुमार को "महाभियोग की सूचना" सौंपने की कोशिश की। उसी दिन सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और आयोग को नोटिस जारी किए, उन याचिकाओं पर जिनमें आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने बाकी दोनों आयुक्तों की सहमति के बिना फ़ैसले लिए। यह मामला अभी विचाराधीन है और इसका निर्णय आना बाकी है।
इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि पूर्व जजों और पूर्व अफ़सरों के पत्र सम्मानित राय हैं, अदालती फ़ैसले नहीं। उनसे यह साबित नहीं होता कि हर आरोप ग़लत है, और विपक्ष की शिकायतें मात्र इसलिए खारिज नहीं हो जातीं कि उनके ख़िलाफ़ बड़े नाम खड़े हैं। उतनी ही सच्चाई यह भी है कि सिर्फ़ नारों और प्रदर्शनों से कोई आरोप प्रमाणित नहीं होता। पूर्व जजों की यह बात वाजिब है कि सबूत के साथ अदालत जाना ही रास्ता है, और विपक्ष की यह माँग भी जायज़ है कि मतदाता सूची से कटे नामों का हिसाब पारदर्शी ढंग से सामने आए।
सबसे बड़ी चिंता प्रदर्शनों से निपटने के तरीक़े को लेकर भी है। शांतिपूर्ण असहमति लोकतंत्र की साँस है। जब सैकड़ों लोग हिरासत में लिए जाएँ और इंटरनेट बंद हो, तो सवाल यह भी उठता है कि विरोध के लिए जगह कहाँ बची। दूसरी ओर सड़कों पर उतरे समूहों से भी अपेक्षा है कि वे हिंसा और अफ़वाह से दूर रहें।
अंत में बात भरोसे की है। चुनाव आयोग तभी ताक़तवर होता है जब हर दल, चाहे जीते या हारे, उसके फ़ैसलों पर यक़ीन करे। इसके लिए आयोग को अपने हर बड़े निर्णय की वजह साफ़ बतानी होगी, आयुक्तों के कथित मतभेदों पर स्पष्टीकरण देना होगा और सर्वोच्च न्यायालय में चल रही सुनवाई का सम्मान करना होगा। विपक्ष को भी आरोपों के साथ प्रमाण रखने होंगे। चिट्ठियाँ और नारे ध्यान खींच सकते हैं, पर भरोसा जवाबदेही और पारदर्शिता से ही लौटता है।