भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः राजधानी दिल्ली के दिल कनॉट प्लेस में शुक्रवार की शाम कुछ ऐसा होने जा रहा है, जिसे सत्ता और विपक्ष, दोनों नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने 16 अक्टूबर को शाम पाँच बजे सेंट्रल पार्क में "लहरा दो तिरंगा" जुटान का ऐलान किया है। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने बुधवार को सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर देशभर के "तिरंगा-प्रेमियों" से राष्ट्रीय ध्वज लेकर पहुँचने की अपील की। उनका संदेश सीधा है: तिरंगा लहराना कोई अपराध नहीं है, और यह बात सड़क पर साबित की जाएगी।
अब सवाल यह है कि जिस झंडे को हर साल स्वतंत्रता दिवस पर घर-घर पहुँचाने के अभियान चलते हैं, उसे लेकर इतनी तनातनी क्यों है? इसका जवाब पिछले कुछ दिनों की घटनाओं में छिपा है।
सीजेपी ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर "चलो दिल्ली" प्रदर्शन का आह्वान किया था। मुद्दा था कथित "वोट चोरी" और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की जवाबदेही। दिल्ली पुलिस ने 9 अक्टूबर को अनुमति देने से इनकार कर दिया। कारण बताए गए: कम समय की सूचना, पहले के प्रदर्शन में निर्देशों की कथित अनदेखी, और कानून-व्यवस्था व यातायात की चिंता। नई दिल्ली ज़िले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा भी लागू कर दी गई। पुलिस ने दर्जनों मेट्रो स्टेशनों के गेट बंद करने तक का अनुरोध किया था। यानी एक युवा-नेतृत्व वाले संगठन के प्रदर्शन के लिए सुरक्षा इंतज़ाम किसी बड़े आयोजन जैसे थे।
इसके बाद पार्टी के नेता सौरभ दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया और उन्हें पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ भेज दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार मामला कथित अतिक्रमण और बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन से जुड़ा है। दिपके का दावा है कि दोनों नेताओं को "तिरंगा फहराने" भर के लिए जेल भेजा गया। पुलिस और प्रशासन का पक्ष इससे अलग हो सकता है, और कानूनी प्रक्रिया में तथ्य अदालत में तय होंगे। लेकिन राजनीति में धारणा अक्सर तथ्यों से तेज़ दौड़ती है, और इस वक्त धारणा यही बन रही है कि झंडे और विरोध के बीच एक लकीर खींच दी गई है।
यहीं सीजेपी ने अपना सबसे चतुर दाँव चला है। जब आप किसी आंदोलन से उसका मंच छीन लेते हैं, तो वह प्रतीक चुन लेता है, और तिरंगे से बड़ा कोई प्रतीक भारत में नहीं है। जो पार्टी अपने नाम और अंदाज़ से व्यंग्य की राजनीति करती आई है, उसने इस बार व्यंग्य की जगह सबसे गंभीर प्रतीक उठा लिया है। अब सरकार या पुलिस अगर कनॉट प्लेस में तिरंगा थामे लोगों को रोकती है, तो उसे जवाब देना पड़ेगा कि राष्ट्रीय ध्वज से दिक्कत क्या है। और अगर रोकती नहीं, तो आंदोलन को वह वैधता मिल जाएगी जो जंतर-मंतर पर नहीं मिल सकी।
दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि सार्वजनिक स्थल पर भीड़ जुटाने के नियम होते हैं। शाम पाँच बजे का कनॉट प्लेस दफ़्तर से लौटते लोगों, खरीदारों और पर्यटकों से भरा होता है। भीड़ बेकाबू हुई तो परेशानी आम लोगों को होगी। प्रशासन की चिंता को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और व्यवस्था की ज़िम्मेदारी, दोनों साथ चलने चाहिए। संतुलन तभी बनेगा जब आयोजक शांति और अनुशासन की गारंटी दें और पुलिस संयम व संवाद का रास्ता चुने।
दिपके ने एक और अपील की है, जो इस आयोजन को दिल्ली तक सीमित नहीं रखती। जो लोग राजधानी नहीं पहुँच सकते, वे उसी शाम अपने-अपने शहरों में तिरंगा मार्च निकालें। यह रणनीति आंदोलन को विकेंद्रित करती है। एक जगह रोकने से बात नहीं बनेगी, क्योंकि झंडा एक साथ कई चौराहों पर लहराएगा। सोशल मीडिया के दौर में तस्वीरें और वीडियो कुछ ही मिनटों में देशभर में पहुँच जाते हैं, और यही सीजेपी की असली ताक़त है।
फिर भी कुछ सवाल बाकी हैं। क्या यह जुटान मुद्दों पर टिका रहेगा, यानी वोटर लिस्ट की पारदर्शिता और चुनाव आयोग की जवाबदेही जैसे सवालों पर, या सिर्फ़ प्रतीकों की लड़ाई बनकर रह जाएगा? क्या विपक्षी दल इसमें खुलकर उतरेंगे, और क्या इससे आंदोलन की स्वतंत्र पहचान धुँधली होगी? और सबसे अहम, क्या दोनों पक्ष तनाव को टकराव में बदलने से बचा पाएँगे?
इन सवालों के जवाब शुक्रवार शाम तक मिलने लगेंगे। तब तक इतना तय है कि तिरंगा किसी एक दल, संगठन या सरकार की जागीर नहीं है। वह हर उस नागरिक का है जो संविधान में भरोसा रखता है। उसे थामने का अधिकार भी सबका है और उसकी गरिमा बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भी सबकी। 16 अक्टूबर को सेंट्रल पार्क में जो होगा, वह सिर्फ़ एक पार्टी की परीक्षा नहीं, हमारे लोकतांत्रिक संयम की भी परीक्षा होगी। देखना यह है कि उस शाम तिरंगा सचमुच लहराता है, या सवालों में उलझकर रह जाता है।