भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः कल्पना कीजिए: त्योहारों की रौनक में नहाया कनॉट प्लेस, हाथों में लहराते तिरंगे और चारों तरफ़ वर्दी का पहरा। 16 अक्टूबर को राजधानी में यही नज़ारा बनने वाला है। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के "लहरा दो तिरंगा" आह्वान से पहले दिल्ली में भारी सुरक्षा बंदोबस्त किया गया है। सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि झंडा कौन उठाएगा। असल सवाल यह है कि इस शक्ति-प्रदर्शन में कसौटी पर कौन है: आंदोलनकारी, सरकार, विपक्ष या पुलिस?
इस आयोजन की पहली अड़चन गुरुवार को दूर हो गई। पालिका बाज़ार के एक दुकानदार ने त्योहारी मौसम में कारोबार ठप होने की आशंका जताते हुए हाईकोर्ट का रुख़ किया था। अदालत ने सीजेपी और अभिजीत दिपके को सेंट्रल पार्क में प्रदर्शन से रोकने का आदेश नहीं दिया और पुलिस के उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया कि गतिविधि को नियंत्रित करने के हर संभव कदम उठाए जाएँगे। विश्लेषण की नज़र से इस फ़ैसले के दो संकेत हैं। दुकानदार की चिंता को जगह मिली और प्रदर्शन का रास्ता भी खुला रहा। अब सारा दारोमदार अमल पर है, यानी वादे ज़मीन पर कितने उतरते हैं।
राजनीति के लिहाज़ से सीजेपी ने सबसे सधा हुआ दाँव खेला है। उसने अपने अभियान का चेहरा तिरंगे को बनाया है। दिपके ने "देशभक्तों" को झंडे के साथ सेंट्रल पार्क बुलाया है और दावा किया है कि सौरव दास और आशुतोष रंका को तिरंगा फहराने की वजह से जेल जाना पड़ा। इस ढाँचे की ताक़त यह है कि पार्टी राष्ट्रप्रेम की कतार में खड़ी दिखती है, जबकि कार्रवाई करने वाला पक्ष सफ़ाई देने की मुद्रा में आ जाता है। जो लोग दिल्ली नहीं पहुँच सकते, उनके लिए भी योजना है। दिपके ने उनसे शाम को अपने-अपने शहरों में तिरंगा यात्राएँ निकालने की अपील की है। यह आंदोलन को राष्ट्रव्यापी रंग देने की कोशिश है।
पर कहानी का दूसरा पहलू भी तथ्यों में दर्ज है। दास और रंका समेत कुछ सदस्य तिरंगा लेकर जंतर-मंतर में दाखिल हुए और पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। यह कार्रवाई जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन-स्थलों की सूची से हटाए जाने के एक दिन बाद हुई। यानी पुलिस की दलील झंडे के बजाय जगह और अनुमति पर टिकी हो सकती है। असल वजह क्या थी, इसकी स्वतंत्र पुष्टि फ़िलहाल उपलब्ध नहीं है। इसलिए दोनों पक्षों के दावों को आरोप मानकर ही परखना होगा।
विकल्प भी सामने रखे गए थे। रामलीला मैदान, बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड जैसी जगहें सुझाई गईं, पर सीजेपी जंतर-मंतर पर ही अड़ी रही। विरोध की राजनीति में जगह का मतलब सिर्फ़ भूगोल नहीं होता, वह दृश्यता और संदेश की धार भी तय करती है। उधर प्रशासन का नज़रिया भी वाज़िब है। भीड़भाड़ वाले इलाकों में बिना नियमन की सभा से आम नागरिकों का रोज़मर्रा का जीवन प्रभावित होता है। इसी खिंचाव में पूरे प्रकरण की जड़ छिपी है।
अब राजनीतिक परत देखिए। यह प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरोध से जुड़ा है। दिपके का आरोप है कि केंद्र सरकार मुख्य चुनाव आयुक्त को संरक्षण दे रही है। यह उनका दावा है। इसकी पुष्टि या सरकार और आयोग की ओर से जवाब, इस आलेख की उपलब्ध जानकारी में शामिल नहीं है। रणनीतिक रूप से देखें तो सीजेपी ने परीक्षा पेपर लीक पर जवाबदेही और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की माँग से शुरुआत की थी। चुनाव आयोग का मुद्दा जोड़ने से दायरा बढ़ता है, पर जोखिम यह भी है कि मूल माँग धुँधली पड़ जाए और आंदोलन बिखरे हुए एजेंडे का शिकार बने।
पुलिस के सामने दोहरी चुनौती है। नरमी बरती और भीड़ बेकाबू हुई, तो त्योहारी बाज़ार की रौनक और दुकानदार दोनों भुगतेंगे। हद से ज़्यादा सख़्ती हुई, तो वही कथानक मज़बूत होगा जो आयोजक सुनाना चाहते हैं। जुलाई का अनुभव इस मामले में सबक है। तब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के आचरण को अनियंत्रित, आक्रामक और हिंसक बताया था, जबकि सीजेपी का आरोप था कि संसद की ओर बढ़ रहे छात्रों पर अत्यधिक बल का इस्तेमाल हुआ। दोनों बयान आमने-सामने थे। इस बार सच का फ़ैसला वीडियो, आधिकारिक ब्योरे और निष्पक्ष गवाहियाँ करेंगी।
तो 16 अक्टूबर की असली परीक्षा किसकी है? जवाब है, सबकी। सीजेपी को साबित करना है कि उसकी भीड़ अनुशासित है और तिरंगे के प्रति उसका प्रेम सियासी गणित से ऊपर है। पुलिस को दिखाना है कि उसका संयम उसके आश्वासनों जितना ही पक्का है। सरकार और विपक्ष की भी परीक्षा है कि वे इसे टकराव का अखाड़ा बनाते हैं या संवाद का मौका। प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा तो यह लोकतांत्रिक परिपक्वता की मिसाल बनेगा। वरना नुकसान सबकी साख का होगा। तिरंगा किसी एक दल या संगठन का नहीं, पूरे देश का है, और उसकी गरिमा बचाए रखना सबकी साझा ज़िम्मेदारी है।