भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़ः कैंसर का नाम सुनते ही किसी भी परिवार की रीढ़ में सिहरन दौड़ जाती है। बीमारी का डर तो होता ही है, उससे भी बड़ा डर इलाज के भारी-भरकम खर्च का होता है। कीमोथेरेपी का एक चक्र, महीनों चलने वाली दवाइयाँ और अस्पतालों के चक्कर कई बार जीवन भर की जमा-पूँजी निगल जाते हैं। ऐसे में सरकार का यह कदम करोड़ों मरीज़ों और उनके परिजनों के लिए उम्मीद की किरण बनकर आया है। सरकार ने 137 कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन की सीमा तय कर दी है, और संशोधित कीमतें 9 नवंबर से प्रभावी होंगी।
आम आदमी जब दवा की दुकान पर पहुँचता है, तो उसके हाथ में जो पर्ची होती है, उस पर लिखी दवा की कीमत सीधे निर्माता की लागत नहीं होती। निर्माता से निकलकर दवा वितरक (स्टॉकिस्ट), थोक विक्रेता और फिर खुदरा विक्रेता तक पहुँचती है। हर पड़ाव पर कुछ मुनाफ़ा जुड़ता जाता है। इसी मुनाफ़े को व्यापार मार्जिन कहा जाता है। समस्या तब पैदा होती है जब यह मार्जिन बेहिसाब बढ़ जाए। कई महँगी दवाओं के मामले में देखा गया है कि निर्माता से अस्पताल या दुकान तक पहुँचते-पहुँचते कीमत कई गुना हो जाती है, और इसका सीधा बोझ मरीज़ की जेब पर पड़ता है।
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने चुनिंदा कैंसर-रोधी दवाओं के व्यापार मार्जिन को युक्तिसंगत बनाने की प्रक्रिया के तहत 137 दवाओं पर सीमा लागू की है। इन दवाओं की संशोधित अधिकतम खुदरा कीमतें 9 नवंबर से प्रभावी होंगी। इसका अर्थ यह है कि उस तिथि के बाद विक्रेता तय सीमा से अधिक मार्जिन जोड़कर इन दवाओं को नहीं बेच सकेंगे। उल्लेखनीय है कि पहले भी सरकार ने कैंसर की कई दवाओं पर इसी तरह मार्जिन सीमित किया था, जिससे कुछ दवाओं की कीमतों में भारी गिरावट देखी गई थी। अब इस दायरे को और बड़ा किया गया है।
सबसे बड़ा लाभ यह है कि कैंसर के इलाज में काम आने वाली अनेक दवाइयाँ पहले की तुलना में सस्ती हो सकती हैं। जिन परिवारों में महीने का दवा-खर्च हज़ारों से लाखों रुपये तक पहुँच जाता था, उन्हें कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। विशेषकर निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोग, जो अक्सर इलाज के लिए कर्ज़ लेने या संपत्ति बेचने को मजबूर हो जाते हैं, इस फैसले से सीधे लाभान्वित होंगे। छोटे शहरों और कस्बों के मरीज़, जिनके पास सीमित विकल्प होते हैं और जो दुकानदार की बताई कीमत पर निर्भर रहते हैं, उनके लिए भी यह कदम पारदर्शिता लाने वाला साबित हो सकता है।
सच यह है कि केवल घोषणा से समस्या हल नहीं हो जाती। असली परीक्षा इसके अमल में है। देश में दवा की कीमतों के उल्लंघन की शिकायतें समय-समय पर सामने आती रही हैं। इसलिए ज़रूरी है कि निगरानी तंत्र मज़बूत हो और राज्यों के औषधि नियंत्रक सतर्क रहें। साथ ही, यह भी देखना होगा कि मार्जिन घटने के बाद बाज़ार में दवाओं की उपलब्धता प्रभावित न हो। अतीत में कई बार यह आशंका जताई गई है कि कीमत नियंत्रण से कंपनियाँ या विक्रेता किसी दवा की आपूर्ति कम कर सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो सस्ती दवा का फ़ायदा कागज़ों तक सीमित रह जाएगा।
दवा उद्योग और खुदरा विक्रेताओं के संगठन अक्सर यह तर्क देते हैं कि मार्जिन में कटौती से उनका परिचालन खर्च निकालना कठिन हो जाता है, खासकर तब जब भंडारण, परिवहन और तापमान-नियंत्रित रखरखाव जैसी लागतें बढ़ रही हों। उनकी चिंता को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जीवनरक्षक दवाओं के मामले में मुनाफ़े और मानवीयता के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है। सरकार की भूमिका इसी संतुलन को साधने की है, ताकि न मरीज़ ठगा जाए और न ही आपूर्ति शृंखला चरमराए।
यदि आप या आपके परिवार का कोई सदस्य कैंसर का इलाज करा रहा है, तो 9 नवंबर के बाद दवा खरीदते समय पैकेट पर छपी कीमत और संशोधित मूल्य सूची का मिलान अवश्य करें। एनपीपीए की वेबसाइट पर अधिसूचित कीमतें देखी जा सकती हैं। यदि कोई विक्रेता तय कीमत से अधिक वसूलता है, तो उसकी शिकायत संबंधित राज्य के औषधि नियंत्रक या एनपीपीए की शिकायत व्यवस्था में दर्ज कराई जा सकती है। जागरूक उपभोक्ता ही किसी भी नीति को ज़मीन पर सफल बनाता है। साथ ही, अपने चिकित्सक से जेनेरिक या समकक्ष किफ़ायती विकल्पों के बारे में पूछना भी खर्च घटाने का एक कारगर तरीक़ा है।
कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से लड़ाई केवल अस्पताल के बिस्तर पर नहीं, बल्कि बैंक खाते और घर के बजट में भी लड़ी जाती है। 137 कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन की सीमा तय करना इस लड़ाई में मरीज़ों के पक्ष में उठाया गया सराहनीय क़दम है। 9 नवंबर से लागू होने वाली नई कीमतें कितनी राहत देंगी, यह इस पर निर्भर करेगा कि नियम कितनी ईमानदारी से लागू होते हैं। यदि निगरानी सख़्त रही और आपूर्ति सुचारु बनी रही, तो यह फैसला लाखों परिवारों के लिए सचमुच जीवनदायी सिद्ध हो सकता है। अब नज़र इस पर है कि कागज़ पर लिखी राहत मरीज़ की हथेली तक कब और कितनी पहुँचती है।