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सरकार ने महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को समर्थन तथा सहायता प्रदान करने के लिए विभिन्‍न कदम उठाए हैं

February 05, 2026 09:17 AM

सरकार ने एसिड हमलों की रोकथाम, अपराधियों को दंडित करने, पीड़ितों की सुरक्षा और उनके पुनर्वास के लिए एक व्यापक कानूनी, संस्थागत और नीतिगत ढांचा स्थापित किया है, जिसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के समन्वय से लागू किया जा रहा है।

भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत "पुलिस" और "सार्वजनिक व्यवस्था" राज्य के विषय हैं। तदनुसार, कानून व्यवस्था बनाए रखने, जांच करने, अभियोजन चलाने और नागरिकों की सुरक्षा, जिनमें एसिड हमलों के पीड़ित भी शामिल हैं, की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की है। राज्य सरकारें मौजूदा कानूनों के तहत ऐसे अपराधों से निपटने में सक्षम हैं।

भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023, जिसने 1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता का स्थान लिया है, के तहत एसिड हमले को गंभीर अपराध के रूप में मान्यता दी गई है। बीएनएस की धारा 124(1) में एसिड या इसी तरह के संक्षारक पदार्थ से गंभीर चोट पहुंचाने पर कम से कम दस वर्ष के कारावास, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माने का भी प्रावाधान है जो पीड़ित के उपचार के चिकित्सा खर्चों को पूरा करने के लिए उचित और तर्कसंगत होना चाहिए। बीएनएस की धारा 124(2) में एसिड हमले के प्रयास को अपराध घोषित किया गया है और जुर्माने के साथ पांच से सात वर्ष के कारावास का प्रावधान है, जिससे गंभीर चोट न लगने की स्थिति में भी अपराध को रोकने के लिए कड़ा दंड सुनिश्चित होता है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 396 के अनुसार, प्रत्येक राज्य सरकार केंद्र सरकार के समन्वय से पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना तैयार करेगी, जिसके तहत अपराध के परिणामस्वरूप हानि या चोट झेलने वाले और पुनर्वास की आवश्यकता वाले पीड़ित या उनके आश्रितों को क्षतिपूर्ति प्रदान करने के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जाएगी। धारा में यह भी प्रावधान है कि देय क्षतिपूर्ति पीड़ित को जुर्माने के भुगतान के अतिरिक्त होगी। गृह मंत्रालय ने 20 अप्रैल 2015 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) (अब बीएनएसएस) के प्रावधानों को लागू करने, एसिड हमले के मामलों में कार्रवाई में तेजी लाने और पीड़ितों को उपचार और क्षतिपूर्ति प्रदान करने के लिए कदम उठाने संबंधी एक व्यापक सलाह भी जारी की है।

सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने-अपने राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में पीड़ित मुआवजा योजना अधिसूचित कर दी है। गृह मंत्रालय ने निर्भया कोष के अंतर्गत केंद्रीय पीड़ित मुआवजा कोष (सीवीसीएफ) योजना के माध्यम से वित्तीय वर्ष 2016-17 में सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को उनकी संबंधित राज्य पीड़ित मुआवजा योजनाओं के समर्थन हेतु 200.00 करोड़ रुपये की एकमुश्त अनुदान राशि जारी की है।

इसके अतिरिक्त, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिनांक 11.05.2018 के आदेश के अनुसार, डब्लूपीपी(सी) संख्या 565/2012 - निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ मामले में, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए) ने यौन उत्पीड़न/अन्य अपराधों की महिला पीड़ितों/उत्तरजीवियों को दिए जाने वाले मुआवजे को बढ़ाने के लिए संशोधित योजना तैयार की। इस योजना में एसिड हमलों के मामले भी शामिल हैं। इस योजना को महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 18.05.2018 को और गृह मंत्रालय ने 28.06.2018 को सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को अनुपालन हेतु प्रेषित किया था।

इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण ने कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत एनएएलएसए (एसिड हमलों के पीड़ितों के लिए कानूनी सेवाएं) योजना, 2016 तैयार की है। इस योजना के मुख्य उद्देश्यों में एसिड हमलों के पीड़ितों को चिकित्सा सुविधाओं और पुनर्वास सेवाओं तक पहुंच प्रदान करना और एसिड हमले के पीड़ितों के लिए कानूनी सहायता को मजबूत करना शामिल है।

गृह मंत्रालय ने 30.08.2013 को एक परामर्श जारी कर सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को मॉडल विष नियम प्रसारित किए हैं, ताकि वे अपने-अपने राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में एसिड की बिक्री को विनियमित करने के लिए इन्हें अधिसूचित कर सकें। मंत्रालय ने 12.08.2021 को एक और परामर्श जारी कर सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया था कि एसिड और रसायनों की खुदरा बिक्री विष नियमों के अनुसार सख्ती से विनियमित हो, ताकि इनका इस्तेमाल अपराधों में न हो। ये परामर्श www.mha.gov.in पर उपलब्ध हैं ।

केंद्र सरकार ने महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रयासों को समर्थन और सहायता प्रदान करने के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं। सरकार ने महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा और सशक्तिकरण के लिए एक व्यापक योजना "मिशन शक्ति" लागू की है। इस योजना में 'वन स्टॉप सेंटर (ओएससी)' के घटक शामिल हैं, जिनके तहत किसी भी पीड़ित या संकटग्रस्त महिला को एक ही छत के नीचे चिकित्सा सहायता, मनो-सामाजिक परामर्श, पुलिस सहायता, कानूनी सहायता और परामर्श तथा 5 दिनों तक का अस्थायी आश्रय जैसी एकीकृत सेवाएं प्रदान की जाती हैं। 24×7×365 टोल-फ्री महिला हेल्पलाइन (181) को सार्वभौमिक बनाया गया है। यह जरूरतमंद महिलाओं को उपयुक्त अधिकारियों से जोड़कर आपातकालीन और गैर-आपातकालीन सेवाएं प्रदान करती है। 31 दिसंबर, 2025 तक, देश भर में कुल 96,37,805 महिलाओं को सहायता प्रदान की जा चुकी है। इसके अलावा, आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ईआरएसएस), जो संकट में फंसी महिलाओं के लिए एक अखिल भारतीय एकल नंबर (112)/मोबाइल ऐप आधारित आपात स्थिति प्रणाली है, भी उपलब्ध है। अब, जरूरतमंद महिलाओं को चौबीसों घंटे आपातकालीन और गैर-आपातकालीन सहायता और समर्थन प्रदान करने के लिए महिला हेल्पलाइन (डब्ल्यूएचएल) को ईआरएसएस के साथ एकीकृत किया गया है। इसके अतिरिक्त, निर्भया कोष के तहत, केंद्र सरकार ने सभी पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क (डब्ल्यूएचडी) स्थापित करने के लिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता प्रदान की है। अब तक, पुलिस थानों में 14658 महिला हेल्प डेस्क स्थापित किए गए हैं। साथ ही, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय मिशन शक्ति के अंतर्गत "समर्थया" उप-योजना का संचालन भी करता है, जिसमें शक्ति सदन का एक घटक एसिड हमले की शिकार महिलाओं सहित कठिन परिस्थितियों में महिलाओं के राहत और पुनर्वास के लिए कार्य करता है।

पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (बीपीआर एंड डी) ने कई पहलें की हैं, जिनमें जांच अधिकारियों, अभियोजन अधिकारियों और चिकित्सा अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण और कौशल विकास कार्यक्रम शामिल हैं। बीपीआर एंड डी ने पुलिस स्टेशनों में महिला सहायता डेस्क के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) भी तैयार की हैं। महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों का पता लगाने और उनकी रोकथाम के लिए तथा अपराध पीड़ितों के साथ बातचीत के दौरान पुलिस के उचित व्यवहार और दृष्टिकोण कौशल पर जोर दिया गया है। बीपीआर एंड डी ने महिला सुरक्षा और पुलिस कर्मियों के लैंगिक संवेदनशीलता पर भी वेबिनार आयोजित किए हैं।

इसके अलावा, सरकार राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) और राज्यों में इसके समकक्ष संस्थानों के माध्यम से सेमिनार, कार्यशालाओं, ऑडियो-विजुअल, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि के जरिए महिलाओं की सुरक्षा के साथ-साथ कानूनों और नीतियों के विभिन्न प्रावधानों के बारे में जागरूक कर रहा है। साथ ही, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और गृह मंत्रालय समय-समय पर राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों को महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर परामर्श जारी करते रहे हैं। दर्ज शिकायतों के संबंध में, एनसीडब्ल्यू सभी संबंधित पक्षों, विशेष रूप से पुलिस अधिकारियों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करता है कि शिकायतों का निवारण हो और उनका तार्किक निष्कर्ष निकले।

केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी ने आज राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी।

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