पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। खाड़ी क्षेत्र से कच्चे तेल की आपूर्ति पर संभावित असर को लेकर चिंताएं तेज हो गई हैं। ऐसे समय में भारत के लिए राहत की बात यह है कि देश के पास लगभग 50 दिनों की खपत के बराबर रणनीतिक और वाणिज्यिक तेल भंडार उपलब्ध है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि आपूर्ति श्रृंखला की निरंतरता बनाए रखने के लिए सभी विकल्प सक्रिय रखे गए हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक, खाड़ी देशों से आयात में किसी भी प्रकार की बाधा अंतरराष्ट्रीय कीमतों को प्रभावित कर सकती है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव का सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा भंडार और विविधीकृत आयात स्रोतों के कारण तत्काल किसी संकट की आशंका नहीं है।
इसी बीच Russia ने भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने का संकेत दिया है। यूक्रेन संकट के बाद से रूस भारत के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं में शामिल रहा है। रियायती दरों पर रूसी तेल की उपलब्धता ने पिछले वर्षों में भारत के आयात बिल को संतुलित करने में मदद की है। ताजा हालात में मॉस्को की ओर से अतिरिक्त आपूर्ति का प्रस्ताव भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां वैकल्पिक स्रोतों से भी संपर्क में हैं। मध्य एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से अतिरिक्त आपूर्ति की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है, ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम की जा सके। साथ ही, रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व से आवश्यकता पड़ने पर सीमित मात्रा में तेल जारी करने की व्यवस्था भी मौजूद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाड़ी क्षेत्र में तनाव लंबा खिंचता है, तो वैश्विक बाजार में कीमतों में उछाल देखा जा सकता है। ऐसे में भारत के लिए आयात विविधीकरण, दीर्घकालिक अनुबंध और ऊर्जा सुरक्षा नीति को और मजबूत करना जरूरी होगा। सरकार नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक ईंधन स्रोतों पर भी तेजी से काम कर रही है, ताकि दीर्घकाल में आयात पर निर्भरता घटाई जा सके।
फिलहाल, 50 दिनों का उपलब्ध स्टॉक और रूस की अतिरिक्त आपूर्ति का आश्वासन भारत को तत्काल राहत देता है। हालांकि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। आने वाले दिनों में वैश्विक हालात और कूटनीतिक प्रयास यह तय करेंगे कि ऊर्जा बाजार की दिशा क्या होगी और भारत किस हद तक कीमतों के दबाव से बच पाता है।