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सोशल वेलफेयर

मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के तहत 14.03 लाख आंगनवाड़ी केन्द्र कार्यरत हैं

March 25, 2026 11:43 AM

‘पोषण ट्रैकर’, आंगनवाड़ी केन्द्रों में होने वाली सभी गतिविधियों की लगभग वास्तविक समय में निगरानी और ट्रैकिंग से संबंधित एक डिजिटल एप्लिकेशन है

मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के तहत, देश भर में 14.03 लाख आंगनवाड़ी केन्द्र  (एडब्ल्यूसी) कार्यरत हैं। ये आंगनवाड़ी केन्द्र लगभग 8.98 करोड़ पंजीकृत लाभार्थियों को आंगनवाड़ी सेवाएं, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (ईसीसीई), बच्चों के विकास एवं प्रगति के बारे में जागरूकता और पूरक पोषण के लाभों से अवगत कराते हैं। दिव्यांग सहित सभी बच्चों के लिए आंगनवाड़ी केन्द्रों में सर्वोत्तम शिक्षा सुनिश्चित करने हेतु, दो पाठ्यक्रम की रूपरेखाएं – “नवचेतना - जन्म से तीन वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था प्रोत्साहन हेतु राष्ट्रीय रूपरेखा, 2024” और “आधारशिला - तीन से छह वर्ष तक के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा हेतु राष्ट्रीय पाठ्यक्रम, 2024”- विकसित की गई हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने परिभाषित संकेतकों पर आंगनवाड़ी केन्द्रों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं (एडब्ल्यूडब्ल्यू) और लाभार्थियों की सभी गतिविधियों की लगभग वास्तविक समय में निगरानी और ट्रैकिंग के लिए ‘पोषण ट्रैकर’ नामक डिजिटल एप्लिकेशन का शुभारंभ किया है। पोषण स्तर में मापनीय सुधारों का विवरण पोषण ट्रैकर के सार्वजनिक डैशबोर्ड पर इस लिंक: https://www.poshantracker.in/statistics पर उपलब्ध है। यह एप्लिकेशन जन्म की तैयारी, प्रसव, प्रसवोत्तर देखभाल, स्तनपान और पूरक आहार से संबंधित संदेशों के प्रसार में सहायक प्रमुख व्यवहारों और सेवाओं से संबंधित परामर्श वीडियो भी प्रदान करता है। पोषण ट्रैकर एप्लिकेशन के उपयोग के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए नियमित रूप से क्षेत्र-स्तरीय प्रशिक्षण और कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं।

इसके अलावा, मिशन पोषण 2.0 के तहत ‘पोषण भी पढ़ाई भी (पीबीपीबी)’ नामक एक क्रमबद्ध प्रशिक्षण मॉडल को संस्थागत रूप दिया गया है। इस पहल के तहत, जन्म से 6 वर्ष तक की आयु वाले बच्चों के लिए आंगनवाड़ी प्रणाली के जरिए प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु, सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास संस्थान (एसपीएनआईडब्ल्यूसीडी) द्वारा राज्य स्तरीय मास्टर ट्रेनर्स (एसएलएमटी) को प्रशिक्षित किया जाता है। ये मास्टर ट्रेनर्स, बदले में, जमीनी स्तर पर आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं (एडब्ल्यूडब्ल्यू) को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं, जिससे बड़े पैमाने पर और एकसमान क्षमता विकास सुनिश्चित होता है। 16 मार्च 2026 तक, प्रशिक्षण कार्यक्रम के पहले चरण के तहत कुल 41,645 एसएलएमटी और 10,35,949 एडब्ल्यूडब्ल्यू को प्रशिक्षित किया जा चुका है, जबकि दूसरे चरण के तहत 3,641 एसएलएमटी को प्रशिक्षित किया गया है।

मिशन पोषण 2.0 के तहत की जाने वाली अन्य प्रमुख गतिविधियों में सामुदायिक एकजुटता  और जागरूकता अभियान शामिल हैं, जिनका उद्देश्य लोगों को पोषण संबंधी पहलुओं के बारे में शिक्षित करना है, क्योंकि अच्छे पोषण की आदतों को अपनाने के लिए व्यवहारगत बदलाव  हेतु निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होती है। राज्य और केन्द्र-शासित प्रदेश सितंबर और मार्च-अप्रैल में मनाए जाने वाले पोषण माह और पोषण पखवाड़े के दौरान जन आंदोलन के तहत  नियमित रूप से जागरूकता अभियान चला रहे हैं और उनकी रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं। आंगनवाड़ी केन्द्रों में आयोजित समुदाय आधारित कार्यक्रम (सीबीई) पोषण संबंधी आदतों में बदलाव लाने में एक महत्वपूर्ण रणनीति साबित हुए हैं और सभी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को हर महीने दो समुदाय आधारित कार्यक्रम आयोजित करना अनिवार्य है। देश भर में 15 जन आंदोलनों के जरिए 2018 से अब तक 150 करोड़ से अधिक जन आंदोलन गतिविधियां आयोजित की जा चुकी हैं। समुदाय आधारित कार्यक्रम (सीबीई) पोषण संबंधी आदतों में बदलाव लाने में एक महत्वपूर्ण रणनीति साबित हुए हैं। सभी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को हर महीने दो समुदाय आधारित कार्यक्रम आयोजित करना अनिवार्य है। 2018 से फरवरी 2026 तक कुल 9.8 करोड़ समुदाय आधारित कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने पूरक पोषण के वितरण में पारदर्शिता, दक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु गुणवत्ता संबंधी आश्वासन, कर्तव्य धारकों की भूमिका एवं जिम्मेदारियों, खरीद प्रक्रियाओं, आयुष से जुड़ी अवधारणाओं के एकीकरण और पोषण ट्रैकर के जरिए डेटा प्रबंधन एवं निगरानी के बारे में सरलीकरण संबंधी दिशानिर्देश जारी किए हैं।

इसके अलावा, नीति आयोग द्वारा 2020 में और मिशन पोषण 2.0 के लिए 2025 में किए गए पोषण अभियान के तृतीय-पक्ष मूल्यांकन और प्रभाव आकलन में देश में कुपोषण से निपटने में इसकी प्रासंगिकता संतोषजनक पाई गई है।

डीएवाई-एनआरएलएम के तहत स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को समूहों में संगठित करना है ताकि वे बचत को प्रोत्साहित कर सकें और आजीविका के अनेक अवसर अपनाकर घरेलू आय बढ़ा सकें, जिससे ग्रामीण गरीबी कम हो सके। इस प्रकार, एसएचजी सीधे तौर पर बच्चों के कल्याण के लिए काम नहीं कर रहे हैं। देश भर में 34 राज्यों और केन्द्र-शासित प्रदेशों (दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़कर) में 90.91 लाख एसएचजी हैं।

स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए, ग्रामीण विकास मंत्रालय, डीएवाई-एनआरएलएम के तहत एसएचजी परिवारों के बीच पोषण, स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में जागरूकता गतिविधियां चला रहा है। इन गतिविधियों में समूह बैठकें, सामुदायिक कार्यक्रम और सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण एवं स्वच्छता सेवाओं के लिए संसाधन जुटाना शामिल है। इन गतिविधियों का उद्देश्य स्वास्थ्य पर जेब से होने वाले खर्च को कम करना और जीवन की गुणवत्ता में सुधार करना है। संबंधित मंत्रालयों द्वारा जारी प्रशिक्षण सामग्री को एसएचजी के संदर्भ में अनुकूलित किया गया है और समूह बैठकों में चर्चा के लिए इसका उपयोग किया जा रहा है। एसएचजी नेटवर्क विभिन्न राष्ट्रीय पोषण, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता अभियानों में भी सहयोग कर रहा है। मेजबान मंत्रालय द्वारा साझा की गई आईईसी शिक्षा सामग्री को एसएचजी समूहों में वितरित किया जाता है। इसके अलावा, शिक्षण सामग्री तक आसान पहुंच के लिए एक ऑनलाइन शिक्षण तंत्र और प्रगति पर नजर रखने के लिए एक ऑनलाइन निगरानी प्रणाली विकसित करने की योजना है।

स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के लिए, ग्रामीण विकास मंत्रालय ‘लखपति’ पहल, बैंक लिंकेज  और सामुदायिक निधियों पर ध्यान केन्द्रित कर रहा है ताकि एसएचजी से जुड़ी महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जा सके। पोषण, स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में जागरूकता के लिए, गुणवत्ता मानकों को मजबूत करने और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने हेतु  ऑनलाइन शिक्षण और निगरानी प्रणालियों की योजना बनाई जा रही है।

यह जानकारी महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी।  

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