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सोशल वेलफेयर

पॉक्सो कानून, 2012 बच्चों को ऑनलाइन यौन शोषण सहित यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है

March 26, 2026 04:02 PM

सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 और आईटी नियम, 2021 मिलकर बच्चों के खिलाफ ऑनलाइन यौन अपराधों से निपटने के लिए एक कठोर ढांचा तैयार करते हैं

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने ऑनलाइन बाल शोषण पर दिशानिर्देश और जागरूकता सामग्री जारी की है

बच्चों से संबंधित अपराधों के डेटा का रखरखाव नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्‍यूरो (एनसीआरबी) करता है। इसे यहां देखा जा सकता है: https://www.ncrb.gov.in/crime-in-india.html

बच्‍चों के प्रति यौन अपराधों से संरक्षण कानून (पॉक्‍सो) 2012 ऑनलाइन यौन शोषण सहित बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करता है :

  1. धारा 11 में परिभाषित बच्चे के यौन उत्पीड़न को धारा 12 दंडित करती है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक या ऑनलाइन माध्यमों के जरिए किए गए कृत्य भी शामिल हैं, जैसे यौन संकेत वाली टिप्पणियाँ करना, अश्लील सामग्री दिखाना, या यौन उत्‍पीड़न के इरादे से बच्चे से बार-बार संपर्क करना।
  2. धारा 13, किसी भी प्रकार के मीडिया—चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक, मुद्रित या प्रसारण माध्यम हो—में यौन संतुष्टि के उद्देश्य से बच्चे के उपयोग को अपराध घोषित करती है।
  3. धारा 14, पहली बार अपराध के लिए कम से कम पाँच वर्ष के कारावास और जुर्माने का प्रावधान करती है। पुनरावृत्ति (दोबारा दोषसिद्धि) की स्थिति में सजा बढ़ाकर कम से कम सात वर्ष का कारावास और जुर्माना कर दी जाती है।
  4. धारा 15, बच्चों से संबंधित अश्लील सामग्री को रखना, संग्रहित करना या उसकी रिपोर्ट न करने पर चरणबद्ध (ग्रेडेड) दंड प्रणाली निर्धारित करती है।

सूचना प्रौद्योगिकी कानून, 2000 और आईटी नियम, 2021 मिलकर बच्चों के खिलाफ ऑनलाइन यौन अपराधों से निपटने के लिए एक सख्त ढांचा तैयार करते हैं। कानून की धाराएँ 67, 67A और 67B अश्लील या यौन स्पष्ट सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण के लिए दंड का प्रावधान करती हैं। यह कानून पुलिस को अपराधों की जांच करने (धारा 78), सार्वजनिक स्थान में प्रवेश करने तथा संदिग्ध व्यक्ति की तलाशी लेने और उसे गिरफ्तार करने (धारा 80) का अधिकार भी प्रदान करता है।

भारतीय न्याय संहिता, 2023 ऑनलाइन बाल यौन शोषण से संबंधित अपराधों से निपटने के लिए कानूनी ढांचे को और मजबूत करती है। धारा 294 अश्लील सामग्री की बिक्री, वितरण, सार्वजनिक प्रदर्शन या प्रसार (जिसमें इलेक्ट्रॉनिक रूप भी शामिल है) को अपराध घोषित करती है, जबकि धारा 295 विशेष रूप से बच्चों को अश्लील सामग्री की बिक्री, वितरण या प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाती है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने ऑनलाइन बाल शोषण के संबंध में दिशानिर्देश और जागरूकता सामग्री भी जारी की है, जिनमें मैनुअल फॉर सेफ्टी एंड सिक्‍यूरिटी ऑफ चिल्‍ड्रन इन स्‍कूल्‍स के अंतर्गत बीइंग सेफ ऑनलाइन, गाइडलाइंस ऑन साइबर सेफ्टी फॉर स्‍कूल्‍स (स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और संरक्षा हेतु मैनुअल का हिस्सा), तथा साइबर अपराध के बाल पीड़ित – विधिक टूलकिट शामिल हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 (“आईटी नियम, 2021”) के नियम 3(2)(बी) के अंतर्गत, मध्यस्थ को इस उप-नियम के तहत किसी व्यक्ति या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा की गई शिकायत प्राप्त होने के 2 घंटे के भीतर, ऐसे किसी भी कंटेंट के संबंध में—जो प्रथम दृष्टया उस व्यक्ति के निजी अंगों को प्रदर्शित करता हो, उसे पूर्ण या आंशिक नग्नता में दिखाता हो, या किसी यौन क्रिया या आचरण में दर्शाता हो, अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रतिरूपण (इम्पर्सोनेशन) का स्वरूप रखता हो, जिसमें कृत्रिम रूप से परिवर्तित (मॉर्फ्ड) चित्र भी शामिल हैं—अपने द्वारा होस्ट, संग्रहित, प्रकाशित या प्रसारित ऐसे कंटेंट को हटाने या उस तक पहुंच को निष्क्रिय करने के लिए सभी यथोचित और व्यावहारिक उपाय करने होंगे।

केन्‍द्र सरकार ने 20 फरवरी, 2026 से प्रभावी संशोधनों के माध्यम से आईटी नियम, 2021 के तहत सुरक्षा उपायों को और सुदृढ़ किया है। ये संशोधन कृत्रिम रूप से उत्पन्न जानकारी (डीपफेक) से उत्पन्न जोखिमों का निराकरण करते हैं, जिनमें बाल यौन शोषण और दुरुपयोग सामग्री (सीएसईएएम), बिना सहमति के अंतरंग चित्र (एनसीआईआई), तथा अन्य अश्लील या गोपनीयता का उल्लंघन करने वाली सामग्री, जिसमें पहचान या घटनाओं की गलत प्रस्तुति भी शामिल है। इसके अतिरिक्त, नियम 3(2)(बी) के तहत ऐसी सामग्री को हटाने की समय-सीमा को 24 घंटे से घटाकर 2 घंटे कर दिया गया है, ताकि मध्यस्थों द्वारा अधिक तेज और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (डीपीडीपी) कानून, 2023 व्यक्तिगत डेटा, जिसमें बच्चों का डेटा भी शामिल है, के संरक्षण का प्रावधान करता है, साथ ही कानून के अनुसार डेटा के प्रसंस्करण की अनुमति देता है और प्रवर्तन उद्देश्यों के लिए अधिकृत सरकारी एजेंसियों को वैध पहुंच प्रदान करता है।

न्याय विभाग वर्ष 2019 से फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स (एफटीएससी) योजना लागू कर रहा है, जिसके तहत त्वरित सुनवाई और निपटान के लिए फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स, जिनमें विशेष रूप से पॉक्‍सो न्यायालय भी शामिल हैं, स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि बलात्कार और पॉक्‍सो कानून, 2012 के तहत बाल यौन शोषण के मामलों का शीघ्र निपटान हो सके। 31.12.2025 तक, 774 कार्यरत एफटीएससी हैं, जिनमें 398 ई-पॉक्‍सो न्यायालय शामिल हैं। इस योजना की शुरुआत से अब तक, ई-पॉक्‍सो न्यायालयों द्वारा 2,35,723 बाल शोषण मामलों का निपटान किया जा चुका है।

यह जानकारी महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने राज्‍य सभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी।

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