कानपुर में सामने आए सनसनीखेज मामले के बाद अब मेरठ में सक्रिय एक बड़े किडनी रैकेट का खुलासा हुआ है, जिसने स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है। जांच एजेंसियों की शुरुआती पड़ताल में यह सामने आया है कि यह अवैध नेटवर्क केवल बड़े निजी अस्पतालों तक सीमित नहीं था, बल्कि झोलाछाप डॉक्टरों और बिचौलियों तक गहराई से फैला हुआ था।
सूत्रों के अनुसार, कानपुर में पकड़े गए आरोपियों से मिली जानकारी के आधार पर मेरठ में छापेमारी की गई, जहां कई संदिग्ध गतिविधियों के सुराग मिले। इस गिरोह का तरीका बेहद सुनियोजित बताया जा रहा है। गरीब और जरूरतमंद लोगों को बहला-फुसलाकर या पैसों का लालच देकर किडनी निकालने के लिए तैयार किया जाता था। इसके बाद फर्जी दस्तावेज तैयार कर अवैध ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया जाता था।
जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ निजी अस्पतालों के कर्मचारी और तथाकथित डॉक्टर इस नेटवर्क में शामिल हो सकते हैं। वहीं, झोलाछाप डॉक्टरों की भूमिका मरीजों और डोनर की पहचान कराने में अहम मानी जा रही है। यह पूरा सिंडिकेट लंबे समय से सक्रिय था और हर ट्रांसप्लांट के बदले मोटी रकम वसूली जाती थी।
प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच तेज कर दी है। स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम लगातार छापेमारी कर रही है और संदिग्ध लोगों से पूछताछ की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि इस पूरे नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए सख्त कार्रवाई की जाएगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
इस घटना ने एक बार फिर अवैध अंग तस्करी के खतरनाक नेटवर्क की ओर ध्यान खींचा है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए स्वास्थ्य संस्थानों की निगरानी और कड़े नियमों का पालन बेहद जरूरी है।
फिलहाल, जांच एजेंसियां इस रैकेट से जुड़े अन्य लोगों की तलाश में जुटी हैं और उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और बड़े खुलासे हो सकते हैं।