भूपिंद्र शर्मा, चंडीगढ़: दिल्ली की सियासत में जो जगह दशकों तक असहमति की पहचान रही, वही अब सवालों के घेरे में है। मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर छिड़े विवाद के बीच दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को धरना-प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचना-मुक्त करने की बात कही है। उसकी जगह रामलीला ग्राउंड, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन स्थल के रूप में तय किया गया है। साथ ही एक नई मानक संचालन प्रक्रिया जल्द आने की बात भी कही गई है। सवाल सीधा है: यह कदम व्यवस्था सुधारने की कवायद है या लोकतांत्रिक आवाज़ को शहर के किनारे धकेलने की तैयारी?
पहले इस फैसले की पृष्ठभूमि समझ लेना ज़रूरी है। जंतर-मंतर संसद भवन से चंद कदम की दूरी पर है। यहां का प्रदर्शन स्थल असल में ऐतिहासिक वेधशाला के सामने की सड़क है, जिसने किसान, मज़दूर, छात्र, खिलाड़ी और आम नागरिक, सबको अपनी बात कहने का मंच दिया है। ख़बरों के मुताबिक 2003 में दिल्ली पुलिस ने स्थायी आदेश के जरिए जंतर-मंतर और रामलीला मैदान को रैलियों, जुलूसों और प्रदर्शनों के लिए चिह्नित किया था। यानी यह जगह अपने आप नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवहार और आदेशों से धीरे-धीरे प्रदर्शन का केंद्र बनी। विवाद भी नया नहीं है। 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने ध्वनि प्रदूषण, यातायात जाम और आवासीय इलाके का हवाला देते हुए यहां प्रदर्शन रोकने का निर्देश दिया था। फिर भी जंतर-मंतर की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई। हाल के महीनों में अदालतों की टिप्पणियों ने बहस को और गरमाया। 8 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से रामलीला मैदान को प्रमुख प्रदर्शन स्थल के रूप में मान्यता देने को कहा, और उसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी जंतर-मंतर के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। यानी दीवार पर लिखावट पहले से दिख रही थी। अब बात उस संदर्भ की जिसमें यह कदम सुर्खियों में आया है। मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर उठा विवाद चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता और जवाबदेही पर बहस का हिस्सा है, और ऐसे दौर में विपक्ष, नागरिक संगठन और आंदोलनकारी सड़क पर उतरने की तैयारी करते ही हैं। ऐसे समय में प्रदर्शन के पते का बदल जाना महज़ संयोग है या सोची-समझी रणनीति, यह सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि फैसले के पीछे विवाद ही एकमात्र कारण है। पुलिस का पक्ष यही हो सकता है कि भीड़ प्रबंधन, सुरक्षा और यातायात के लिहाज़ से बड़े और खुले मैदान ज़्यादा उपयुक्त हैं। और इस तर्क में दम भी है। जंतर-मंतर की सड़क संकरी है, संसद और संवेदनशील दफ्तरों के क़रीब है, और भारी भीड़ के लिए सुरक्षित नहीं मानी जाती। दिल्ली पुलिस की मौजूदा मानक संचालन प्रक्रिया के तहत यहां अधिकतम एक हज़ार लोगों को अनुमति दी जाती है। इसके मुक़ाबले रामलीला ग्राउंड और बुराड़ी जैसे मैदान कहीं ज़्यादा जगह, पार्किंग और सुरक्षा इंतज़ाम देते हैं। पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड भी उस इलाके के लोगों के लिए नया विकल्प बन सकता है। लेकिन नाण्य का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। प्रदर्शन की ताक़त सिर्फ़ भीड़ में नहीं, उसकी दृश्यता में होती है। जब कोई आंदोलनकारी संसद और सत्ता के गलियारों के सामने बैठता है, तो उसकी आवाज़ सीधे नीति-निर्माताओं और मीडिया के कैमरों तक पहुंचती है। बुराड़ी जैसी दूरस्थ जगह पर वही आवाज़ अक्सर सन्नाटे में बदल सकती है। आलोचकों का तर्क होगा कि सुरक्षा और सुविधा के नाम पर प्रदर्शन को शहर की परिधि में भेजना, असल में उसका असर कम करना है। एक और चिंता खर्च और पहुंच की है। छोटे समूहों, मज़दूरों और ग्रामीण प्रदर्शनकारियों के लिए दूर के मैदान तक पहुंचना और वहां व्यवस्था करना आसान नहीं होता। यहीं पर आने वाली नई मानक संचालन प्रक्रिया की भूमिका निर्णायक हो जाती है। अगर उसमें अनुमति की प्रक्रिया सरल, समयबद्ध और पारदर्शी रही, मैदानों के इस्तेमाल पर बेवजह शुल्क या शर्तें नहीं थोपी गईं, और संसद सत्र जैसे संवेदनशील समय में भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन का रास्ता खुला रहा, तो यह बदलाव व्यवस्था सुधार कहलाएगा। लेकिन अगर अनुमति के नियम कठोर, अस्पष्ट और मनमाने रहे, तो यही मानक संचालन प्रक्रिया असहमति पर अदृश्य ताले का काम कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी साफ़ कर चुका है कि प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन ज़रूरी है, न कि किसी एक का दूसरे पर पूरी तरह हावी होना। अब गेंद प्रशासन के पाले में है। जनता को यह जानने का हक़ है कि अधिसूचना-मुक्ति का कानूनी आधार क्या है, नई मानक संचालन प्रक्रिया में क्या-क्या शामिल होगा, और क्या इस पर आम नागरिकों व संगठनों से राय ली जाएगी। पारदर्शिता ही वह कसौटी है जिस पर यह फैसला खरा या खोटा साबित होगा। अंत में, लोकतंत्र में सड़क और मैदान, दोनों की अपनी जगह है। मैदान भीड़ को संभालते हैं, पर सड़कें सत्ता को सुनने पर मजबूर करती हैं। जंतर-मंतर महज़ एक पता नहीं, बल्कि असहमति के सम्मान का प्रतीक रहा है। उसे हटाना है तो इतना ज़रूर सुनिश्चित हो कि आवाज़ें दबें नहीं, सिर्फ़ जगह बदले। वरना सवाल बना रहेगा कि क्या दिल्ली अब विरोध को सुनने की जगह उसे सलीके से दूर रखने की तरफ़ बढ़ रही है।