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चंडीगढ़

डेनमार्क के पुराने फैसले ने खड़ी की मुश्किलें, अमेरिका ग्रीनलैंड में कदम रखे तो NATO दूर रहेगा

January 22, 2026 09:58 AM

ग्रीनलैंड को लेकर डेनमार्क की दशकों पुरानी नीति अब उसी के लिए बड़ी कूटनीतिक चुनौती बनती नजर आ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि करीब 50 साल पहले डेनमार्क ने ग्रीनलैंड की सुरक्षा और संप्रभुता को लेकर जो दलीलें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दी थीं, वही आज उसके लिए उलझन का कारण बन गई हैं। मौजूदा हालात में यह आशंका जताई जा रही है कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड में किसी तरह की सैन्य कार्रवाई करता है, तो नाटो (NATO) सीधे तौर पर डेनमार्क के समर्थन में खड़ा नहीं होगा।

असल में ग्रीनलैंड भले ही डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र हो, लेकिन उसकी सामरिक और भौगोलिक स्थिति उसे वैश्विक शक्तियों के लिए बेहद अहम बनाती है। आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, जलवायु परिवर्तन के कारण खुलते नए समुद्री मार्ग और प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता ने ग्रीनलैंड को अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों के लिए रणनीतिक केंद्र बना दिया है। अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी रखता है और वहां स्थित थुले एयरबेस उसकी सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा है।

विशेषज्ञों के अनुसार, 1970 के दशक में डेनमार्क ने यह तर्क दिया था कि ग्रीनलैंड पर किसी बाहरी खतरे की स्थिति में वह इसे आंतरिक मामला मानता है और नाटो की सामूहिक सुरक्षा की धाराएं स्वतः लागू नहीं होंगी। उस समय यह दलील डेनमार्क के हित में थी, लेकिन आज वही बयान उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय कानून और नाटो की संरचना के जानकारों का कहना है कि यदि अमेरिका ग्रीनलैंड को लेकर कोई एकतरफा कदम उठाता है, तो डेनमार्क के पास नाटो से सीधी सैन्य मदद मांगने का मजबूत आधार नहीं बचेगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति “कर्मों का फल” जैसी है। डेनमार्क ने दशकों तक ग्रीनलैंड को लेकर संतुलन की नीति अपनाई—एक ओर उसकी स्वायत्तता पर जोर दिया, तो दूसरी ओर सुरक्षा के मुद्दे पर अस्पष्ट रुख रखा। अब जब वैश्विक भू-राजनीति तेजी से बदल रही है, तो यही अस्पष्टता उसे कमजोर स्थिति में डाल रही है। नाटो के भीतर भी यह सवाल उठ रहा है कि क्या ग्रीनलैंड पर संभावित टकराव को अनुच्छेद-5 के तहत सामूहिक सुरक्षा का मामला माना जाएगा या नहीं।

इस पूरे परिदृश्य में ग्रीनलैंड की स्थानीय राजनीति भी अहम हो गई है। वहां की आबादी लंबे समय से अधिक स्वायत्तता और यहां तक कि स्वतंत्रता की मांग करती रही है। अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी और डेनमार्क की सीमित भूमिका ने स्थानीय नेताओं को भी नई रणनीति पर सोचने को मजबूर कर दिया है।

कुल मिलाकर, ग्रीनलैंड का मुद्दा अब सिर्फ एक क्षेत्रीय विवाद नहीं रहा, बल्कि यह नाटो, अमेरिका और डेनमार्क के रिश्तों की परीक्षा बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि डेनमार्क ने समय रहते अपनी पुरानी नीतियों की समीक्षा नहीं की, तो भविष्य में उसे और भी बड़े कूटनीतिक झटकों का सामना करना पड़ सकता है।

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