वैश्विक सुरक्षा पर चिंता का माहौल गहरा रहा है क्योंकि संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बीच लंबी अवधि से बनी परमाणु arms नियंत्रण समझौते (Nuclear Arms Control Treaty) टूटने की कगार पर है। लगभग पचास वर्षों से दोनों पूर्व महाशक्तियों के बीच परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने वाले समझौते रहे हैं, लेकिन अब के हालात यह संकेत दे रहे हैं कि यह व्यवस्था समाप्त होने के करीब है, जिससे वैश्विक रणनीतिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
समझौते का ऐतिहासिक महत्व
शीत युुद्ध के समय से ही रूस (तब सोवियत संघ) और अमेरिका के बीच परमाणु हथियारों को नियंत्रित करने और उनके प्रसार को रोकने के लिए विभिन्न संधियाँ बनाई गईं। इन समझौतों ने दोनों देशों को अपने परमाणु हथियारों के भंडार को सीमित करने, परीक्षणों पर रोक लगाने, और पारदर्शिता तथा जांच-पड़ताल के जरिए विश्वास का वातावरण बनाए रखने में मदद की। इन अभियानों में SALT, START, New START जैसे प्रमुख समझौते शामिल रहे हैं।
इन समझौतों ने वैश्विक स्तर पर तनाव को रोकने में मदद की और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से परमाणु विनाश के खतरों को नियंत्रित करने का एक ढांचा तैयार किया। खासकर New START (Strategic Arms Reduction Treaty) को दोनों देशों के बीच भरोसेमंद हथियार नियंत्रण व्यवस्था माना जाता रहा है। इसके तहत सीमित संख्या में सशस्त्र मिसाइलों, बॉलिस्टिक मिसाइलों और बम वाहक विमानों पर नियंत्रण रखा जाता था।
समझौते के ख़त्म होने का संकट
अब New START या उससे जुड़ी नई arms नियंत्रण व्यवस्था का समय समाप्त होने वाला है, और रूस तथा अमेरिका के बीच नई संधि पर सहमति नहीं बन पा रही है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक असहमति, सुरक्षा चिंताएँ, और दूसरे मौजूदा संघर्षों ने बातचीत को पत्थर पर पिला दिया है।
विश्लेषकों के अनुसार, arms नियंत्रण समझौते के खत्म होने का मतलब यह है कि दोनों महाशक्तियाँ बिना किसी बाधा के परमाणु क्षमता बढ़ा सकती हैं, विशेष रूप से नई तकनीकों जैसे हाइपरसोनिक मिसाइलें, क्रूज़ मिसाइलें, उन्नत ICBM (Intercontinental Ballistic Missiles) आदि के विकास में और तेजी ला सकती हैं। इससे न केवल अमेरिका और रूस के बीच तनाव बढ़ेगा, बल्कि दुनिया भर के लिए परमाणु हथियारों के नियंत्रण का ढांचा कमजोर पड़ेगा।
वैश्विक प्रभाव और दूसरे देशों की भूमिका
arms नियंत्रण समझौते का पतन सिर्फ रूस-अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। इससे चीन, भारत, पाकिस्तान जैसे अन्य परमाणु शक्तियाँ भी रणनीतिक निर्णयों पर असर महसूस करेंगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि रूस और अमेरिका के बीच कोई नियंत्रक व्यवस्था नहीं बचती, तो यह एक वैश्विक arms-race (हथियार होड़) की शुरुआत का संकेत भी बन सकता है। हथियार नियंत्रण की कमी के कारण विश्व भर के देशों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है और सुरक्षा संकट गहरा सकता है।
रणनीतिक संतुलन और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा
arms नियंत्रण समझौतों का उद्देश्य केवल हथियारों की संख्या को सीमित करना नहीं था, बल्कि महाशक्तियों के बीच पारदर्शिता बढ़ाना और गलती या मिस-कैलीकुलेशन के कारण विवाद की स्थिति से बचना भी था। यदि अब यह व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है, तो छोटे विवाद भी बड़े सैन्य टकराव में बदलने का जोखिम बढ़ जाएगा।
विश्लेषकों ने कहा है कि विश्व समुदाय को इस खतरे को समझते हुए संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मंचों, और बहुपक्षीय वार्ताओं के जरिए नई arms नियंत्रण व्यवस्था पर कार्य करना चाहिए, ताकि परमाणु युद्ध जैसी भयावह स्थिति को रोका जा सके।
निष्कर्ष (Conclusion)
आज जब दुनिया परमाणु हथियारों के प्रसार और उनकी उन्नत तकनीकों के दौर में है, तब रूस-अमेरिका arms नियंत्रण समझौते का टूटना एक गंभीर चेतावनी है। यह न केवल वैश्विक सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है, बल्कि भविष्य में स्थिरता बनाए रखने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।