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यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 को सरकार द्वारा बच्चों को यौन शोषण एवं यौन अपराधों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था

February 07, 2026 09:57 AM

विभिन्न कानूनों में सहमति की आयु को अठारह वर्ष निर्धारित करने में एकरूपता का उद्देश्य नाबालिगों के साथ किसी भी प्रकार के छल, दबाव तथा शोषण को रोकना है 

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम, 2012 को भारत सरकार द्वारा बच्चों को यौन शोषण एवं यौन अपराधों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। यह अधिनियम 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक व्यक्ति को बालक के रूप में स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है तथा अपराध की गंभीरता के अनुरूप चरणबद्ध दंड का प्रावधान करता है। इसके पश्चात, अपराधियों को निवारक प्रभाव उत्पन्न करने तथा ऐसे अपराधों की रोकथाम के उद्देश्य से, वर्ष 2019 में इस अधिनियम में संशोधन किया गया, जिसके अंतर्गत बच्चों के विरुद्ध कुछ गंभीर यौन अपराधों के लिए मृत्युदंड सहित अधिक कठोर दंडात्मक प्रावधान जोड़े गए।

पोक्सो अधिनियम में ‘सहमति’ शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, तथा वैधानिक ढांचे के अंतर्गत अठारह वर्ष से कम आयु के व्यक्ति से संबंधित कोई भी यौन कृत्य, कथित रूप से सहमति दी गई हो या नहीं, अपराध माना जाता है। इसके अतिरिक्त, अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन को सुदृढ़ करने तथा बाल-अनुकूल प्रक्रियाओं एवं संस्थागत संरक्षण उपायों के माध्यम से बच्चों को यौन शोषण, दुराचार एवं हिंसा से बेहतर संरक्षण सुनिश्चित करने के उद्देश्य से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा पोक्सो नियम, 2020 अधिसूचित किए गए हैं।

सहमति की आयु को अठारह वर्ष पर बनाए रखने का विधायी निर्णय एक सुविचारित एवं सचेत नीतिगत निर्धारण है। विधिक ढांचे में संगति एवं सामंजस्य बनाए रखने के उद्देश्य से विभिन्न विधानों में वयस्कता की आयु को समान रूप से अठारह वर्ष निर्धारित किया गया है, जिनमें, अन्य के साथ-साथ, भारतीय न्याय संहिता, 2023; यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012; बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006; हिंदू दत्तक एवं भरण-पोषण अधिनियम, 1956; किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015; तथा हिंदू अप्राप्तवयता एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 सम्मिलित हैं। उपर्युक्त विधानों के आधारभूत विधायी आशय से यह स्थापित स्थिति परिलक्षित होती है कि अठारह वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को सूचित सहमति प्रदान करने अथवा ऐसे निर्णय लेने में सक्षम नहीं माना जाता, जिनके दीर्घकालिक परिणामों को वे पूर्णतः समझने में असमर्थ हो सकते हैं।

विभिन्न कानूनों में सहमति की आयु को अठारह वर्ष निर्धारित करने में एकरूपता का उद्देश्य नाबालिगों के साथ छल, दबाव एवं शोषण को रोकना है, यह स्वीकार करते हुए कि बच्चे यौन गतिविधियों से संबंधित मामलों में सार्थक एवं सूचित सहमति प्रदान करने हेतु विधिक एवं मनोवैज्ञानिक क्षमता से युक्त नहीं होते हैं। पोक्सो अधिनियम, 2012 तथा अन्य बाल-केंद्रित विधानों के अंतर्गत ‘बालक’ की परिभाषा भी संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (यूएनसीआरसी) के अंतर्गत भारत के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों, विशेष रूप से उसके अनुच्छेद 1, के अनुरूप है।

सहमति की आयु में किसी भी प्रकार की शिथिलता या अपवादों की व्यवस्था बच्चों की सुरक्षा को कमजोर करेगी, शोषण के जोखिम को बढ़ाएगी तथा विशेष रूप से किशोरियों सहित बच्चों के संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को क्षीण करेगी।

यह जानकारी केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी द्वारा आज लोक सभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी गई।

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