“पुलिस” और “सार्वजनिक व्यवस्था” भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य के विषय हैं। तदनुसार, अपराधों, जिसमें साइबर अपराध भी शामिल हैं, की रोकथाम, पहचान, जांच और अभियोजन की प्राथमिक जिम्मेदारी संबंधित कानून प्रवर्तन एजेंसियों (एलईए) के माध्यम से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों पर है। राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रयासों को केंद्र सरकार नीतिगत हस्तक्षेप, परामर्श, समन्वय तंत्र, कानूनी ढाँचों और क्षमता विकास के लिए वित्तीय सहायता के माध्यम से सहयोग प्रदान करती है।
सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म, जिनमें सोशल मीडिया और डेटिंग एप्लिकेशन शामिल हैं, के बढ़ते दुरुपयोग पर ध्यान दिया है, जैसे कि फर्जी प्रोफ़ाइल बनाना, पहचान के दुरुपयोग से महिलाओं का उत्पीड़न, साइबर उत्पीड़न, डीपफेक और बिना सहमति के तसवीरों को साझा करना। जबकि डिजिटल तकनीकें महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, सूचना तक पहुँच और सार्वजनिक सेवा प्रदान करने में महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती हैं, सरकार यह भी स्वीकार करती है कि उभरती तकनीकों का दुरुपयोग महिलाओं और बच्चों की गरिमा, गोपनीयता, सुरक्षा और भलाई के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न करता है।
महिला और बाल विकास मंत्रालय गृह मंत्रालय और इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के साथ निकट समन्वय में काम करता है, जिससे ऑनलाइन लिंग आधारित हिंसा, जैसे कि नकली पहचान, फर्जी प्रोफाइल का दुरुपयोग, अश्लील सामग्री का प्रसार, बिना सहमति के अंतरंग तसवीरें लेना/साझा करना (एनसीआईआई) और डीपफेक के मामलों को अंतर-मंत्रालयी परामर्श, दिशा-निर्देशों, नियामक उपायों और पीड़ित-सहायता तंत्रों के माध्यम से संबोधित किया जा सके। मिशन शक्ति के अंतर्गत, महिलाओं की सुरक्षा, संरक्षा और सशक्तिकरण को मजबूत करने के लिए समग्र एवं पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिसमें प्रौद्योगिकी-जनित अपराधों से सुरक्षा भी शामिल है। साइबर उत्पीड़न या ऑनलाइन प्रताड़ना से प्रभावित महिलाओं को पूरे देश में स्थापित वन स्टॉप सेंटर (ओएससी) के माध्यम से कानूनी सहायता, परामर्श और अपराधों की रिपोर्टिंग की सुविधा सहित समेकित सेवाओं तक पहुँच प्रदान की जाती है। निर्भया फंड के तहत, सरकार ने महिलाओं और बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध रोकथाम (सीसीपीडब्ल्यूसी) योजना लागू की है। इसके लिए एक साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल www.cybercrime.gov.in स्थापित किया गया है। इसके अतिरिक्त, साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 भी कार्यरत है। इसके अलावा, गृह मंत्रालय सोशल मीडिया और अन्य मीडिया चैनलों के माध्यम से, रिपोर्टिंग सहित, विभिन्न प्रकार के साइबर अपराधों और उपलब्ध शिकायत निवारण तंत्रों के बारे में निरंतर जागरूकता बढ़ाता रहता है।
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 साइबर अपराधों से निपटने के लिए एक व्यापक वैधानिक ढांचा प्रदान करता है। धारा 66 को धारा 43 के विस्तार के रूप में पढ़ने पर अनधिकृत एक्सेस और कंप्यूटर से संबंधित अपराधों के लिए दंड निर्धारित किया गया है; धारा 66C पहचान की चोरी के लिए; धारा 66D कंप्यूटर संसाधनों का उपयोग करके नकली पहचान के माध्यम से धोखाधड़ी, जिसमें फर्जी प्रोफाइल बनाना और उपयोग करना शामिल है, के लिए; धारा 66E गोपनीयता का उल्लंघन, जिसमें बिना सहमति के अंतरंग तसवीरें लेना/साझा करना शामिल है, के लिए; धारा 67, 67A और 67B अश्लील, कामुक और बाल यौन शोषण तथा उत्पीड़न से संबंधित सामग्री को प्रकाशित या प्रसारित करने के लिए; और धारा 69A अवैध सामग्री को अवरुद्ध करने के लिए लागू है। धारा 78 और 80 कानून प्रवर्तन एजेंसियों को साइबर अपराधों की जांच करने और तलाशी तथा गिरफ्तारी करने का अधिकार देती हैं। यह अधिनियम प्रौद्योगिकी-निरपेक्ष है और सभी कंप्यूटर संसाधनों पर समान रूप से लागू होता है, जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता या अन्य उभरती तकनीकों का उपयोग करने वाले संसाधन भी शामिल हैं, और इसमें उपयोगकर्ता-निर्मित सामग्री और मशीन-निर्मित सामग्री में कोई भेद नहीं किया गया है।
इसके अतिरिक्त, सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया नैतिकता संहिता) नियम, 2021, जिसे 2022, 2023 और 2025 में संशोधित किया गया, मध्यस्थों को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत सावधानीपूर्वक यथोचित जांच (ड्यू डिलिजेंस) करने का निर्देश देते हैं। नियम 3(1)(b) गैरकानूनी सामग्री की होस्टिंग या प्रसारण पर रोक लगाता है, जिसमें नकली पहचान, गोपनीयता का उल्लंघन, अश्लील या कामुक सामग्री, लिंग के आधार पर अपमान या उत्पीड़न करने वाली सामग्री और बच्चों के लिए हानिकारक सामग्री शामिल हैं। नियम 3(2)(b) रिपोर्टिंग के लिए स्पष्ट पीड़ित-केंद्रित प्रोटोकॉल प्रदान करता है और शिकायत प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर नग्नता, नकली पहचान या एनसीआईआई को दर्शाने वाली सामग्री को हटाने या इसकी एक्सेस को अक्षम करने का आदेश देता है। नियमों के तहत शिकायत निवारक अधिकारी की नियुक्ति, समयबद्ध शिकायत निवारण, नियमित उपयोगकर्ता जागरूकता और शिकायत अपीलीय समितियों (जीएसी) के माध्यम से अपीलीय तंत्र की व्यवस्था अनिवार्य है। नियमों का पालन न करने पर सूचना-प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत सेफ़ हार्बर सुरक्षा समाप्त हो जाती है और कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
जनरेटिव कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों और कृत्रिम रूप से सृजित सूचनाओं, जिनमें डीपफेक भी शामिल हैं, के बढ़ते दुरुपयोग को देखते हुए, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मध्यस्थों की यथोचित जांच को और सुदृढ़ करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के संशोधन तैयार किए हैं।
अक्टूबर 2025 में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के नियम 3(2)(b) के तहत मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की, जिसका उद्देश्य एनसीआईआई सामग्री के प्रसार को रोकना है। यह एसओपी एक पीड़ित-केंद्रित प्रोटोकॉल प्रदान करती है, जिसमें वन स्टॉप सेंटर (ओएससी), मध्यस्थों की शिकायत निवारण व्यवस्थाएँ, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और कानून प्रवर्तन एजेंसियों सहित कई रिपोर्टिंग माध्यम शामिल हैं; शिकायत प्राप्त होने के 24 घंटे के भीतर ऐसी सामग्री को हटाने या उसकी एक्सेस को अक्षम करने का प्रावधान करती है; इसके री-अपलोड या रीसर्फेस होने को रोकने के लिए क्रॉलर-बेस्ड और हैश-मैचिंग प्रौद्योगिकियों की तैनाती अनिवार्य करती है; तथा सर्च इंजनों द्वारा डी-इंडेक्सिंग और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के साथ सहयोग सहित समन्वित कार्रवाई का प्रावधान करती है।
सरकार ने 2023–2025 की अवधि के दौरान मध्यस्थों को दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं, जिनमें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के तहत निहित वैधानिक दायित्वों की पुनः पुष्टि की गई है, जिससे नकली पहचान, डीपफेक, एनसीआईआई और अन्य गैरकानूनी सामग्री की होस्टिंग, प्रकाशन या प्रसार को रोका जा सके। इन दिशा-निर्देशों में यथोचित जांच संबंधी आवश्यकताओं का सख़्ती से पालन, न्यायालय के आदेशों और विधिसम्मत सरकारी निर्देशों का त्वरित अनुपालन, प्रौद्योगिकी-आधारित सक्रिय उपायों की तैनाती तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता, 2023 और अन्य लागू कानूनों के तहत दंडात्मक परिणामों के प्रति जागरूकता पर बल दिया गया है।
इसके अतिरिक्त, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 डिजिटल व्यक्तिगत डेटा की प्रोसैसिंग को विनियमित करने हेतु एक व्यापक, अधिकार-आधारित और प्रौद्योगिकी-निरपेक्ष ढांचा स्थापित करता है। यह अधिनियम विधिसम्मत और सहमति-आधारित डेटा प्रोसैसिंग, सुदृढ़ सुरक्षा उपायों, डेटा उल्लंघन की सूचना, डेटा संरक्षकों और डेटा प्रोसैस करने वालों की जवाबदेही, महत्वपूर्ण डेटा संरक्षकों के लिए संवर्धित दायित्वों तथा सत्यापन योग्य अभिभावकीय सहमति के माध्यम से बच्चों के लिए विशेष संरक्षण का प्रावधान करता है। यह अधिनियम व्यक्तियों को प्रवर्तनीय अधिकार भी प्रदान करता है, जिनमें डेटा की एक्सेस, सुधार, विलोपन और शिकायत निवारण शामिल हैं, जिससे गोपनीयता संरक्षण सुदृढ़ होता है और महिलाओं के ऑनलाइन व्यक्तिगत डेटा तथा पहचान के दुरुपयोग से निपटने में यह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम का पूरक बनता है।
इसके अतिरिक्त, महिलाओं और लड़कियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग, डिजिटल गोपनीयता, रिपोर्टिंग तंत्रों—जिनमें राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और मध्यस्थों की शिकायत निवारण प्रणालियाँ शामिल हैं—तथा साइबर कानूनों के अंतर्गत उपलब्ध कानूनी उपायों के बारे में जागरूक करने के लिए मिशन शक्ति, वन स्टॉप सेंटर, डिजिटल अभियानों, कार्यशालाओं के ज़रिए और राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के साथ समन्वय के माध्यम से निरंतर जागरूकता और जनसंपर्क कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं।
समग्र रूप से देखें तो, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000, सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021, दिशा-निर्देश, एनसीआईआई के लिए मानक संचालन प्रक्रिया, कृत्रिम रूप से सृजित सामग्री से निपटने हेतु प्रस्तावित विनियामक उपाय, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023, मिशन शक्ति के अंतर्गत संस्थागत समन्वय तथा जागरूकता पहलें मिलकर एक ऐसा व्यापक और विकसित होता ढांचा निर्मित करती हैं, जो डिजिटल जगत में महिलाओं की गरिमा, गोपनीयता और सुरक्षा की रक्षा सुनिश्चित करता है, साथ ही मध्यस्थों की जवाबदेही और पीड़ितों के लिए समयबद्ध निवारण को भी सुनिश्चित करता है।
यह जानकारी आज राज्यसभा में महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री श्रीमती सवित्री ठाकुर द्वारा एक प्रश्न के उत्तर में दी गई।
****