भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में एक नया मोड़ सामने आया है। अमेरिका ने भारत से निर्यात होने वाले कई प्रमुख उत्पादों पर 18 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला किया है। इस फैसले का असर हीरे, रत्न, रेशम, वस्त्र और कुछ अन्य श्रेणियों के उत्पादों पर पड़ने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत के निर्यातकों को अल्पकालिक झटका लग सकता है, हालांकि दीर्घकाल में बाजार विविधीकरण की जरूरत और भी बढ़ जाएगी।
अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़े निर्यात बाजारों में से एक है। खासकर जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर में भारत की मजबूत पकड़ रही है। कटे और पॉलिश किए गए हीरे, सोने के आभूषण और कीमती रत्न बड़ी मात्रा में अमेरिका भेजे जाते हैं। नए टैरिफ के लागू होने से इन उत्पादों की कीमत अमेरिकी बाजार में बढ़ सकती है, जिससे मांग पर असर पड़ने की आशंका है। इससे छोटे और मध्यम स्तर के निर्यातकों की चिंता बढ़ गई है।
रेशम और वस्त्र उद्योग पर भी इस फैसले का प्रभाव दिख सकता है। भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाले हैंडलूम, सिल्क फैब्रिक और रेडीमेड गारमेंट्स अब पहले की तुलना में महंगे हो सकते हैं। उद्योग जगत का कहना है कि बढ़ी हुई लागत का बोझ या तो उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा या फिर निर्यातकों को अपने मुनाफे में कटौती करनी पड़ेगी।
इसके अलावा कुछ कृषि आधारित और हस्तशिल्प उत्पाद भी टैरिफ की जद में आ सकते हैं। कालीन, होम फर्निशिंग आइटम्स और हस्तनिर्मित वस्तुएं भारतीय निर्यात का अहम हिस्सा हैं। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कारीगर और छोटे उत्पादक जुड़े हुए हैं, जिनकी आजीविका पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत इस मुद्दे पर अमेरिका के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखे हुए है। दोनों देशों के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं में टैरिफ से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाने की संभावना है। भारत का रुख रहा है कि द्विपक्षीय व्यापार संतुलित और पारस्परिक लाभ पर आधारित होना चाहिए।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला वैश्विक व्यापार में बढ़ती संरक्षणवादी प्रवृत्तियों का संकेत भी देता है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि वह यूरोप, पश्चिम एशिया और अफ्रीका जैसे वैकल्पिक बाजारों पर ज्यादा ध्यान दे। साथ ही निर्यातकों को उत्पादों की गुणवत्ता, ब्रांडिंग और वैल्यू एडिशन पर फोकस बढ़ाने की आवश्यकता होगी।
कुल मिलाकर, 18 प्रतिशत टैरिफ का असर कुछ समय तक चुनौतीपूर्ण रह सकता है, लेकिन रणनीतिक कदमों और कूटनीतिक संवाद के जरिए भारत इस दबाव को अवसर में बदलने की कोशिश कर सकता है।