वैश्विक भू-राजनीतिक माहौल ने एक बार फिर पश्चिमी देशों — अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन समेत यूरोप — को सुरक्षा चिंताओं के घेरे में ला दिया है। अंतरराष्ट्रीय तनाव, हथियारों की दौड़ और परमाणु समझौतों के कमजोर पड़ने से तीसरे विश्वयुद्ध की आशंकाएँ सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनती जा रही हैं। हालांकि विशेषज्ञ इस खतरे को तत्काल नहीं मानते, लेकिन बदलते हालात ने चिंता का माहौल जरूर पैदा किया है।
हाल के वर्षों में बड़े शक्तिशाली देशों के बीच प्रतिस्पर्धा और टकराव ने सुरक्षा समीकरण जटिल कर दिए हैं। वैज्ञानिकों ने 2026 में ‘डूम्सडे क्लॉक’ को आधी रात से केवल 85 सेकंड दूर रखा है, जो वैश्विक विनाश के जोखिम का प्रतीक है। इसके पीछे रूस-अमेरिका-चीन जैसी परमाणु शक्तियों की आक्रामक नीतियों, युद्धों और हथियार नियंत्रण तंत्र के कमजोर होने को प्रमुख कारण माना गया है।
इसके साथ ही हथियार नियंत्रण ढाँचे के टूटने से चिंता और बढ़ी है। अमेरिका और रूस के बीच दशकों पुराना अंतिम परमाणु समझौता समाप्त होने के बाद विशेषज्ञों ने इसे “गंभीर क्षण” बताया और कहा कि परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का जोखिम कई दशकों में सबसे अधिक हो सकता है। यह स्थिति पश्चिमी देशों में रणनीतिक बहस को तेज कर रही है कि यदि संतुलन तंत्र कमजोर हुआ तो वैश्विक सुरक्षा ढाँचा अस्थिर हो सकता है।
यूरोप में भी सुरक्षा विमर्श तेज हुआ है। अमेरिकी परमाणु छतरी पर निर्भरता को लेकर अनिश्चितता के बीच जर्मनी समेत कई देशों ने वैकल्पिक प्रतिरोधक क्षमता पर चर्चा शुरू की है। फिलहाल परमाणु हथियार केवल ब्रिटेन और फ्रांस के पास हैं, लेकिन भविष्य में अन्य देशों के पास भी इन्हें विकसित करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। यह बहस दर्शाती है कि पश्चिमी जगत संभावित खतरे को लेकर गंभीर मंथन में लगा है।
दूसरी ओर, वैश्विक संघर्षों का जोखिम भी चिंता बढ़ा रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले दशक में बड़े पैमाने के युद्ध की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, और इसे लगभग 30–35 प्रतिशत तक आँका गया है। यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व तनाव और अन्य टकरावों ने यह धारणा मजबूत की है कि किसी भी बड़ी गलती या गलत आकलन से स्थिति तेजी से बिगड़ सकती है।
परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की आशंका केवल सैद्धांतिक नहीं है। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि हथियार नियंत्रण कमजोर होने और तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ने से परमाणु उपयोग का जोखिम पहले से अधिक महसूस किया जा रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष से जुड़े परमाणु संकेतों और सैन्य बयानबाजी ने भी पश्चिमी देशों में सुरक्षा चिंताओं को हवा दी है।
कुल मिलाकर, अमेरिका से लेकर ब्रिटेन और कनाडा तक तीसरे विश्वयुद्ध का डर अभी वास्तविक युद्ध की स्थिति नहीं बल्कि रणनीतिक आशंका के रूप में मौजूद है। परमाणु हथियारों का खतरा और वैश्विक तनाव इस चिंता को बढ़ा रहे हैं, लेकिन कूटनीति और प्रतिरोधक संतुलन अब भी बड़े संघर्ष को रोकने के प्रमुख साधन बने हुए हैं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि भय केवल चर्चा तक सीमित रहता है या अंतरराष्ट्रीय राजनीति नई दिशा लेती है।