भारत अपनी वायु रक्षा क्षमता को और मजबूत बनाने की दिशा में लगातार कदम बढ़ा रहा है। इसी क्रम में देश ने एक बार फिर भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाते हुए लगभग ₹10,000 करोड़ की नई समझौता प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया है। यह समझौता अत्याधुनिक S-400 वायु रक्षा प्रणाली से जुड़े अतिरिक्त उपकरणों और सेवाओं से संबंधित बताया जा रहा है, जिसे रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इससे पहले फ्रांस से लड़ाकू विमान सौदे के बाद भारत ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को बहुस्तरीय बनाने की नीति अपनाई थी। नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य सीमाओं की सुरक्षा, संभावित मिसाइल खतरों का मुकाबला और हवाई निगरानी क्षमता को उन्नत करना है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन को मजबूत करने के साथ-साथ भारतीय सैन्य ढांचे की तकनीकी क्षमता में भी सुधार लाएगा।
जानकारों के अनुसार इस प्रणाली की तैनाती से भारतीय वायु सेना की प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ेगी और दूरगामी लक्ष्यों को पहचानने व निष्क्रिय करने की क्षमता में विस्तार होगा। हालांकि इस तरह के समझौते वैश्विक राजनीति और कूटनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित करते हैं, क्योंकि पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंधों पर भी नजर बनी रहती है।
रक्षा क्षेत्र में सहयोग को आगे बढ़ाने में रूसी सरकारी एजेंसी Rosoboronexport की भूमिका अहम रही है, जो वर्षों से भारत के साथ सैन्य तकनीक और उपकरणों के आदान-प्रदान में साझेदार रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह समझौता केवल रक्षा खरीद नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी की निरंतरता का संकेत है।
विश्लेषकों के अनुसार बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और सीमाई चुनौतियों को देखते हुए नई रक्षा क्षमताओं का निर्माण आवश्यक हो गया है। इस सौदे को इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके माध्यम से भारत अपनी रक्षा तैयारियों को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप ढालने का प्रयास कर रहा है।