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हेल्थ

अंतरराष्ट्रीय बाँध सुरक्षा सम्मेलन 2026 बेंगलुरु में सफलतापूर्वक सम्‍पन्‍न हुआ

February 18, 2026 06:38 AM

बाँध सुरक्षा हेतु प्रौद्योगिकी, जवाबदेही, जोखिम-आधारित निर्णय-प्रक्रिया तथा जलवायु-सहिष्णु दृष्टिकोणों को रेखांकित किया गया

दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय बाँध सुरक्षा सम्मेलन (आईसीडीएस) 2026 - जिसका शुभारंभ 13 फरवरी 2026 को उच्च-स्तरीय उद्घाटन तथा पूर्ण अधिवेशन कार्यक्रम के साथ हुआ था और  जिसमें ऐसे तकनीकी एवं औद्योगिक सत्र आयोजित किए गए, जिन्होंने सम्मेलन की विचार-विमर्श प्रक्रिया के लिए रणनीतिक संदर्भ प्रदान किया - व्यापक चर्चा तथा ज्ञान के आदान-प्रदान के उपरांत सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

सम्मेलन के पहले दिन वरिष्ठ सरकारी नेतृत्वकर्ताओं, विनियामकों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों तथा क्षेत्र के व्यावहारिक विशेषज्ञों ने भाग लिया और भारत में बाँध सुरक्षा अधिनियम, 2021 तथा बाँध पुनर्वास एवं सुधार परियोजना (डीआरआईपी) के अंतर्गत विकसित हो रहे बाँध सुरक्षा ढाँचे पर बल दिया। विचार-विमर्श के दौरान जलवायु सहिष्णुता, समन्वित जलाशय संचालन तथा संस्थागत क्षमता विकास को देश में बाँध सुरक्षा शासन को सुदृढ़ करने हेतु महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं के रूप में रेखांकित किया गया।

सम्मेलन के दूसरे दिन गहन तकनीकी तथा औद्योगिक सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित की गई, जिनमें बाँध पुनर्वास, गाद (सेडिमेंट) प्रबंधन, जोखिम-आधारित मूल्यांकन तथा जलवायु सहिष्णुता से संबंधित वैश्विक एवं राष्ट्रीय सर्वोत्तम पद्धतियों को रेखांकित किया गया। सरकारी एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, शैक्षिक जगत तथा उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोणों तथा क्षेत्र में परीक्षित समाधानों को साझा किया, जिनका उद्देश्य पुरानी होती जल अवसंरचना की सुरक्षा तथा स्थिरता को सुदृढ़ करना है।

  1. पुराने होते बाँधों पर तकनीकी सत्र: अत्याधुनिक पुनर्वास उपाय

पद्धतियों में इस बात पर बल दिया गया कि, चूँकि अनेक बाँध अपनी अभिकल्पित आयु के निकट पहुँच रहे हैं या उसे पार कर रहे हैं, कठोर गुणवत्ता आश्वासन तथा सुदृढ़ शासन व्यवस्था द्वारा समर्थित वैज्ञानिक एवं जोखिम-आधारित पुनर्वास एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्राथमिकता बन गया है।

 

  1. जलाशयों में गाद प्रबंधन पर तकनीकी सत्र में जलाशयों में गाद को बाँध सुरक्षा तथा जल सुरक्षा के लिए एक दीर्घकालिक खतरे के रूप में रेखांकित किया गया। इस सत्र में प्रतिक्रियात्मक उपायों से आगे बढ़कर समेकित एवं निवारक गाद प्रबंधन प्रक्रियाएं अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया, जिसे जलग्रहण क्षेत्र उपचार, दूरसंवेदी प्रौद्योगिकी तथा नीति-समर्थित क्रियान्वयन द्वारा सुदृढ़ किया जा सके।

  1. सुरक्षित बाँधों हेतु जोखिम-आधारित निर्णय-निर्धारण पर तकनीकी सत्र में संरचित जोखिम रूपरेखाओं के माध्यम से बाँध सुरक्षा विनियमन तथा आपातकालीन तैयारी को सुदृढ़ करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस सत्र में रेखांकित किया गया कि सरलीकृत जोखिम परीक्षण, बाँध-विफलता आकलन उपकरण तथा जलवायु-संवेदनशील कार्यप्रणालियाँ, बड़े बाँध समूहों में प्राथमिकता निर्धारण तथा साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्धारण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।  
  1. बाँधों की जलवैज्ञानिक सुरक्षा तथा बाढ़ प्रबंधन हेतु समन्वित जलाशय संचालन पर तकनीकी सत्र में पूर्वानुमान-आधारित तथा नदी बेसिन स्तर पर समन्वित जलाशय संचालन के महत्व को रेखांकित किया गया। विचार-विमर्श में इस बात पर बल दिया गया कि बढ़ती जलवायु परिवर्तनशीलता की परिस्थितियों में बाढ़ तथा सूखे के प्रभावी प्रबंधन हेतु गतिशील नियम वक्र, रिअल टाइम डेटा शेयरिंग तथा निर्णय-सहायक प्रणालियाँ अत्यंत अनिवार्य हैं।

  1. बाँध संकट एवं विफलताओं से प्राप्त सबकों पर तकनीकी सत्र में पुनः यह पुष्टि की गई कि बाँधों में उत्पन्न संकट तथा विफलता की घटनाएँ निरंतर इस बात की आवश्यकता को इंगित करती हैं कि अभियांत्रिकीय सतर्कता, अभिकल्पना तथा निर्माण मानकों का कठोर अनुपालन, प्रभावी आपातकालीन कार्ययोजनाएँ तथा सुदृढ़ संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
  2. बाँध सुरक्षा निगरानी प्रणालियों की प्रगति पर औद्योगिक सत्र में इस बात को रेखांकित किया गया कि सत्यापित रिअल टाइम आँकड़े, डिजिटल प्लेटफॉर्म तथा उन्नत संवेदन प्रौद्योगिकियाँ बाँध सुरक्षा निगरानी को रूपांतरित कर रही हैं और अधिक विश्वसनीय तथा जोखिम-आधारित परिचालन निर्णयों को सक्षम बना रही हैं।

समापन सत्र में श्री वी. सोमन्ना, राज्य मंत्री, जल शक्ति मंत्रालय की गरिमामयी उपस्थिति देखी गई। इस अवसर पर श्री पॉल ओ’कॉनर, अध्यक्ष, डैम सेफ्टी एनएसडब्ल्यू, ऑस्ट्रेलिया; श्री थॉमस एडवर्ड ब्रायंट, जल संसाधन प्रबंधन विशेषज्ञ, विश्व बैंक; श्री सुबोध यादव, आईएएस, अतिरिक्त सचिव, जल संसाधन विभाग, जल शक्ति मंत्रालय; श्री अनुपम प्रसाद, अध्यक्ष, केंद्रीय जल आयोग; श्री प्रदीप कुमार अग्रवाल, आईएएस, संयुक्त सचिव, जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग, जल शक्ति मंत्रालय; श्री सत्यम् सुवास, अध्यक्ष, सामग्री अभियांत्रिकी विभाग, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु; और श्री कृष्णमूर्ति बी. कुलकर्णी, केईएस (ए/सी), सचिव, जल संसाधन विभाग, कर्नाटक सरकार सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

स्वागत संबोधन देते हुए श्री कुलकर्णी ने कहा कि बाँध सुरक्षा अब केवल नियमित निरीक्षण तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह एक बहुआयामी चुनौती बन गई है, जिसमें जलवायु सहिष्णुता, उभरती प्रौद्योगिकियाँ, विनियामक रूपरेखाएँ, आँकड़ा-आधारित निर्णय-प्रक्रिया, आपातकालीन तैयारी तथा संस्थागत सुदृढ़ीकरण शामिल हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि इन महत्वपूर्ण विषयों को सम्मेलन के तकनीकी सत्रों, प्रकरण अध्ययनों तथा नीतिगत विचार-विमर्श के माध्यम से प्रभावी रूप से संबोधित किया गया।

सम्मेलन की सिफारिशें प्रस्तुत करते हुए श्री सुबोध यादव ने इस बात पर बल दिया कि भारत के 85 प्रतिशत से अधिक बाँधों के मृदा-निर्मित होने के कारण, ओवरटॉपिंग से होने वाली विनाशकारी विफलताओं की रोकथाम हेतु नवोन्मेषी तथा लागत-प्रभावी आर्मरिंग समाधानों की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने भारत के बड़े बाँध समूह में त्वरित, प्रारंभिक स्तर की योजना निर्माण के समर्थन हेतु सरलीकृत बाँध-विफलता विश्लेषण तथा जोखिम आकलन उपकरणों के महत्व को भी रेखांकित किया।

उन्होंने प्रवर्तनीय आपातकालीन कार्ययोजनाओं, जन-जागरूकता तथा आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के साथ समन्वय के माध्यम से आपातकालीन तैयारी को सुदृढ़ करने पर बल दिया। उन्होंने अद्यतित आपातकालीन कार्ययोजनाओं, प्रचालन एवं अनुरक्षण (ओ एंड एम) मैनुअल, बाढ़ समतल क्षेत्र विनियमन, प्रवाह पूर्वानुमान प्रणालियों तथा बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणालियों जैसे गैर-संरचनात्मक उपायों की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने आगे बाँध पुनर्वास के लिए चरणबद्ध एवं आँकड़ा-आधारित दृष्टिकोण अपनाने, दूरसंवेदी प्रौद्योगिकी के माध्यम से जलाशयों में गाद का सतत् प्रबंधन, राजस्व-तटस्थ मॉडलों के माध्यम से गाद निकासी, तथा निकाले गए गाद के वाणिज्यिक उपयोग हेतु उद्योग की सहभागिता के साथ अनुप्रयुक्त अनुसंधान की आवश्यकता पर भी बल दिया।

अपने समापन संबोधन में श्री वी. सोमन्ना, राज्य मंत्री, जल शक्ति मंत्रालय ने भारत के बाँध सुरक्षा ढाँचे को सुदृढ़ करने में अभियंताओं, नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों तथा हितधारकों की भूमिका की सराहना की। सर एम. विश्वेश्वरैया का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि दूरदृष्टि तथा सत्यनिष्ठा से निर्देशित अभियांत्रिकी, सुरक्षित एवं सतत् राष्ट्रीय विकास के केंद्र में बनी हुई है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अपनी बाँध सुरक्षा संरचना को निरंतर सुदृढ़ किया है, जिसमें बाँध सुरक्षा अधिनियम, 2021 जवाबदेही तथा सुशासन के लिए एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में उभरा है। बाँध पुनर्वास एवं सुधार परियोजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पारदर्शी रिपोर्टिंग, रिअॅल टाइम निगरानी तथा उन्नत प्रौद्योगिकीय हस्तक्षेपों के माध्यम से सैकड़ों बाँधों को सुदृढ़ किया गया है, जिससे उनकी सहिष्णुता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

दो-दिवसीय सम्मेलन पर विचार व्यक्त करते हुए मंत्री महोदय ने बाँध सुरक्षा, जोखिम न्यूनीकरण, जलवायु सहिष्णुता तथा परिचालन उत्कृष्टता से संबंधित विचार-विमर्श को रेखांकित किया और पुनः दोहराया कि “बाँध जनविश्वास का एक प्रतीक है” तथा इसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए। उन्होंने रणनीतिक हस्तक्षेपों के माध्यम से जलाशयों में गाद प्रबंधन को प्राथमिकता दिए जाने पर भी बल दिया। आभार ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए श्री प्रदीप कुमार अग्रवाल ने आईसीडीएस 2026 को एक मूल्यवान एवं समृद्ध मंच बताया तथा कर्नाटक सरकार, विश्व बैंक, भारतीय विज्ञान संस्थान तथा सभी आयोजकों, विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों के प्रति आभार व्यक्त किया, जिनके योगदान से सम्मेलन का सफल समापन सुनिश्चित हुआ।

समापन सत्र का निष्कर्ष इस दृढ़ पुनर्पुष्टि के साथ हुआ कि आईसीडीएस 2026 के दौरान साझा किया गया ज्ञान, स्थापित की गई साझेदारियाँ तथा सुदृढ़ की गई प्रतिबद्धताएँ भारत को अधिक सुरक्षित बाँधों तथा अधिक सुदृढ़ जल भविष्य की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करेंगी।

अपने दो-दिवसीय विचार-विमर्श के समापन के साथ आईसीडीएस 2026 ने भारत के बाँध सुरक्षा पारितंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम चिह्नित किया। विचार-विमर्श ने इस बात की पुनर्पुष्टि की कि बाँध सुरक्षा केवल अभियांत्रिकीय पहलुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शासन सुधार, जलवायु सहिष्णुता, प्रौद्योगिकीय नवाचार, जोखिम-आधारित निर्णय-प्रक्रिया तथा सामुदायिक तैयारी भी शामिल है।

सम्मेलन के दौरान व्यावहारिक अंतर्दृष्टियों, वैश्विक अनुभवों तथा नीतिगत दृष्टिकोणों के आदान-प्रदान ने अधिक सुरक्षित तथा अधिक सहिष्णु जल अवसंरचना को आगे बढ़ाने हेतु स्पष्ट दिशा प्रदान की। इस प्रकार आईसीडीएस 2026 ने विकसित हो रही जलवायु तथा विकास संबंधी चुनौतियों के संदर्भ में सुदृढ़ बाँध सुरक्षा पद्धतियों तथा जलाशयों के सतत् प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए हितधारकों के बीच एक साझा प्रतिबद्धता को और मजबूत किया।

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