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संपादकीय

Time for India to re-evaluate its defense strategy वक्त आ गया है कि भारत अपनी रक्षा रणनीति का पुनर्मूल्यांकन करे

May 09, 2025 09:30 PM

 भुपेंद्र शर्मा, मुख्य संपादक , सिटी दर्पण, चंडीगढ़ 

जी हां मौजूदा हालात में यह जगजाहिर है कि भारत पाकिस्तान के साथ एक गहरे सैन्य तनाव की स्थिति से गुजर रहा है। इस टकराव की शुरुआत जम्मू-कश्मीर के पहलगाम क्षेत्र में हुए एक भीषण आतंकवादी हमले से हुई, जिसमें 26 निर्दोष नागरिकों की जान गई। इस क्रूर हमले के बाद भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में स्थित कथित आतंकवादी ढांचों को निशाना बनाया। यह घटनाक्रम भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता को उजागर करता है। बदलते सुरक्षा परिदृश्य के मद्देनज़र अब ज़रूरी हो गया है कि रक्षा नीति में व्यापक आधुनिकीकरण, आत्मनिर्भरता और संस्थागत सुधारों को प्राथमिकता दी जाए। विशेषकर रक्षा बजट में वृद्धि और अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना, देश की सामरिक ताकत को मजबूत करने की दिशा में निर्णायक पहल साबित हो सकते हैं। भारत ने बीते कुछ वर्षों में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। सरकार द्वारा जारी की गई ‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची’ ने रक्षा आयात को कम करने और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा योगदान दिया है। इस नीति ने न केवल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को सशक्त किया, बल्कि देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी नई ऊर्जा प्रदान की। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारत का घरेलू रक्षा उत्पादन ₹1.27 लाख करोड़ को पार कर गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 16.7% अधिक है। इसके साथ ही भारत के रक्षा उपकरणों में स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी 65% तक पहुँच गई है, जो ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियानों की सफलता को दर्शाता है। इसी दौरान, भारत ने रक्षा निर्यात में भी नया कीर्तिमान स्थापित किया। वर्ष 2023-24 में भारत का रक्षा निर्यात ₹21,083 करोड़ तक पहुंच गया, जो कि पिछले दशक की तुलना में लगभग 30 गुना वृद्धि है। अमेरिका, फ्रांस, फिलीपींस और आर्मेनिया जैसे देश अब भारतीय हथियारों के प्रमुख ग्राहक बन रहे हैं। केंद्र सरकार ने वर्ष 2029 तक रक्षा निर्यात को ₹50,000 करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। भारत सरकार ने ‘डिफेंस एक्सीलेंस फंड’ और ‘इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सीलेंस’ जैसी योजनाओं के माध्यम से रक्षा नवाचार को प्रोत्साहित किया है। फरवरी 2025 तक, देश में 619 स्टार्टअप 549 रक्षा-संबंधित समस्याओं पर सक्रिय अनुसंधान कर रहे हैं। यह पहल विशेषकर स्टार्टअप और एमएसएमई सेक्टर को आत्मनिर्भरता की दिशा में सशक्त बना रही है। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में बनाए गए डिफेंस कॉरिडोर ने रक्षा विनिर्माण को नई दिशा दी है। अब तक इन क्षेत्रों में ₹8,658 करोड़ का निवेश हो चुका है और कुल संभावित निवेश ₹53,439 करोड़ तक आँका गया है। इससे देश में रक्षा उत्पादन को संस्थागत आधार मिलेगा। मार्च 2025 में भारत ने 156 ‘एलसीएच प्रचंड’ हेलीकॉप्टरों की खरीद के लिए ₹62,700 करोड़ का अनुबंध किया। इसके अलावा, स्कैल्प क्रूज मिसाइल, हैमर गाइडेड बम और लोइटरिंग म्यूनिशन जैसी तकनीकें भारतीय वायुसेना का हिस्सा बनी हैं। इनका प्रभावी प्रयोग हाल ही के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में देखा गया।भारत ने इंडोनेशिया को ₹3,800 करोड़ की ब्रह्मोस मिसाइल की आपूर्ति कर, अपनी मिसाइल तकनीक की वैश्विक स्वीकार्यता भी दर्ज करवाई है।भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विक्रांत’, जो 76% स्वदेशी सामग्री से बना है, 2022 में नौसेना में शामिल हुआ। इससे भारत की ब्लू वाटर नेवी की क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि भारत ने आत्मनिर्भरता की दिशा में कई पहलें की हैं, परंतु उच्च तकनीकी हथियारों के निर्माण में देश को अब भी आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। 2023 तक रक्षा बजट का लगभग 36% हिस्सा विदेशी स्रोतों से उपकरण खरीदने में खर्च हुआ।खरीद प्रक्रियाओं में विलंब, जैसे राफेल विमानों और स्कॉर्पीन पनडुब्बियों की देरी, आधुनिकीकरण की गति को प्रभावित करते हैं। 2025-26 में घोषित ₹6.81 लाख करोड़ के रक्षा बजट में से केवल ₹1.8 लाख करोड़ आधुनिकीकरण के लिए निर्धारित किया गया है। वहीं, अनुसंधान एवं विकास के लिए मात्र 3.94% का आवंटन नवाचार के रास्ते में बाधा है। दूसरी ओर, भारत का रक्षा उत्पादन अभी भी सार्वजनिक क्षेत्र पर निर्भर है। निजी कंपनियाँ जैसे जेएसडब्ल्यू डिफेंस धीरे-धीरे उभर रही हैं, परंतु उनका कुल योगदान अभी भी 21% तक ही सीमित है। इसके चलते पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को और मजबूती देने की आवश्यकता है। 2020 में मुंबई पावर ग्रिड पर साइबर हमले ने भारत की साइबर सुरक्षा में मौजूद कमजोरियों को उजागर किया। इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर, क्वांटम तकनीक और ए आई-आधारित हथियार प्रणाली जैसे क्षेत्रों में भारत को अभी लंबा सफर तय करना है। यह भी सच है कि जम्मू-कश्मीर, मणिपुर और पूर्वोत्तर राज्यों में जारी उग्रवाद और आतंकी गतिविधियाँ रक्षा संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डालती हैं। एकीकृत थिएटर कमांड जैसी अवधारणाओं पर अमल में देरी, तीनों सेनाओं के समन्वय की समस्या को उजागर करती है। गर हम भविष्य पर गौर करें तो हमें जरूरत है रणनीति और सुधार की। भारत को एक प्रभावी और आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था के लिए निम्नलिखित क्षेत्रों में ध्यान केंद्रित करना होगा: ए आई, क्वांटम कंप्यूटिंग, स्वायत्त हथियार प्रणाली और साइबर वॉरफेयर में निवेश बढ़ाना।डिजिटल रक्षा खरीद प्रक्रिया को अपनाकर पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना।विशेषीकृत प्रशिक्षण संस्थान और स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम शुरू करना।अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारियाँ बनाना। अंत में कह सकते हैं कि भारत की उभरती रक्षा स्थिति महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों और दबावपूर्ण चुनौतियों दोनों को दर्शाती है। आतंकवाद जैसे बाहरी खतरों की तात्कालिकता और समन्वय एवं प्रौद्योगिकी में आंतरिक अंतराल साहसिक सुधारों की मांग करते हैं। त्वरित स्वदेशीकरण, सुव्यवस्थित खरीद प्रक्रिया और एकीकृत रणनीतिक योजना अब अनिवार्य हैं। भविष्य के लिये तैयार सेना को नवाचार, आत्मनिर्भरता और वैश्विक साझेदारी पर आधारित होना चाहिये।

 

 

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