पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि लोकतंत्र की मजबूती केवल मतदान के दिन से तय नहीं होती, बल्कि उससे पहले की पूरी चुनावी प्रक्रिया पर निर्भर करती है। स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला हैं। जब मतदाता सूची को लेकर शंकाएँ उत्पन्न होती हैं, तो स्वाभाविक रूप से चुनाव की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठते हैं। ऐसे संवेदनशील समय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए हस्तक्षेप करना एक दूरदर्शी और सकारात्मक संवैधानिक कदम के रूप में सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि “इलेक्टोरल रोल की शुद्धता और पवित्रता” बनाए रखना जितना आवश्यक है, उतना ही “प्रक्रिया की निष्पक्षता” सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है। मतदाता सूची किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ है। यह केवल नामों का संकलन नहीं, बल्कि नागरिकों के मताधिकार की आधिकारिक मान्यता है। यदि पात्र मतदाताओं के नाम सूची से छूट जाएँ या प्रक्रियागत खामियों के कारण वे अपने अधिकार से वंचित रह जाएँ, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा को आहत करता है। पश्चिम बंगाल में पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में नामों के जोड़े और हटाए जाने को लेकर विभिन्न पक्षों ने चिंता व्यक्त की। इन परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप इस विश्वास को मजबूत करता है कि भारतीय संविधान नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए पर्याप्त और सक्षम है। अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने की विशेष शक्ति प्रदान करता है। सामान्यतः न्यायालय प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सीमित दखल देता है, किंतु जब व्यापक जनहित और संवैधानिक मूल्यों पर प्रश्न खड़े हों, तब यह प्रावधान सक्रिय होता है। बंगाल के संदर्भ में अदालत ने यह स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया केवल तकनीकी औपचारिकता नहीं, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों का मूल आधार है। यदि इस प्रक्रिया में पारदर्शिता या निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न हो, तो न्यायपालिका का दायित्व है कि वह संतुलन स्थापित करे। इस निर्णय की विशेषता यह है कि अदालत ने शुद्धता और निष्पक्षता को एक-दूसरे के पूरक तत्व के रूप में देखा। केवल मतदाता सूची को अद्यतन कर देना पर्याप्त नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और समान अवसर प्रदान करने वाली हो। लोकतंत्र में विश्वास तभी कायम रहता है, जब नागरिकों को यह भरोसा हो कि उनका नाम सूची में सुरक्षित है और किसी प्रशासनिक चूक के कारण उनका अधिकार प्रभावित नहीं होगा। चुनाव आयोग की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में केंद्रीय है। एक संवैधानिक संस्था के रूप में आयोग का दायित्व है कि वह चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को इस रूप में देखा जाना चाहिए कि वे चुनावी तंत्र को और अधिक सुदृढ़ बनाने की दिशा में सहायक हैं। यह किसी संस्था की आलोचना नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और अधिक विश्वसनीय बनाने का प्रयास है। पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से सक्रिय और प्रतिस्पर्धी राज्य में मतदाता सूची को लेकर विवाद होना असामान्य नहीं है। किंतु जब मताधिकार का प्रश्न सामने आता है, तो संवैधानिक संरक्षण सर्वोपरि हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि किसी भी नागरिक का नाम केवल प्रक्रियागत कमी के कारण सूची से बाहर न रहे। यह कदम लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत को मजबूत करता है और नागरिकों को यह संदेश देता है कि न्यायपालिका उनके अधिकारों की संरक्षक है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। जनसंख्या में परिवर्तन, स्थानांतरण, नए मतदाताओं का पंजीकरण और अन्य कारणों से सूची में संशोधन आवश्यक होते हैं। किंतु यह प्रक्रिया जितनी नियमित है, उतनी ही संवेदनशील भी। पारदर्शिता, पर्याप्त सूचना और आपत्ति दर्ज कराने के अवसर यदि स्पष्ट रूप से उपलब्ध हों, तो विवाद की संभावना कम हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हस्तक्षेप के माध्यम से यह रेखांकित किया कि प्रत्येक पात्र नागरिक को अपना दावा प्रस्तुत करने का अवसर मिलना चाहिए। इससे प्रक्रिया अधिक सहभागी और जवाबदेह बनती है। अनुच्छेद 142 के प्रयोग को लेकर कभी-कभी यह आशंका व्यक्त की जाती है कि कहीं न्यायपालिका अन्य संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण तो नहीं कर रही। किंतु इस प्रकरण में अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि उसका उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों में हस्तक्षेप करना नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना है। लोकतंत्र में संस्थाओं के बीच संतुलन आवश्यक है, और जब यह संतुलन डगमगाता दिखाई दे, तब न्यायपालिका का हस्तक्षेप व्यवस्था को स्थिर करता है। इस निर्णय का प्रभाव केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा। यह पूरे देश के लिए एक मार्गदर्शक उदाहरण है कि मतदाता सूची की शुद्धता और प्रक्रिया की निष्पक्षता लोकतंत्र की प्राथमिक शर्त हैं। चुनाव परिणाम की विश्वसनीयता उसी समय सुनिश्चित होती है, जब प्रारंभिक चरण से लेकर अंतिम मतदान तक हर प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष हो। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम चुनावी सुधार की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है। अंततः, लोकतंत्र की मजबूती नागरिकों के विश्वास पर टिकी होती है। जब सर्वोच्च न्यायालय यह कहता है कि मतदाता सूची की पवित्रता और प्रक्रिया की निष्पक्षता दोनों अनिवार्य हैं, तो वह लोकतांत्रिक मूल्यों को पुनः पुष्ट करता है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में लिया गया यह निर्णय दर्शाता है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था जीवंत और सजग है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और चुनाव आयोग जैसी संस्थाएँ मिलकर लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाने का कार्य करती हैं। इस प्रकरण ने यह सिद्ध कर दिया है कि संविधान केवल एक लिखित दस्तावेज नहीं, बल्कि न्याय और संतुलन का जीवंत माध्यम है। अनुच्छेद 142 का विवेकपूर्ण उपयोग यह दर्शाता है कि जब भी नागरिक अधिकारों पर प्रश्नचिह्न लगेगा, तो संवैधानिक तंत्र सक्रिय होकर समाधान प्रस्तुत करेगा। यही भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति और उसकी स्थायी विश्वसनीयता का आधार है।