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संपादकीय

खाली खाते की भारी कीमत ! पांच साल में बैंकों ने कमाए साढ़े आठ हजार करोड़

February 16, 2026 08:36 PM

भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भूमिका केवल वित्तीय लेनदेन तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इन्हें सामाजिक और आर्थिक विकास के वाहक के रूप में देखा जाता रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में शाखाओं का विस्तार, छोटे बचतकर्ताओं को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ना और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देना इनकी प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में एक ऐसी प्रवृत्ति सामने आई है जिसने बैंकिंग व्यवस्था के इस सामाजिक चरित्र पर सवाल खड़े किए हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने बीते पाँच वर्षों में न्यूनतम शेष राशि बनाए न रखने पर ग्राहकों से लगभग साढ़े आठ हजार करोड़ रुपये तक जुर्माना वसूला है। यह स्थिति केवल राजस्व संग्रह का मामला नहीं है, बल्कि इससे यह बहस भी जन्म लेती है कि क्या यह नीति वास्तव में ग्राहक हितों और वित्तीय समावेशन के उद्देश्यों के अनुरूप है। न्यूनतम बैलेंस रखने की शर्त मूल रूप से बैंकिंग संचालन को व्यवस्थित बनाए रखने और प्रशासनिक लागत को संतुलित करने के लिए लागू की गई थी। बैंक खातों की देखरेख, लेनदेन की प्रक्रिया, सुरक्षा उपायों और तकनीकी संरचना पर खर्च करते हैं, जिसके कारण शुल्क और जुर्माने को एक वित्तीय साधन के रूप में देखा गया। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था ऐसे वर्गों पर बोझ बन गई जिनकी आय अस्थिर है। असंगठित क्षेत्र के कामगार, छोटे किसान, दैनिक मजदूरी करने वाले लोग और निम्न आय वर्ग के ग्राहक अक्सर नियमित रूप से खाते में निर्धारित राशि बनाए रखने में सक्षम नहीं होते। नतीजतन, वे बार-बार जुर्माना चुकाने के लिए विवश हो जाते हैं, जो उनकी आर्थिक स्थिति को और कमजोर कर सकता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी सामने आता है। सरकार और बैंकिंग संस्थाएँ वित्तीय समावेशन के लिए खाते खोलने को प्रोत्साहित करती हैं, लेकिन यदि उन्हीं खातों पर जुर्माने का बोझ बढ़ता है तो ग्राहक बैंकिंग प्रणाली से दूरी बना सकते हैं। कई मामलों में देखा गया है कि खाते निष्क्रिय हो जाते हैं या ग्राहक केवल आवश्यक लेनदेन तक ही सीमित रहते हैं। यह प्रवृत्ति वित्तीय समावेशन के दीर्घकालिक लक्ष्य के लिए चुनौती बन सकती है। इस मुद्दे का एक और पहलू पारदर्शिता और जानकारी की उपलब्धता से जुड़ा है। कई ग्राहकों को यह स्पष्ट नहीं होता कि उनके खाते पर न्यूनतम बैलेंस की क्या शर्तें लागू हैं, जुर्माने की दर कितनी है और उससे बचने के विकल्प क्या हैं। बैंकिंग शर्तों की जटिल भाषा और सूचना की कमी के कारण उपभोक्ता अनजाने में अतिरिक्त शुल्क का भुगतान करते रहते हैं। वित्तीय साक्षरता के अभाव में यह समस्या और गहरी हो जाती है। इसलिए विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि ग्राहकों को स्पष्ट और सरल भाषा में जानकारी उपलब्ध कराई जाए तथा जागरूकता कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए। हालाँकि बैंकिंग क्षेत्र के दृष्टिकोण से देखा जाए तो शुल्क और जुर्माने की व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त करना भी सरल नहीं है। बैंकिंग ढाँचे को बनाए रखने के लिए लागत आती है, और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक भी प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में कार्य कर रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, साइबर सुरक्षा और ग्राहक सेवा के लिए निवेश आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि इन खर्चों का संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए ताकि बैंक भी टिकाऊ रहें और ग्राहकों पर अनावश्यक भार भी न पड़े। डिजिटल बैंकिंग के विस्तार ने इस बहस को नया आयाम दिया है। ऑनलाइन लेनदेन और मोबाइल बैंकिंग के बढ़ते उपयोग से बैंकिंग लागत में कमी आने की संभावना व्यक्त की जाती है। साथ ही, शून्य-बैलेंस खातों जैसी पहलें यह दर्शाती हैं कि वैकल्पिक मॉडल संभव हैं। यदि तकनीकी प्रगति के माध्यम से सेवाएँ सस्ती और सुलभ बनाई जा सकती हैं, तो जुर्माने की नीति में भी लचीलापन लाने की गुंजाइश बनती है। उदाहरण के तौर पर, आय या खाते के उपयोग के आधार पर शुल्क संरचना में भिन्नता लाई जा सकती है या कमजोर वर्गों को छूट दी जा सकती है। नीतिगत स्तर पर नियामक संस्थाओं और सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बैंकिंग शुल्क से संबंधित नियमों की समय-समय पर समीक्षा और ग्राहक संरक्षण के उपाय आवश्यक हैं। यदि जुर्माने की राशि अत्यधिक प्रतीत होती है, तो इसके सामाजिक प्रभाव का आकलन किया जाना चाहिए। जनप्रतिनिधियों और उपभोक्ता संगठनों द्वारा इस विषय को उठाया जाना भी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में सहायक हो सकता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को भी आत्ममंथन की आवश्यकता है। उनकी स्थापना का उद्देश्य केवल लाभ कमाना नहीं था, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी निभाना भी था। यदि उनकी नीतियाँ कमजोर वर्गों के लिए असुविधाजनक बनती हैं, तो इससे संस्थागत भरोसे पर असर पड़ सकता है। दीर्घकाल में ग्राहक विश्वास ही बैंकिंग व्यवस्था की स्थिरता का आधार होता है। इसलिए आवश्यक है कि राजस्व अर्जन और सामाजिक दायित्व के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। समग्र रूप से यह स्पष्ट है कि न्यूनतम शेष राशि पर जुर्माना वसूली का मुद्दा बहुआयामी है। इसमें बैंकिंग लागत, ग्राहक अधिकार, वित्तीय समावेशन और नीतिगत संतुलन जैसे अनेक पहलू जुड़े हुए हैं। यह केवल आँकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि आर्थिक न्याय और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा प्रश्न है। यदि बैंकिंग व्यवस्था को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो ऐसी नीतियों की आवश्यकता है जो सभी वर्गों के लिए समान रूप से अनुकूल हों। अंततः, यह बहस एक अवसर भी प्रदान करती है—ऐसी नीतियों को विकसित करने का अवसर जो बैंकिंग क्षेत्र को अधिक पारदर्शी, लचीला और जनोन्मुखी बना सकें। जब बैंकिंग सेवाएँ सहज और भरोसेमंद होंगी, तभी वित्तीय समावेशन का लक्ष्य पूर्ण रूप से साकार हो सकेगा और आम नागरिक स्वयं को आर्थिक प्रणाली का सक्रिय हिस्सा महसूस करेंगे।

 

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