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संपादकीय

‘सेवा तीर्थ’ से नई शुरुआत: किसानों, युवाओं और महिलाओं के लिए पीएम के बड़े संदेश ने जगाई उम्मीदें

February 13, 2026 07:03 PM

प्रधानमंत्री के नए कार्यस्थल ‘सेवा तीर्थ’ में स्थानांतरण के साथ प्रशासनिक प्राथमिकताओं में सेवा-केन्द्रित दृष्टिकोण की स्पष्ट झलक दिखाई देने लगी है। नई व्यवस्था में प्रवेश करते ही किसानों, युवाओं और महिलाओं के सशक्तीकरण से जुड़े सकारात्मक संकेतों और घोषणाओं ने नीति विमर्श को नई दिशा दी है। यह घटनाक्रम केवल प्रशासनिक बदलाव का संकेत नहीं है, बल्कि उस व्यापक सोच का प्रतीक भी है जिसमें विकास को महज़ आर्थिक आँकड़ों तक सीमित न रखते हुए समाज के उत्पादक और वंचित वर्गों को केंद्र में रखा गया है। सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो यह परिवर्तन शासन को जनोन्मुख बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में उभरता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुस्तरीय समाज में जब नीति निर्माण का केंद्र ग्रामीण समुदाय, युवा शक्ति और महिला भागीदारी को बनाया जाता है, तब उसका प्रभाव दूरगामी होता है। इसी परिप्रेक्ष्य में नरेन्द्र मोदी द्वारा ‘सेवा तीर्थ’ से शुरू की गई पहल को प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर महत्व दिया जा रहा है। यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि शासन की भूमिका केवल योजनाओं की घोषणा तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा भाव के साथ उनके प्रभावी क्रियान्वयन तक विस्तारित है। सकारात्मक दृष्टि से यह प्रशासन और नागरिकों के बीच विश्वास को मजबूत करने की दिशा में एक प्रयास माना जा सकता है।किसानों के संदर्भ में उठाए गए कदमों और संकेतों को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पुनर्जीवन की दिशा में आशाजनक माना जा रहा है। कृषि क्षेत्र अब भी करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार है और उत्पादन लागत, बाजार तक पहुंच तथा तकनीकी नवाचार जैसे मुद्दे निरंतर प्रासंगिक बने हुए हैं। समर्थन मूल्य व्यवस्था को मजबूत करने, सिंचाई संरचना के विस्तार, आधुनिक कृषि तकनीकों को प्रोत्साहन देने और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने जैसे प्रयास ग्रामीण आय बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ऐसी पहलों से कृषि को परंपरा और नवाचार के संतुलन के साथ आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आर्थिक स्थिरता दोनों को बल मिल सकता है।युवाओं के लिए घोषित प्राथमिकताओं को देश के भविष्य निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। जनसांख्यिकीय दृष्टि से India विश्व के सबसे युवा देशों में शामिल है और यही युवा वर्ग नवाचार, उद्यमिता और विकास की गति तय करता है। कौशल विकास कार्यक्रमों, स्टार्टअप समर्थन, डिजिटल शिक्षा और रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित करना सकारात्मक संकेत देता है कि युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण की धुरी के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। यदि इन प्रयासों को व्यवस्थित ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे न केवल रोजगार अवसर बढ़ेंगे बल्कि आत्मनिर्भरता और उद्यमशीलता की भावना भी सुदृढ़ होगी।महिलाओं के सशक्तीकरण को लेकर दिखाई गई प्रतिबद्धता सामाजिक संतुलन और समावेशी विकास की दिशा में एक मजबूत संकेत है। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, वित्तीय समावेशन और उद्यमिता में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी समाज को अधिक स्थिर और उत्पादक बनाती है। स्वयं सहायता समूहों, छोटे वित्तीय सहयोग कार्यक्रमों और सामाजिक सुरक्षा उपायों के माध्यम से महिलाओं की आर्थिक भूमिका को सुदृढ़ करने के प्रयास सकारात्मक परिणाम दे सकते हैं। जब महिलाओं को निर्णय प्रक्रिया में समान भागीदारी मिलती है, तो उसका असर परिवार, समुदाय और व्यापक अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। इसलिए यह पहल सामाजिक प्रगति की दिशा में उत्साहजनक मानी जा सकती है।‘सेवा तीर्थ’ से घोषणाएं करना केवल प्रशासनिक कदम नहीं बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश भी है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि शासन का आधार सेवा, समर्पण और जनभागीदारी है। लोकतंत्र में प्रतीकों का महत्व इसलिए भी होता है क्योंकि वे जनता और शासन के बीच भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करते हैं। सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो ऐसे कदम नागरिकों में सहभागिता की भावना को बढ़ा सकते हैं और शासन के प्रति विश्वास को सुदृढ़ कर सकते हैं।इन पहलों का प्रभाव केवल घरेलू स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी इसकी प्रतिध्वनि सुनाई देती है। जब कोई देश सामाजिक समावेशन और संतुलित विकास को प्राथमिकता देता है, तो उसकी वैश्विक छवि मजबूत होती है। समावेशी विकास की दिशा में उठाए गए कदम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नीति निर्माण के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इससे आर्थिक सहयोग, निवेश आकर्षण और कूटनीतिक संबंधों को भी सकारात्मक बल मिल सकता है।समग्र रूप से देखा जाए तो ‘सेवा तीर्थ’ से शुरू हुई पहल एक आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है जिसमें किसानों की आय वृद्धि, युवाओं के अवसर विस्तार और महिलाओं की भागीदारी को विकास की धुरी बनाया गया है। यह दृष्टिकोण केवल नीति निर्माण तक सीमित नहीं बल्कि सामाजिक समरसता और आर्थिक संतुलन की दिशा में भी योगदान दे सकता है। आने वाले समय में इन घोषणाओं के प्रभाव का आकलन उनके व्यावहारिक परिणामों के आधार पर होगा, लेकिन प्रारंभिक संकेत सकारात्मक संभावनाओं की ओर इशारा करते हैं।लोकतंत्र में जनअपेक्षाएं निरंतर विकसित होती रहती हैं और सरकारों के लिए चुनौती होती है कि वे इन अपेक्षाओं को अवसर में बदल सकें। सेवा-भाव पर आधारित प्रशासनिक दृष्टिकोण यदि ठोस परिणाम देता है, तो यह जनविश्वास को और अधिक मजबूत कर सकता है। सकारात्मक संदर्भ में ‘सेवा तीर्थ’ से आरंभ हुई यह प्रक्रिया शासन और समाज के बीच संवाद, सहयोग और विकास की नई संभावनाओं का द्वार खोलती हुई प्रतीत होती है। यह पहल केवल नीतिगत बदलाव नहीं बल्कि समर्पण, सेवा और सहभागिता पर आधारित विकास दृष्टि का प्रतीक बनकर उभर सकती है।

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