भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील को महज एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते के रूप में देखना इसके व्यापक प्रभावों को नजरअंदाज करने जैसा होगा। यह समझौता वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन, बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के कमजोर पड़ने और अंतर्राष्ट्रीय कानून के बदलते स्वरूप से गहराई से जुड़ा है। ऐसे दौर में, जब विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं और शक्तिशाली देश द्विपक्षीय या क्षेत्रीय समझौतों के जरिए अपने हित साधने में लगे हैं, इंडिया–यूएस ट्रेड डील भारत के लिए एक साथ अवसर भी है और गंभीर चुनौती भी।पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। आज अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है, जबकि भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए एक विशाल उपभोक्ता बाजार, तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था और रणनीतिक निवेश गंतव्य के रूप में देखा जा रहा है। रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और सेवाओं जैसे क्षेत्रों में सहयोग लगातार बढ़ा है। इसके बावजूद व्यापार संबंध पूरी तरह सहज नहीं हैं। कृषि उत्पादों और डेयरी आयात, डेटा लोकलाइजेशन, डिजिटल टैक्स, बौद्धिक संपदा अधिकार और श्रम मानकों जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं। प्रस्तावित ट्रेड डील इन्हीं विवादित मुद्दों के समाधान की कोशिश के रूप में सामने आई है।अंतर्राष्ट्रीय कानून के संदर्भ में यह समझौता कई अहम सवाल खड़े करता है। विश्व व्यापार संगठन की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि वैश्विक व्यापार एक समान नियमों और पारदर्शी व्यवस्था के तहत चले। इसके मूल सिद्धांत ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ और ‘नेशनल ट्रीटमेंट’ यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी एक देश को दी गई व्यापारिक रियायतें अन्य सदस्य देशों के साथ भेदभाव न करें। हालांकि विश्व व्यापार संगठन नियमों में क्षेत्रीय और द्विपक्षीय समझौतों के लिए अपवाद भी दिए गए हैं, लेकिन शर्त यह है कि ऐसे समझौते व्यापार को अधिक उदार बनाएं और तीसरे देशों के हितों को नुकसान न पहुंचाएं। ऐसे में इंडिया–यूएस ट्रेड डील की कानूनी संरचना और उसके प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून की कसौटी पर लगातार परखे जाएंगे। भारत की सबसे बड़ी चिंता कृषि और डेयरी क्षेत्र को लेकर है। अमेरिका लंबे समय से चाहता रहा है कि भारत अपने बाजार को उसके कृषि उत्पादों और डेयरी वस्तुओं के लिए खोले। लेकिन भारत में कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा विषय है। छोटे और सीमांत किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार और सामाजिक स्थिरता इस क्षेत्र से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। अंतर्राष्ट्रीय कानून भी विकासशील देशों को अपने संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा के लिए विशेष और विभेदित व्यवहार का अधिकार देता है। भारत अब तक इन्हीं प्रावधानों के सहारे अपने किसानों के हितों की रक्षा करता आया है और भविष्य में भी इससे पीछे हटना उसके लिए आसान नहीं होगा।डिजिटल व्यापार और डेटा संरक्षण इस प्रस्तावित डील का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है। अमेरिका डेटा के मुक्त प्रवाह को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी मानता है, जबकि भारत डेटा संप्रभुता, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों की गोपनीयता को प्राथमिकता देता है। भारत का मानना है कि देश के नागरिकों का डेटा देश के भीतर सुरक्षित रहना चाहिए, ताकि उसका दुरुपयोग न हो। अंतर्राष्ट्रीय कानून अभी डिजिटल व्यापार के लिए कोई सर्वमान्य और स्पष्ट ढांचा तैयार नहीं कर पाया है। इसी खालीपन का लाभ उठाते हुए कई देश द्विपक्षीय समझौतों के जरिए अपने-अपने नियम तय करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह डिजिटल क्षेत्र में निवेश और नवाचार को प्रोत्साहित करते हुए अपने संवैधानिक और कानूनी दायित्वों से समझौता न करे।बौद्धिक संपदा अधिकार का मुद्दा भी इंडिया–यूएस ट्रेड डील में टकराव का एक बड़ा बिंदु रहा है। अमेरिका चाहता है कि भारत अपने पेटेंट कानूनों को और सख्त बनाए, ताकि अमेरिकी दवा और तकनीकी कंपनियों के हित सुरक्षित रह सकें। वहीं भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य, सस्ती जेनेरिक दवाओं और विकासशील देशों की जरूरतों को प्राथमिकता देता है। ट्रिप्स समझौते के तहत विकासशील देशों को कुछ लचीलापन दिया गया है, जिसका उपयोग भारत ने एचआईवी, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों की सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए किया है। यदि प्रस्तावित ट्रेड डील में ट्रिप्स से आगे जाकर कठोर शर्तें लगाई जाती हैं, तो यह अंतर्राष्ट्रीय कानून और भारत की घरेलू नीतियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है।रणनीतिक नजरिए से यह ट्रेड डील केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक महत्व भी रखती है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच अमेरिका भारत को एक अहम रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है। क्वाड जैसे मंचों पर बढ़ता सहयोग इसी सोच को दर्शाता है। ऐसे में व्यापार समझौता दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों को और मजबूती दे सकता है। लेकिन भारत के लिए यह जरूरी है कि वह किसी भी आर्थिक या व्यापारिक समझौते के जरिए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और स्वतंत्र विदेश नीति से समझौता न करे।अब तक भारत का रुख संतुलित और व्यावहारिक रहा है। वह बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था का समर्थन करता है, लेकिन बदलती वैश्विक परिस्थितियों में द्विपक्षीय समझौतों को अवसर के रूप में भी देखता है। इंडिया–यूएस ट्रेड डील के मामले में भी भारत चरणबद्ध और सीमित समझौते के पक्ष में नजर आता है, ताकि संवेदनशील मुद्दों पर व्यापक सहमति के बिना जल्दबाजी न हो और घरेलू हित सुरक्षित रह सकें।अंततः इंडिया–यूएस ट्रेड डील की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अंतर्राष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों के अनुरूप कितनी पारदर्शी, संतुलित और न्यायसंगत होती है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह संभावित आर्थिक लाभ के साथ-साथ किसानों, उपभोक्ताओं, डिजिटल अधिकारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के दीर्घकालिक हितों की रक्षा करे। यदि यह संतुलन साधा गया, तो यह ट्रेड डील भारत–अमेरिका संबंधों को नई ऊंचाई दे सकती है। लेकिन यदि घरेलू सरोकारों और कानूनी सीमाओं की अनदेखी हुई, तो यही समझौता भविष्य में असंतोष, विवाद और कानूनी चुनौतियों का कारण भी बन सकता है।