भुपेंद्र शर्मा, मुख्य संपादक , सिटी दर्पण, चंडीगढ़
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में दिया गया यह वक्तव्य—“नया भारत किसी के सामने झुकता नहीं”—सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों और भारत की उभरती राष्ट्रीय आत्मविश्वास की छवि को भी दर्शाता है। पिछले एक दशक में भारत ने जिस तरह आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, वह इस कथन को व्यवहार में भी प्रमाणित करता है। यह संपादकीय इसी विचार की गहराई से पड़ताल करता है कि क्या वास्तव में भारत अब “झुकने वाला” राष्ट्र नहीं रहा, और इस परिवर्तन के पीछे कौन-से सामाजिक, कूटनीतिक व रणनीतिक कारक सक्रिय हैं। सबसे पहले, इस वक्तव्य को समझने के लिए हमें भारत की विदेश नीति में आए मौलिक बदलावों को देखना होगा। पहले जहाँ भारत ‘नॉन-अलाइनमेंट’ के सिद्धांत पर चलता था और बड़े राष्ट्रों के बीच संतुलन रखने की रणनीति अपनाता था, वहीं आज की नीति अधिक आत्मविश्वासपूर्ण और बहुपक्षीय स्वरूप ले चुकी है। भारत अमेरिका, रूस, यूरोप और खाड़ी देशों के साथ स्वतंत्र रूप से संबंध बना रहा है और किसी भी वैश्विक शक्ति के दबाव में आकर अपनी नीति तय नहीं कर रहा। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान की गई ऊर्जा नीति हो या इजरायल-हमास संघर्ष के बाद भारत का कूटनीतिक रुख—देश ने अपने हितों को प्राथमिकता पर रखा। मोदी का यह बयान इसी कूटनीतिक स्वतंत्रता का प्रतीक माना जा सकता है।दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक स्तर पर भारत की बढ़ती शक्ति है। आज भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अनुमान है कि जल्द ही यह तीसरे स्थान पर पहुंच सकता है। वैश्विक निवेशकों का भरोसा बढ़ने के साथ-साथ भारत की स्टार्टअप अर्थव्यवस्था और उत्पादन-आधारित सुधारों ने भी देश को आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनाया है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘मैन्युफैक्चरिंग जोन’, ‘गति शक्ति’ और MSME सुधारों ने देश के औद्योगिक ढांचे को मजबूत किया है। यही आर्थिक स्थिरता भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक अधिकारपूर्वक बोलने का आधार देती है।इसके साथ ही रक्षा क्षेत्र में आई प्रगति ने भी भारत के आत्मविश्वास को बढ़ाया है। सैन्य आधुनिकीकरण, स्वदेशी हथियार निर्माण, ब्रह्मोस जैसे हथियारों का निर्यात, तेजीस से विकसित होता अंतरिक्ष कार्यक्रम और क्वाड-आई2यू2 जैसे मंचों पर बढ़ती भूमिका—इन सबने भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति को मजबूत किया है। लद्दाख में चीन के साथ तनाव के दौरान भारतीय सेना ने जिस दृढ़ता और रणनीतिक स्थिरता का प्रदर्शन किया, वह यह संदेश स्पष्ट करता है कि भारत अब किसी दबाव में नहीं आता। प्रधानमंत्री का ‘नया भारत’ वाला बयान, इन बदलते सामरिक तथ्यों से भी जुड़ा है।हालांकि, इस आत्मविश्वास का एक राजनीतिक आयाम भी है। मोदी सरकार अक्सर अपने भाषणों में यह संदेश देती रही है कि भारत का “स्वाभिमान” सर्वोपरि है और देश किसी भी संघर्ष या चुनौति से पीछे नहीं हटेगा। इस संदेश के जरिए सरकार घरेलू राजनीति में भी एक सशक्त राष्ट्रवाद की भावना को मजबूत करना चाहती है। युवा आबादी, मध्यवर्गीय मानसिकता, डिजिटल सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव इस तरह के संदेशों को और अधिक स्वीकार्यता प्रदान करते हैं। यह बयान इसलिए भी प्रभावशाली बनता है क्योंकि यह एक ऐसे दौर में दिया गया है जब वैश्विक राजनीति अनिश्चितताओं और शक्ति-प्रतिस्पर्धा से गुजर रही है।लेकिन इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा भी आवश्यक है। यह पूछना जरूरी है कि क्या “न झुकने” का यह दावा पूरी तरह व्यवहारिक है, या यह मुख्यतः राजनीतिक भाषण का हिस्सा है? विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति हमेशा लचीलेपन, संवाद और सामंजस्य पर आधारित होती है। किसी भी राष्ट्र के लिए पूरी तरह अड़ियल रुख अपनाना व्यावहारिक नहीं हो सकता। भारत ने भी कई मौकों पर समझौते किए हैं, चाहे व्यापार समझौते हों या वैश्विक दबावों का प्रबंधन। इसलिए यह कथन एक दृष्टिकोण तो प्रस्तुत करता है, लेकिन इसे पूर्ण सत्य मानना वास्तविकता का अतिसरलीकरण हो सकता है।इसके साथ ही घरेलू चुनौतियाँ—बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, जलवायु परिवर्तन, शहरी अव्यवस्था और सामाजिक तनाव—भी एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती हैं कि क्या वास्तव में ‘नया भारत’ इन चुनौतियों से निपटने में उतना ही सशक्त है जितना अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिखता है। यदि देश भीतरी स्तर पर मजबूत नहीं होगा तो वैश्विक स्तर पर दृढ़ता टिकाना कठिन होगा। इसलिए इस बयान का विश्लेषण करते हुए आंतरिक चुनौतियों की अनदेखी नहीं की जा सकती।फिर भी यह निर्विवाद है कि भारत की वैश्विक स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुई है। जी20 की सफल अध्यक्षता, वैश्विक दक्षिण की आवाज़ बुलंद करना, जलवायु बहस में नेतृत्वकारी भूमिका, मानवीय सहायता मिशनों में सक्रियता, और वैश्विक सुरक्षा ढाँचे में बढ़ती उपस्थिति—ये सब इस दावे को मजबूती देते हैं कि भारत अब पहले जैसा “चुप और संयमित” राष्ट्र नहीं, बल्कि “दृढ़ और नेतृत्वकारी” भूमिका में है।अंत में यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन भावनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर प्रभावशाली है। यह भारत की उभरती ताकत, बदलते आत्मविश्वास और तेज़ी से विकसित हो रही वैश्विक पहचान की ओर संकेत करता है। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि किसी भी राष्ट्र की शक्ति सिर्फ दृढ़ बयानबाजी से नहीं, बल्कि संस्थागत मजबूती, समावेशी विकास और रणनीतिक संतुलन से तय होती है। यदि भारत इन मोर्चों पर निरंतर प्रगति करता रहा, तो ‘नया भारत’ वास्तव में वह स्वरूप ले सकेगा, जो किसी भी दबाव में अपने हितों से समझौता न करने की क्षमता रखता हो।