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संपादकीय

Delhi's air poses a growing threat – doctors say the situation is such that it's best to leave the city!: दिल्ली की हवा से बढ़ा खतरा—डॉक्टर्स बोले, हालात ऐसे हैं कि शहर छोड़ना ही बेहतर !

November 27, 2025 06:39 PM

भुपेंद्र शर्मा, मुख्य संपादक , सिटी दर्पण, चंडीगढ़ 

दिल्ली-एनसीआर की हवा एक बार फिर ऐसी जहरीली परत में तब्दील हो गई है, जिसमें सांस लेना भी स्वास्थ्य पर हमला साबित होने लगा है। नवंबर का अंतिम सप्ताह होते-होते वायु गुणवत्ता सूचकांक कई इलाकों में 450 के पार पहुँच गया है, जो "गंभीर" श्रेणी से भी आगे की स्थिति दर्शाता है। डॉक्टरों, फेफड़ा रोग विशेषज्ञों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की एकमत राय है कि मौजूदा परिस्थितियाँ सामान्य प्रदूषण से कहीं अधिक भयावह रूप धारण कर चुकी हैं। कई विशेषज्ञ तो साफ कह रहे हैं कि “अगर संभव हो तो कुछ दिनों के लिए दिल्ली छोड़ दें। यह हवा बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और अस्थमा-हार्ट पेशेंट्स के लिए बेहद खतरनाक है।” दिल्ली-एनसीआर में पिछले एक महीने से प्रदूषण लगातार गंभीर स्तर पर है। हवा में पी एम 2.5 और पी एम 10 कणों की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा से 20–25 गुना तक अधिक मापी गई है। ये सूक्ष्म कण इतने छोटे होते हैं कि फेफड़ों की सबसे गहरी परतों तक पहुँचकर रक्त प्रवाह में शामिल हो जाते हैं। नतीजतन सांस लेने में दिक्कत, सीने में जकड़न, आंखों में जलन, त्वचा में खुजली, थकान और तेज सिरदर्द जैसी समस्याएँ बड़े पैमाने पर सामने आ रही हैं। अस्पतालों में ओ पी डी  भीड़ बढ़ चुकी है और कई स्वास्थ्य केंद्रों को प्रदूषण-जनित बीमारियों के लिए विशेष वार्ड तैयार करने पड़े हैं। डॉक्टरों का कहना है कि प्रदूषण का प्रभाव सिर्फ तात्कालिक तौर पर नहीं पड़ता, बल्कि यह शरीर में ऐसे सूक्ष्म नुकसान छोड़ जाता है जो आगे चलकर फेफड़ों की क्षमता घटाते हैं। लंबे समय तक इसे झेलने वाले लोगों को क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, हृदय रोग और रक्तचाप संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।विशेषज्ञों ने जिस कड़ी चेतावनी की तरफ इशारा किया है, वह बच्चों और बुजुर्गों से सीधे संबंधित है। बच्चों के फेफड़े अभी विकासशील अवस्था में होते हैं, और प्रदूषण का असर उनकी प्रतिरोधक क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर कर देता है। कई स्कूलों में छुट्टियाँ घोषित करने या ऑनलाइन कक्षाओं पर लौटने की चर्चाएँ फिर शुरू हो गई हैं। वहीं बुजुर्ग, जिनमें हृदय और फेफड़ों की बीमारियाँ पहले से होती हैं, जहरीली हवा के चलते ज्यादा असुरक्षित हो जाते हैं। डॉक्टर्स स्पष्ट कह रहे हैं कि इस समय बेवजह घर से बाहर निकलना जोखिम भरा है।दिल्ली की आबादी का बड़ा हिस्सा रोजाना यात्रा कर ऑफिस पहुँचता है। यह वर्ग इस दौर में सबसे ज्यादा परेशान है। मास्क, एयर प्यूरीफायर और दवाओं की बिक्री में अचानक तेजी आ गई है, जो बताती है कि आम जन-जीवन किस तरह प्रदूषण की गिरफ्त में है। डॉक्टरों का कहना है कि मास्क के बावजूद खतरनाक स्तर का पी एम 2.5 शरीर में प्रवेश कर ही जाता है। जिन लोगों को लंबे समय तक बाहर रहना पड़ रहा है, उनके लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।दिल्ली के बड़े सरकारी और निजी अस्पतालों के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने कहा है कि पिछले कुछ वर्षों में प्रदूषण का स्तर भले ही समय-समय पर गंभीर रहा हो, लेकिन इस साल हवा की “टॉक्सिसिटी” कहीं अधिक बढ़ी है। कई डॉक्टरों ने साफ शब्दों में कहा कि अगर किसी के पास विकल्प है, तो कुछ दिनों के लिए दिल्ली-एनसीआर से दूर किसी साफ हवा वाले राज्य या पहाड़ी क्षेत्र में चले जाना बेहतर होगा।यह सलाह विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं, अस्थमा रोगियों, हृदय रोगियों और छोटे बच्चों के लिए दी गई है। विशेषज्ञों ने बताया कि प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य प्रभाव कई हफ्तों तक बने रहते हैं, इसलिए साफ हवा वाले स्थानों में कुछ समय बिताना शरीर को राहत देता है और फेफड़ों पर पड़े दबाव को कम करता है।राजधानी में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान के तहत कई बार प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं—जैसे निर्माण गतिविधियों पर रोक, डीजल वाहनों को नियंत्रित करना, वाहनों की एंट्री कम करना, कूड़ा जलाने पर सख्ती और औद्योगिक प्रदूषण की निगरानी। लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि इन कदमों का प्रभाव बहुत सीमित दिखाई दे रहा है क्योंकि हवा की दिशा, तापमान में गिरावट और धुंध-धूल के मिश्रण ने प्रदूषण की परत को स्थिर कर दिया है।लोगों के लिए सुरक्षा उपायों की बात करें तो डॉक्टर्स और पर्यावरण विशेषज्ञ लोगों को निम्न बातों का पालन करने की सलाह दे रहे हैं— एन 95 या एन 99 मास्क ही बाहर पहनें। सुबह-शाम के समय बाहर जाने से बचें क्योंकि इस दौरान प्रदूषण सबसे अधिक होता है। घर में पंखों की धूल सफाई, गीले कपड़े से पोछा और खिड़कियों में एयर-सीलिंग जैसी सावधानियाँ अपनाएँ। एयर प्यूरीफायर का उपयोग करें और घर के अंदर पौधों को सीमित रखें क्योंकि अधिक पौधे बंद स्थान में नमी बढ़ाकर फंगल संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकते हैं। खूब पानी पिएँ और खाँसी-जुकाम जैसे लक्षणों में डॉक्टर से तुरंत संपर्क करें।हर साल दिल्ली प्रदूषण को “एयर इमरजेंसी” के स्तर पर पहुँचते देख रही है, लेकिन स्थायी समाधान अभी भी दूर है। कृषि अवशेष जलाने, वाहनों के बढ़ते दबाव, निर्माण धूल, औद्योगिक गतिविधियों और मौसमीय परिस्थितियों ने मिलकर ऐसी स्थिति बनाई है जिसमें आम नागरिक अपने ही शहर में सुरक्षित साँस लेने के लिए तरस रहा है। इस बार डॉक्टरों की चेतावनी ने बहस को और तेज कर दिया है कि क्या दिल्ली को अब लंबी अवधि में ऐसे उपाय नहीं करने चाहिए जो प्रदूषण को जड़ से नियंत्रित कर सकें?साफ है कि राजधानी का वायु संकट सिर्फ पर्यावरणीय मसला नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का बड़ा खतरा बन चुका है—और जब डॉक्टर स्वयं कह रहे हों कि “अगर हो सके तो कुछ दिन के लिए शहर से बाहर चले जाएँ”, तो हालात की गंभीरता किसी चेतावनी की मोहताज नहीं रहती।

 

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