भुपेंद्र शर्मा, मुख्य संपादक , सिटी दर्पण, चंडीगढ़
महिलाओं के खतने की प्रथा भारत में एक बार फिर कानूनी और सामाजिक विमर्श के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल में केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर की नीति बनाने का इरादा है और क्या महिला खतना—या खाफ्ज़—को रोकने के लिए कोई स्पष्ट कदम उठाए गए हैं। अदालत की यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सीधे महिला अधिकारों, शरीर की स्वायत्तता और बाल संरक्षण जैसे संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा हुआ प्रश्न है। इस बहस के केंद्र में एक गंभीर तथ्य यह भी है कि महिलाओं के खतने का न तो कुरान में उल्लेख है और न ही इसे इस्लाम का मूल सिद्धांत माना जाता है, इसके बावजूद यह प्रथा जारी है। सवाल यह है—क्यों?सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि महिला खतना धार्मिक आदेश से अधिक एक सांस्कृतिक परंपरा के रूप में विकसित हुआ चलन है, जिसे समय के साथ धार्मिक पहचान का हिस्सा बना दिया गया। भारत में यह प्रथा मुख्यतः दाऊदी बोहरा समुदाय के एक हिस्से में प्रचलित है, जहां सात वर्ष की बालिकाओं के जननांगों की त्वचा को काट दिया जाता है। इसे हल्का और प्रतीकात्मक बताया जाता है, लेकिन चिकित्सकीय विशेषज्ञों के अनुसार यह न केवल दर्दनाक है, बल्कि संक्रमण, यौन स्वास्थ्य समस्याओं और मानसिक आघात जैसे गंभीर जोखिम के साथ जुड़ा हुआ है।यहां बड़ा प्रश्न यह है कि जब कुरान इस विषय पर मौन है और मुस्लिम विद्वानों का स्पष्ट मत है कि यह इस्लाम की अनिवार्य परंपरा नहीं है, तब भी यह प्रथा क्यों जारी है? इसका उत्तर समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक स्तर पर छिपा है। लंबे समय से कई समुदायों में स्त्री शरीर को नियंत्रित करने की प्रवृत्ति मौजूद रही है। महिला खतना इसी मानसिकता का विस्तार है, जिसके तहत स्त्री की यौनिकता को “नियंत्रित”, “संयमित” या “शुद्ध” करने के नाम पर हस्तक्षेप किया जाता है। सदियों पुरानी ऐसी परंपराएँ अक्सर धर्म का आवरण ओढ़ लेती हैं ताकि उनका विरोध कमजोर हो जाए और उनका बचाव “विश्वास” के नाम पर किया जा सके।दूसरी तरफ, यह बहस केवल परंपरा बनाम अधिकार का प्रश्न नहीं है; यह सीधे उस संवैधानिक ढांचे से जुड़ा मुद्दा है जो हर नागरिक—विशेषकर महिलाओं और बच्चों—को सुरक्षा और गरिमा का अधिकार देता है। भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के तहत शरीर की स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मूल अधिकार के रूप में मान्यता देता है। इसके अलावा बाल अधिकार संरक्षण कानून किसी भी प्रकार की शारीरिक या मानसिक क्षति को अपराध मानता है। ऐसे में यह तर्क कि महिला खतना एक "धार्मिक प्रथा" है, संवैधानिक मानकों के सामने टिकता नहीं है।सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी इसी संवैधानिक कसौटी पर आधारित है। अदालत ने कहा है कि यह विषय धार्मिक स्वतंत्रता से कहीं अधिक व्यापक है और इसमें महिला की देह पर उसके अधिकार, उसकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण जैसे बुनियादी आयाम शामिल हैं। तथ्य यह भी है कि दुनिया के कई मुस्लिम-बहुल देशों—जैसे मिस्र, सूडान, इंडोनेशिया—ने महिला खतने पर सख्त कानून बनाए हैं, क्योंकि वे इसे मानवाधिकार उल्लंघन मानते हैं। भारत में यह प्रथा सीमित समुदाय तक ही क्यों न हो, लेकिन यह किसी भी आधुनिक समाज के लिए अस्वीकार्य प्रश्न उठाती है।इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अब बोहरा समुदाय की अनेक महिलाएं खुलकर इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठा रही हैं। उनकी कहानियाँ दर्द, भय और असहायता की गवाही देती हैं। कई महिलाओं ने बताया कि उन्हें बचपन में पता ही नहीं था कि उनके साथ क्या हो रहा है। वे वयस्क होने पर समझ पाईं कि यह “परंपरा” उनके शरीर पर थोपे गए नियंत्रण का तरीका था। इन गवाहीयों का सामाजिक महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि वे यह बताती हैं कि महिला खतना केवल चिकित्सकीय या धार्मिक बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक असर वाला यथार्थ है।इस मुद्दे के समर्थक अक्सर इसे "हल्का" या "हानिरहित" प्रक्रिया बताकर बचाव करते हैं। लेकिन चिकित्सा जगत इस दावे को नकारता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी इसे हानिकारक और महिला अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन घोषित कर चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे यौन संवेदना में कमी, प्रसव के दौरान जटिलताएं और जीवनभर मानसिक आघात जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। अतः इस प्रक्रिया का “हल्का” होना वैज्ञानिक दृष्टि से भी गलत तर्क है।यह भी सच है कि सरकारें अक्सर ऐसे संवेदनशील सामाजिक मुद्दों पर तुरंत निर्णय नहीं लेतीं, क्योंकि इससे विवाद और राजनीतिक प्रतिरोध का खतरा बना रहता है। लेकिन यह प्रवृत्ति अब बदलनी चाहिए। जब तीन तलाक, बाल विवाह और दहेज जैसे मुद्दों पर सशक्त कानून बन सकते हैं, तो महिला खतने जैसे अमानवीय चलन पर कार्रवाई क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट के सवाल अब केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाते हैं कि वह इस विषय पर ठोस नीति बनाए और यह स्पष्ट करे कि यह प्रथा भारतीय कानून के तहत अपराध है या नहीं।एक गहरी सच्चाई यह भी है कि समाज और कानून दोनों तभी प्रभावी होते हैं जब बदलाव भीतर से आए। बोहरा समुदाय के भीतर ही महिलाओं का बढ़ता प्रतिरोध एक सकारात्मक संकेत है कि यह प्रथा सामाजिक स्तर पर भी कमजोर पड़ रही है। लेकिन स्वैच्छिक बदलाव हमेशा पर्याप्त नहीं होते। कई बार कानून के रूप में एक सख्त संदेश देना जरूरी हो जाता है कि महिला के शरीर पर किसी सांस्कृतिक या धार्मिक परंपरा का नहीं, सिर्फ स्त्री का अधिकार है।भारत के लिए यह समय निर्णायक है। देश खुद को महिला सुरक्षा, अधिकारों और समानता के मुद्दों पर वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा रहा है। ऐसे में महिला खतने जैसे मुद्दे पर अस्पष्टता या मौन उसकी छवि को कमजोर कर सकता है। यह विषय केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि राष्ट्र के विधिक और नैतिक चरित्र का प्रश्न है।अंततः यह बहस एक मूल प्रश्न पर आकर ठहरती है—क्या किसी परंपरा का अस्तित्व इसलिए बना रहना चाहिए क्योंकि वह पुरानी है, या इसलिए कि वह मानवीय है? महिला खतने पर प्रतिबंध का आग्रह इसी मानवीयता की नींव पर खड़ा है। जब कुरान मौन है, जब यह इस्लाम का हिस्सा नहीं, और जब इसके नुकसान वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं, तो इस प्रथा का जारी रहना किसी भी तर्क के दायरे में उचित नहीं ठहराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की पहल ने इस मुद्दे को अब कानून और नीति निर्धारण के स्तर पर निर्णायक मोड़ दे दिया है। अब जिम्मेदारी सरकार की है कि वह स्पष्ट, दृढ़ और मानवाधिकार आधारित रुख अपनाए—ताकि भारत यह संदेश दे सके कि यहां महिलाओं के शरीर और अधिकारों पर किसी परंपरा की नहीं, केवल संविधान की सर्वोच्चता है।