हाल के दिनों में प्रस्तावित फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में जिस तरह की तीखी बहस और असंतोष सामने आया है, उसने एक बार फिर यह बुनियादी प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर किसी विशिष्ट समुदाय या धर्म विशेष से जुड़े वर्ग को सामूहिक रूप से कटघरे में खड़ा करना उचित है। भारतीय समाज बहुस्तरीय, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक ताने-बाने से निर्मित है, जहां किसी एक वर्ग को नकारात्मक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत करना सामाजिक सौहार्द को गंभीर क्षति पहुंचा सकता है। यही कारण है कि कला, अभिव्यक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की बहस बार-बार केंद्र में लौट आती है। सिनेमा को लंबे समय से समाज का आईना माना जाता रहा है। वह सवाल उठाता है, विसंगतियों को उजागर करता है और कई बार सत्ता-संरचनाओं पर भी तीखा प्रहार करता है। लेकिन जब कोई रचना व्यक्ति विशेष की आलोचना से आगे बढ़कर पूरे समुदाय को एक ही रंग में रंगने लगे, तो वह कला के दायरे से बाहर निकलकर सामाजिक विभाजन का औज़ार बन जाती है। ‘घूसखोर पंडत’ जैसे शीर्षक और कथानक को लेकर उठ रही आपत्तियां इसी आशंका से जुड़ी हैं कि कहीं यह फिल्म भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मुद्दे की आड़ में ब्राह्मण समाज को सामूहिक रूप से कलंकित करने की कोशिश तो नहीं कर रही।भारत का ब्राह्मण समाज, ठीक अन्य किसी भी समुदाय की तरह, एकरूप नहीं है। इसमें विद्वान, शिक्षक, किसान, श्रमिक, सैनिक, ईमानदार कर्मचारी और समाजसेवी भी हैं, तो कुछ अपवादस्वरूप दोषी व्यक्ति भी हो सकते हैं। किसी एक या कुछ पात्रों के कृत्यों को पूरे समाज का प्रतिनिधि मान लेना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि संविधान के समानता और गरिमा के मूल सिद्धांतों के भी विपरीत है। यह वही तर्कदोष है, जिसके कारण भारत ने अतीत में लंबे समय तक सामाजिक वैमनस्य और अविश्वास का सामना किया है।चिंता की बात यह भी है कि हाल के वर्षों में फिल्मों, वेब सीरीज़ और डिजिटल कंटेंट में सस्ती सनसनी के लिए पहचान आधारित ठप्पों का उपयोग बढ़ा है। कभी किसी धर्म, कभी किसी जाति, तो कभी किसी क्षेत्र विशेष को निशाना बनाकर दर्शकों का ध्यान खींचने की कोशिश की जाती है। इससे न केवल रचनात्मक गुणवत्ता गिरती है, बल्कि समाज में पहले से मौजूद तनाव और अविश्वास को भी हवा मिलती है। कला का उद्देश्य प्रश्न करना और सोच को विस्तृत करना होना चाहिए, न कि पूर्वाग्रहों को और गहरा करना।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का एक अहम स्तंभ है, लेकिन यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है। भारतीय संविधान स्वयं इस स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंधों की बात करता है, विशेषकर तब जब कोई अभिव्यक्ति सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाने की आशंका पैदा करे। यदि किसी फिल्म या रचना से किसी समुदाय की भावनाएं आहत होती हैं और वह उसे अपमानजनक मानता है, तो उस आपत्ति को “असहिष्णुता” कहकर खारिज कर देना भी एक प्रकार का बौद्धिक अहंकार है। लोकतंत्र में असहमति और आलोचना—दोनों को सुनना और समझना आवश्यक है।इसी संदर्भ में उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक कार्रवाई ने इस विवाद को और व्यापक बना दिया है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर अभिनेता मनोज बाजपेयी की फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ के निर्देशक और टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। लखनऊ के हजरतगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत में आरोप लगाया गया है कि फिल्म के माध्यम से धार्मिक और जातिगत भावनाओं को ठेस पहुंचाने की कोशिश की गई है। लखनऊ कमिशनरेट प्रशासन का कहना है कि किसी भी समुदाय की भावना को आहत करने और शांति व्यवस्था भंग करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यह कदम राज्य की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें सामाजिक सौहार्द और कानून-व्यवस्था को सर्वोपरि रखने पर ज़ोर दिया गया है।हालांकि, ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। जिम्मेदारी केवल फिल्म निर्माताओं की ही नहीं, बल्कि सेंसर बोर्ड और अन्य नियामक संस्थाओं की भी बनती है। फिल्म प्रमाणन बोर्ड का दायित्व केवल दृश्यात्मक अश्लीलता या भाषा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे यह भी परखना चाहिए कि क्या कोई फिल्म या शीर्षक सामाजिक विभाजन को बढ़ावा तो नहीं दे रहा। यदि किसी संवाद, दृश्य या कथानक से पूरे समुदाय की छवि धूमिल होने की आशंका हो, तो उस पर पुनर्विचार और आवश्यक संशोधन अनिवार्य होने चाहिए।साथ ही, विरोध के तरीकों पर भी आत्ममंथन आवश्यक है। किसी भी रचना के विरोध में कानूनी और लोकतांत्रिक रास्ते ही अपनाए जाने चाहिए। हिंसा, धमकी या तोड़फोड़ न केवल आंदोलन के उद्देश्य को कमजोर करती है, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बनती है। संवाद, याचिका, न्यायिक समीक्षा और शांतिपूर्ण विरोध—यही वे उपाय हैं, जो लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य और प्रभावी माने जाते हैं।आज जब देश अनेक सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब ऐसी रचनाओं से सावधान रहने की ज़रूरत है जो समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करें। भ्रष्टाचार, पाखंड और अनैतिकता के खिलाफ आवाज़ उठाना आवश्यक है, लेकिन अपराध को पहचान से जोड़ देना एक खतरनाक प्रवृत्ति है। अपराधी का कोई धर्म या जाति नहीं होती—उसकी पहचान उसके कृत्य से होती है, न कि जन्म या सामाजिक पृष्ठभूमि से।अंततः, यह बहस केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है। यह सवाल है कि हम किस तरह का समाज बनाना चाहते हैं—एक ऐसा समाज जो आपसी सम्मान, विवेक और संतुलन पर टिका हो, या फिर ऐसा समाज जहां कला के नाम पर एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करना सामान्य बात बन जाए। ‘घूसखोर पंडत’ से जुड़ा विवाद हमें यह सोचने का अवसर देता है कि रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच की रेखा को समझना और उसका सम्मान करना आज पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।