देश की सबसे अमीर नगर निकाय बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) एक बार फिर राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र बन गई है। वर्षों से लंबित BMC चुनावों के बीच सत्ता संतुलन को लेकर सियासी दलों में नई खींचतान सामने आ रही है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट, मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी—तीनों की नजरें BMC की कुर्सी पर टिकी हैं।
हालिया राजनीतिक बयानों और बैठकों से संकेत मिलते हैं कि उद्धव ठाकरे ने रणनीतिक “गुगली” फेंक दी है, जिससे विपक्षी खेमों में बेचैनी बढ़ गई है। माना जा रहा है कि उद्धव गुट BMC में अपनी पारंपरिक पकड़ को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जहां कभी शिवसेना का दबदबा रहा है। ठाकरे गुट के लिए यह चुनाव केवल नगर निकाय का नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता साबित करने की लड़ाई भी है।
दूसरी ओर, एकनाथ शिंदे गुट के सामने असली परीक्षा है। सत्ता में होने के बावजूद BMC जैसे मजबूत किले को जीतना उनके लिए आसान नहीं माना जा रहा। पार्टी के भीतर भी यह आशंका है कि यदि नगर निगम में अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो राजनीतिक संदेश गलत जा सकता है। यही वजह है कि शिंदे गुट पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है।
इस सियासी समीकरण में BJP की भूमिका भी बेहद अहम हो गई है। राज्य की सत्ता में साझेदार होने के बावजूद BMC को लेकर भाजपा और शिंदे गुट के बीच तालमेल पूरी तरह सहज नहीं दिख रहा। सीटों के बंटवारे, नेतृत्व और मेयर पद को लेकर अंदरखाने खींचतान की चर्चाएं तेज हैं। भाजपा अपने संगठनात्मक बल के दम पर BMC में बड़ी हिस्सेदारी चाहती है, जबकि शिंदे गुट अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखने पर जोर दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल मेयर पद को लेकर है। BMC में मेयर का पद न सिर्फ प्रशासनिक, बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद ताकतवर माना जाता है। इसी पद को लेकर अब “महाभारत” जैसी स्थिति बनती दिख रही है, जहां हर दल अपनी जीत सुनिश्चित करने की रणनीति बना रहा है।
कुल मिलाकर, BMC की जंग केवल मुंबई की सियासत तक सीमित नहीं है। इसके नतीजे महाराष्ट्र की आगामी राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं। यही कारण है कि आने वाले दिनों में इस सियासी रणभूमि में बयानबाजी, रणनीतिक दांव-पेच और गठबंधन राजनीति और तेज़ होने के आसार हैं।