ब्रिटेन की राजधानी लंदन में प्रस्तावित चीनी दूतावास को लेकर एक नया भू-राजनीतिक विवाद सामने आया है। सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने ब्रिटेन को उस समय सतर्क किया, जब उसे चीनी एम्बेसी के कथित आंतरिक नक्शे की जानकारी मिली। इस मैप में दूतावास परिसर के तहखाने में 208 कमरों का जिक्र है, जिन्हें खुफिया गतिविधियों से जोड़कर देखा जा रहा है। इस खुलासे ने पश्चिमी देशों की सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
बताया जा रहा है कि लंदन में प्रस्तावित यह चीनी दूतावास यूरोप के सबसे बड़े दूतावास परिसरों में से एक होगा। अमेरिकी अधिकारियों को आशंका है कि इतने बड़े पैमाने पर बनाए जा रहे भूमिगत कमरे केवल प्रशासनिक जरूरतों तक सीमित नहीं हैं। उनका मानना है कि इनका इस्तेमाल जासूसी, साइबर निगरानी और संवेदनशील संचार अवरोधन के लिए किया जा सकता है। इसी कारण अमेरिका ने अपने पारंपरिक सहयोगी ब्रिटेन को समय रहते अलर्ट किया।
इस मुद्दे ने ब्रिटेन की घरेलू राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। विपक्षी दलों और कई सांसदों ने सरकार से सवाल किया है कि क्या चीन को इतनी बड़ी और संवेदनशील संरचना की अनुमति देना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से सही फैसला होगा। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी विदेशी दूतावास को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संरक्षण मिलता है, लेकिन जब ढांचा असामान्य रूप से विशाल और जटिल हो, तो संदेह स्वाभाविक है।
चीन की ओर से इन आरोपों को सिरे से खारिज किया गया है। बीजिंग का कहना है कि दूतावास से जुड़ी सभी योजनाएं राजनयिक और प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप हैं तथा उन पर लगाए जा रहे जासूसी के आरोप राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं। चीन ने यह भी दोहराया है कि वह दूसरे देशों की संप्रभुता और कानूनों का सम्मान करता है।
हालांकि, अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बीच चीन को लेकर पहले से ही रणनीतिक अविश्वास की स्थिति बनी हुई है। ताइवान, दक्षिण चीन सागर, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद अब राजनयिक परिसरों तक पहुंचते दिख रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि लंदन स्थित चीनी दूतावास का यह मामला केवल एक इमारत का विवाद नहीं, बल्कि पश्चिम और चीन के बीच बढ़ते तनाव का प्रतीक है।
ब्रिटिश सरकार फिलहाल इस पूरे मामले की जांच और आंतरिक समीक्षा में जुटी है। अंतिम फैसला चाहे जो भी हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि दूतावास के कथित 208 खुफिया कमरों की खबर ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ब्रिटेन सुरक्षा चिंताओं और कूटनीतिक संबंधों के बीच किस तरह संतुलन साधता है।