भारत और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग को नई गति मिलने जा रही है। दोनों देशों ने आने वाले समय में संयुक्त सैन्य अभ्यासों की संख्या और दायरे को बढ़ाने पर सहमति जताई है। इसका उद्देश्य न केवल आपसी रणनीतिक विश्वास को मजबूत करना है, बल्कि बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में साझा क्षमताओं का विकास भी करना है। इस सहयोग के तहत समुद्री सुरक्षा, पनडुब्बी तकनीक और काउंटर-ड्रोन सिस्टम जैसे अहम क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, भारत और जर्मनी के बीच थल, जल और वायु तीनों क्षेत्रों में संयुक्त सैन्य अभ्यासों की योजना बनाई जा रही है। खास तौर पर नौसेना के स्तर पर सहयोग को प्राथमिकता दी जा रही है, जिसमें पनडुब्बी रोधी युद्ध, समुद्री निगरानी और हिंद महासागर क्षेत्र में साझा अभ्यास शामिल होंगे। जर्मनी की उन्नत पनडुब्बी तकनीक को देखते हुए भारत इसे अपनी समुद्री सुरक्षा क्षमताओं के लिए अहम मान रहा है।
इसके साथ ही ड्रोन और काउंटर-ड्रोन तकनीक भी इस रक्षा साझेदारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनने जा रही है। हाल के वर्षों में ड्रोन आधारित खतरों में तेजी से इजाफा हुआ है, खासकर सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्रों में। ऐसे में जर्मनी के साथ मिलकर काउंटर-ड्रोन सिस्टम पर प्रशिक्षण, तकनीकी सहयोग और संभावित संयुक्त विकास भारत की सुरक्षा तैयारियों को मजबूत कर सकता है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह सहयोग भारत को अत्याधुनिक निगरानी और रक्षा तकनीकों तक पहुंच दिला सकता है।
जर्मनी यूरोप की प्रमुख सैन्य और औद्योगिक शक्तियों में शामिल है, जबकि भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुरक्षा भागीदार के रूप में उभर रहा है। दोनों देशों के हित समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आतंकवाद से मुकाबले और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बनाए रखने में एक-दूसरे से मेल खाते हैं। इसी साझा दृष्टिकोण के चलते रक्षा सहयोग को केवल अभ्यास तक सीमित न रखकर दीर्घकालिक साझेदारी के रूप में देखा जा रहा है।
इसके अलावा, रक्षा उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण के क्षेत्र में भी संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारत चाहता है कि जर्मन कंपनियां देश में रक्षा उपकरणों के निर्माण और सह-उत्पादन में भाग लें। इससे न केवल तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी, बल्कि रोजगार और औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
कुल मिलाकर, भारत और जर्मनी के बीच बढ़ते सैन्य अभ्यास, पनडुब्बी सहयोग और काउंटर-ड्रोन तकनीक पर फोकस दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने का संकेत है। यह साझेदारी न सिर्फ द्विपक्षीय सुरक्षा को मजबूत करेगी, बल्कि क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।