भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) से पहले नई व्यापारिक चुनौतियाँ उभरती दिख रही हैं। EU ने संकेत दिए हैं कि भारत से होने वाले लगभग 87 प्रतिशत निर्यात पर मिलने वाली टैरिफ (कर) छूट को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाएगा। इस फैसले को भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे भारत-EU व्यापार सौदा महंगा और अधिक जटिल हो सकता है।
अब तक भारत को EU के जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) जैसे प्रावधानों के तहत कई उत्पादों पर आयात शुल्क में रियायत मिलती रही है। इन रियायतों की समाप्ति का सीधा असर टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट्स, चमड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, रसायन और स्टील जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि टैक्स छूट खत्म होने से भारतीय उत्पाद यूरोपीय बाजार में महंगे हो जाएंगे, जिससे प्रतिस्पर्धा में भारत को नुकसान हो सकता है।
विशेष रूप से टेक्सटाइल और परिधान उद्योग, जो पहले से ही बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा झेल रहा है, इस फैसले से दबाव में आ सकता है। इसी तरह स्टील और इंजीनियरिंग सेक्टर को भी बढ़े हुए टैरिफ के कारण यूरोपीय खरीदारों की मांग में गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। इससे भारत के कुल निर्यात और रोजगार पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
EU का तर्क है कि वह व्यापार संबंधों को FTA के माध्यम से अधिक संतुलित और नियम-आधारित बनाना चाहता है। वहीं भारत की चिंता यह है कि FTA से पहले ही टैक्स छूट खत्म होने से उसकी मोलभाव की स्थिति कमजोर हो सकती है। भारतीय नीति-निर्माता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि किसी भी व्यापार समझौते में भारतीय उद्योगों और MSME सेक्टर के हितों की सुरक्षा जरूरी है।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति भारत के लिए एक चेतावनी और अवसर—दोनों हो सकती है। एक ओर जहां अल्पकाल में निर्यात पर दबाव बढ़ेगा, वहीं दूसरी ओर भारत को उत्पादों की गुणवत्ता, वैल्यू एडिशन और बाजार विविधीकरण पर अधिक ध्यान देना होगा।
कुल मिलाकर, EU का यह कदम भारत-EU व्यापार संबंधों में नए सिरे से रणनीतिक सोच की मांग करता है। आने वाले महीनों में FTA वार्ताओं की दिशा यह तय करेगी कि यह ‘झटका’ भारत के लिए नुकसान साबित होता है या दीर्घकालिक सुधार का रास्ता खोलता है।